- राजकुमार जैन, वरिष्ठ स्तंभकार
हम सब एक मुगालते में जी रहे हैं। मुगालता यह कि देश को बर्बाद करने का काम भ्रष्ट ‘सिस्टम’ कर रहा है और हम यानी इस देश के आम, सीधे-सादे नागरिक सिर्फ उसके सताए हुए, निर्दोष, पीड़ित हैं। सुबह उठकर अखबार पढ़ने से लेकर चाय की गुमटी या सोशल मीडिया की चौपाल तक, हमारी राष्ट्रीय बहस का एक ही पसंदीदा शगल है, सरकार और सरकारी कर्मचारियों को कोसना। सरकार काम नहीं कर रही, नेता भ्रष्ट हैं, अफसर निकम्मे हैं, नीतियां खोखली हैं आदि, इत्यादि।
लेकिन कभी किसीने अपनी अंतरात्मा के आईने के सामने खड़े होकर यह पूछने का साहस जुटाया है कि यह सरकार, यह प्रशासन, यह तंत्र आखिर है क्या? क्या कोई एलियन जहाज रात के अंधेरे में उतरता है और खामोशी से हमारे मंत्रालयों, कलेक्ट्रेटों और थानों में दूसरी दुनिया के भ्रष्ट प्राणी तैनात कर जाता है? या फिर हम विदेशों से आयात करके ये नेता और अफसर लाते हैं? कड़वा सच तो यह है कि यह तंत्र कहीं बाहर से नहीं आया है। और यह किसी आयातित वायरस की देन भी नहीं है। यह तंत्र हमारा ही असली चेहरा है। यह व्यवस्था हमारी ही सामाजिक, पारिवारिक और शैक्षणिक परवरिश का परिणाम है। जिस सिस्टम को हम दिन-रात गालियां देते हैं, उसके कलपुर्जे हमारे ही घरों के आंगन और हमारे ही शैक्षणिक संस्थानों के क्लासरूम में गढ़े जा रहे हैं। बच्चे के जन्म से लेकर युवा होने के दौरान गौर कीजिए उस पूरी असेंबली लाइन पर, जहां से यह समाज अपने भविष्य का निर्माण करता है।
शुरुआत हमारे अपने घर-आंगन से होती है। कोई भी नौजवान 25 से 30 साल की उम्र में किसी दफ्तर की कुर्सी पर बैठकर अचानक से भ्रष्ट नहीं हो जाता। किसी भी प्रशासनिक अकादमी में रिश्वतखोरी या कामचोरी का कोई पाठ्यक्रम नहीं होता है, किसी भी कार्यालय में अलग से भ्रष्टाचार की कक्षाएं नहीं लगती। एक असहज असलियत तो यह है कि बेईमानी के बीज तो बालक के मन में बचपन में ही बो दिए जाते हैं। जब एक पिता अपने बच्चे के सामने लालबत्ती तोड़कर शान बघारता है, जब किसी काम को कायदे से करने के बजाय ‘जुगाड़’ से करवाने पर घर में तालियां बजती हैं, जब नालायक बच्चे को डोनेशन या प्रभाव से अच्छे संस्थान में प्रवेश दिलवाना शान की बात समझी जाती है, जब किशोरों को मूल्यों और चरित्र को ताक पर रखकर केवल किसी भी कीमत पर ‘सफल’ होने की घुट्टी पिलाई जाती है। तब हम अनजाने में उसी भ्रष्ट तंत्र की अगली पीढ़ी तैयार कर रहे होते हैं। परिवार ने जब से संस्कार की जगह सिर्फ ‘सुविधा’ और ‘स्टेटस’ को जीवन का अंतिम सत्य मान लिया, तभी से सार्वजनिक जीवन में रीढ़विहीन लोगों की बाढ़ आ गई।
और फिर यही नस्ल जब कॉलेज की दहलीज पर कदम रखती है, तो यह नाटक अपने चरम पर पहुंच जाता है। आप भी कॉलेज गए हैं तो अपने दिल पर हाथ रखकर खुद से पूछिए, कॉलेजों के गलियारों में टहलकर देख लीजिए, कितने चेहरे ज्ञान की प्यास लेकर भटक रहे हैं और कितने सिर्फ अटेंडेंस का जुगाड़ बिठाने में लगे हैं? क्लास बंक करना शान बन चुका है, प्रॉक्सी लगाना होशियारी मानी जाती है और पूरी पढ़ाई सिर्फ परीक्षा से एक रात पहले पासिंग मार्क्स जुटाने तक सिमट गई है।
सवाल यह नहीं है कि बच्चे मस्ती क्यों कर रहे हैं। सवाल यह है कि ज्ञान से विमुख होकर सिर्फ कागज के एक टुकड़े (डिग्री) को हथियाने की यह सामूहिक बेईमानी किस किस्म के लालन-पालन का फल है ? जिस छात्र ने पूरे तीन या चार साल कॉलेज में केवल कामचोरी, शॉर्टकट और फरेब सीखा हो, वह कल जब किसी विभाग का इंजीनियर, किसी जिले का अफसर या किसी संस्था का प्रबंधक बनेगा, तो वह रातोंरात निष्ठावान और कर्तव्यनिष्ठ कैसे हो जाएगा?
कॉलेज में जिसने बिना पढ़े डिग्री हासिल करने को अपनी ‘स्मार्टनेस’ माना, वही कल कुर्सी पर बैठकर बिना काम किए फाइल पास करने के लिए घूस को अपना ‘हक’ ही तो मानेगा। घर के संस्कार और बाह्य शिक्षा यह दो अलग-अलग विषय नहीं हैं। यह एक ही बीमारी के दो पड़ाव हैं। घर ने बेईमानी की छूट दी और शैक्षणिक संस्थानों ने उस पर शिक्षा का ठप्पा लगाकर उसे समाज में वैध कर दिया। आज हम उस समाज का निर्माण कर चुके हैं जो पेड़ तो बबूल का बोता है, लेकिन फल आम का चाहता है।
हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे बिना परिश्रम से पढ़े, अच्छी डिग्री पा जाएं, जुगाड़ से सरकारी नौकरी पा जाएं, घर में सब कुछ ऐशो-आराम का हो जाए, लेकिन जब वही बच्चा किसी थाने, तहसील या मंत्रालय की कुर्सी पर बैठकर हमारी ही सिखाई गई कला का प्रदर्शन हमारे साथ करता है, तो हम छाती पीटने लगते हैं कि "देश में भ्रष्टाचार बढ़ गया है।"
*यह पाखंड बंद होना चाहिए।*
व्यवस्था कोई अमूर्त ढांचा नहीं है; वह हमारी ही नैतिक कमजोरियों का संस्थागत रूप है। अगर कॉलेज की क्लास खाली है और सिनेमा हॉल भरे हैं, अगर योग्यता की जगह चालाकी पूज्य है, और अगर चरित्र निर्माण हमारे विमर्श से पूरी तरह गायब है, तो हमें हमारे द्वारा निर्मित इस सड़े हुए तंत्र पर सवाल उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
सरकारें बाद में बदलेंगी, नीतियां बाद में सुधरेंगी। पहले हमें अपने परिवारों और कक्षाओं का हिसाब करना होगा। वरना हम इसी तरह कागज की खोखली डिग्रियों और चरित्रहीन नेताओं और अधिकारियों की भीड़ में अपनी ही बनाई व्यवस्था का रोना रोते रहेंगे।