आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर ने राजा रवि वर्मा के प्रिंट्स और ओलियोग्राफ्स चित्रों की प्रिदर्शनी का कला वीथिका में परिचर्चा के साथ समापन

आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर द्वारा राजा रवि वर्मा के प्रिंट्स और ओलियोग्राफ्स चित्रों की प्रिदर्शनी का कला वीथिका में परिचर्चा के साथ समापन हुआ
- राजा रवि वर्मा ने भारतीय समाज की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कल्पनाओं को एक दृश्य पहचान प्रदान कीः परितोष मालवीय
- राजा रवि वर्मा की चित्रकला रेखाओं के माध्यम से भावों को अभिव्यक्त करने की अद्भुत कला हैः तूलिका शर्मा
- राजा रवि वर्मा ने भारतीय पौराणिक आख्यानों, यूरोपीय कला-तकनीक और तत्कालीन सामाजिक कल्पनाओं का ऐसा आदर्श सामंजस्य प्रस्तुत किया, जिसने भारतीय दृश्य संस्कृति को लंबे समय तक प्रभावित कियाः प्रोफेसर चारु चित्रा
- राजा रवि वर्मा ने एक ऐसा महत्वपूर्ण काम किया, जिसने धार्मिक छवियों को मंदिरों की सीमाओं से बाहर निकालकर आमजन के घरों तक पहुंचा दियाः फाउंडर चांसलर  रमाशंकर सिंह 
- आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर परिसर में कला संग्रहालय किया जाएगा स्थापितः फाउंडर चांसलर  रमाशंकर सिंह 
- राजा रवि वर्मा ने भारतीय समाज, संस्कृति और श्रद्धा में रंग भरने का सुखद कार्य कियाः रश्मि सबा
ग्वालियर। आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के कला संग्रह के अंतर्गत भारतीय कला जगत के महान चित्रकार राजा रवि वर्मा के प्रिंट्स और ओलियोग्राफ्स चित्रों की प्रदर्शनी का समापन ‘भारतीय कला एवं व्यापक समाज पर राजा रवि वर्मा का महत्वपूर्ण अवदानः विभिन्न पहलू‘ विषय पर परिचर्चा के साथ हुआ। इस अवसर पर विशिष्ठ वक्ता के रूप में प्रोफेसर चारु चित्रा, परितोष मालवीय, तूलिका शर्मा, आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के फाउंडर चांसलर श्री रमाशंकर सिंह जी और कवियत्री रश्मि सबा शमिल हुईं। इस अवसर पर आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के वाइस चांसलर प्रोफेसर डाॅ. योगेश उपाध्याय, रजिस्ट्रार डाॅ. ओमवीर सिंह, डिप्टी रजिस्ट्रार (जनसम्पर्क) श्री अनिल माथुर सहित विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, डीन, प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर, शिक्षक, छात्र-छात्राएं और ग्वालियर शहर के कला रसिक सहित युवाजन उपस्थित रहे।
राजा रवि वर्मा ने भारतीय समाज की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कल्पनाओं को एक दृश्य पहचान प्रदान कीः परितोष मालवीय
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर द्वारा शहर के पड़ाव स्थित कला वीथिका में 3 से 6 सितंबर तक आयोजित राजा रवि वर्मा के प्रिंट्स और ओलियोग्राफ्स चित्रों की प्रदर्शनी के समापन अवसर पर ‘भारतीय कला एवं व्यापक समाज पर राजा रवि वर्मा का महत्वपूर्ण अवदानः विभिन्न पहलू‘ विषय पर आयोजित परिचर्चा के दौरान विशिष्ट सहभागी वक्ता परितोष मालवीय ने राजा रवि वर्मा के कला-संसार और भारतीय संस्कृति में उनके योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति को आमतौर पर धार्मिक, आध्यात्मिक और अपनी परंपराओं से गहराई से जुड़ी  संस्कृति के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि हम अपने ही सांस्कृतिक इतिहास और विरासत के बारे में बहुत कम जानते हैं। उन्होंने राजा रवि वर्मा के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले भारतीय समाज में देवी-देवताओं की मूर्तियां और उनके स्वरूप मुख्य रूप से मंदिरों तक सीमित थे। उस समय समाज के एक बड़े वर्ग, विशेषकर दलित और निम्न वर्ग के लोगों को मंदिरों में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। उन्होंने बताया कि ऐसे समय में राजा रवि वर्मा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने भारतीय देवी-देवताओं और धार्मिक आख्यानों के पात्रों को चित्रों के माध्यम से ऐसा स्वरूप दिया, जो आगे चलकर घर-घर तक पहुंचा। इस तरह उन्होंने भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक कल्पनाओं को जनमानस में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने बताया कि जब राजा रवि वर्मा लगभग 15 से 20 वर्ष की आयु के थे, तब उनका परिचय निकोलस नामक कलाकार से हुआ। इसी दौरान उन्होंने शैल चित्र और चित्रकला की बारीकियां सीखीं। उन्होंने कहा कि राजा रवि वर्मा ने भारतीय धार्मिक आख्यानों के लगभग सभी प्रमुख चरित्रों को अपनी कला के माध्यम से एक विशिष्ट छवि प्रदान की। उनके चित्रों में देवी-देवताओं के साथ-साथ रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों के पात्र भी दिखाई देते हैं। उन्होंने लक्ष्मी, सरस्वती, शकुंतला, अर्जुन, सुभद्रा और द्रौपदी चीरहरण जैसे प्रसंगों को चित्रों के माध्यम से जीवंत किया। उन्होंने कहा कि आज हमारी पुस्तकों में महाराणा प्रताप की जो प्रसिद्ध छवि दिखाई देती है, वह भी राजा रवि वर्मा की कला से जुड़ी हुई है। इस प्रकार राजा रवि वर्मा ने केवल चित्र नहीं बनाए, बल्कि भारतीय समाज की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कल्पनाओं को एक दृश्य पहचान प्रदान की।

