ग्वालियर। भगवान को सुमरिन करने की कोई उम्र नहीं होती। भक्त प्रह्लाद ने छोटी सी उम्र में ही भगवान को प्राप्त कर लिया। यह विचार पं सतीश कौशिक ने गेरू वाला बंगला मुरार में श्रीमद्भागवत कथा का तीसरे दिन बुधवार को व्यक्त किए।
पं कौशिक ने कहा कि यह धारणा गलत है कि अंतिम समय में ही खुद को भगवान की भक्ति में समर्पित करना चाहिए। बचपन एवं युवा अवस्था में यदि भगवान का नाम नहीं लोगे, तो अंतिम समय में भी मुंह से राम नहीं निकलेगा, इसलिए अपने बच्चों को भी साथ कथा में लाना चाहिए, ताकि उन्हें शुरू से ही प्रभु सुमरिन का अभ्यास हो सके। उन्होंने बताया कि एक ही आसन में बैठकर कथा सुनने से हमारे सारे कार्य सिद्ध हो जाते हैं। भगवान की कथा कल्पवृक्ष के समान हैं, इसे हम जिस भाव से सुनते हैं, हमें वही प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि जीवन में कष्ट आए तो भगवान की शरणागति हो जाओ, वे आपका कल्याण कर देंगे। उन्होंने अजामिल की कथा सुनाते हुए कहा कि उसने अपने बेटे का नाम नारायण रखा और नारायण नाम लेकर दुष्ट और पापी अजामिल को भी मुक्ति मिल गई।
भगवान के नाम से हर कष्ट का निवारण हो जाता है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार दूध का असर देर मेें और मदिरा का तुरंत होता है। इसी प्रकार अच्छी बात जल्दी असर नहीं करती है। उन्होंने बताया कि पांच ज्ञानेंद्री, पांच कर्मेद्री और मन को यदि वश में कर लिया तो भगवान को भी वश में कर सकते हैं। मन के अनुसार नहीं चले बल्कि मन को अपने अनुसार चलाएं। उन्होंने कहा कि धर्म के मार्ग पर चलने वाला कभी किसी दूसरे को दुख नहीं पहुंचाता है। इस मौके पर विधायक सहाब सिंह गुर्जर, पूर्व विधायक मुन्नालाल गोयल, कथा परीक्षत रामबाबू यादव, रामसिंह यादव, रामप्रकाश दुबे, अजय यादव, नकुल ढमोले सहित सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।