राजा रवि वर्मा की चित्रकला रेखाओं के माध्यम से भावों को अभिव्यक्त करने की अद्भुत कला हैः तूलिका शर्मा
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर द्वारा राजा रवि वर्मा के प्रिंट्स और ओलियोग्राफ्स चित्रों की प्रदर्शनी के समापन पर आयोजित परिचर्चा में विशिष्ट वक्ता तूलिका शर्मा ने राजा रवि वर्मा की चित्रकला और दृष्य संस्कृति में योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राजा रवि वर्मा की चित्रकला केवल रेखाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि रेखा के माध्यम से भावों को अभिव्यक्त करने की अद्भुत कला थी। बचपन से ही उनमें चित्रकला के प्रति गहरी रुचि थी और वे दीवारों पर चित्र बनाया करते थे। आगे चलकर उन्होंने भारतीय पौराणिक आख्यानों को अपनी कला से जोड़ते हुए चित्रों का एक विशाल संसार निर्मित किया। उन्होंने कहा कि राजा रवि वर्मा से पहले भारत में चित्रकला की अनेक पारंपरिक शैलियां मौजूद थीं, लेकिन रवि वर्मा ने भारतीय विषय-वस्तु को यूरोपीय चित्रण तकनीकों के साथ जोड़कर एक नई दृश्य भाषा विकसित की। उनकी कला में पोट्र्रेट चित्रण की बारीकियों के साथ-साथ पात्रों के भाव, संवेदनाएं और मानवीय रिश्ते भी स्पष्ट दिखाई देते हैं। उन्होंने एक ऐसे चित्र का उदाहरण दिया, जिसमें एक मां अपने बच्चे के साथ पिता की प्रतीक्षा कर रही है। भावनाओं को इतनी सहजता से चित्रित करना राजा रवि वर्मा की कला की प्रमुख विशेषताओं में से एक था।
तूलिका शर्मा ने राजा रवि वर्मा की प्रिंटिंग प्रेस के बारे में बताते हुए कहा कि उन्होंने अपनी कला को सीमित दर्शकों तक रखने के बजाय उसे आमजन तक पहुंचाने का प्रयास किया। उनकी प्रेस में चित्रों के प्रिंट तैयार किए जाते थे, जिन्हें ओलियोग्राफ्स कहा जाता था। इस तकनीक ने उनके चित्रों को बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचाया। उनकी इस पहल ने भारतीय दृश्य संस्कृति को व्यापक बनाया और इसका प्रभाव भारतीय जनमानस के साथ-साथ पूरे कला बाजार पर भी पड़ा। उन्होंने राजा रवि वर्मा का लक्ष्मी विलास पैलेस से जुड़े प्रसंग के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

राजा रवि वर्मा ने भारतीय पौराणिक आख्यानों, यूरोपीय कला-तकनीक और तत्कालीन सामाजिक कल्पनाओं का ऐसा आदर्श सामंजस्य प्रस्तुत किया, जिसने भारतीय दृश्य संस्कृति को लंबे समय तक प्रभावित कियाः प्रोफेसर चारु चित्रा
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर द्वारा राजा रवि वर्मा के प्रिंट्स और ओलियोग्राफ्स चित्रों की प्रदर्शनी के समापन पर आयोजित परिचर्चा में विशिष्ट सहभागी वक्ता प्रोफेसर चारु चित्रा ने राजा रवि वर्मा की कला में स्त्री-चित्रण और सामाजिक दृष्टि पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि बचपन में मुझे भी यह जानकारी नहीं थी कि कैलेंडर, पटाखों के डिब्बों और घरों में दिखाई देने वाली मां लक्ष्मी की प्रसिद्ध छवि राजा रवि वर्मा की बनाई हुई है। बाद में जब उन्होंने उनकी कला को समझा तो महसूस हुआ कि जो कलाकार अपनी कला को जन-जन तक पहुंचाने में सफल होता है, वही वास्तव में जनमानस का कलाकार बनता है। उन्होंने कहा कि राजा रवि वर्मा ने पौराणिक और ऐतिहासिक पात्रों के साथ-साथ स्त्री पात्रों को भी अपनी चित्रकला में विशेष स्थान दिया। उनकी चित्रकला में स्त्रियां केवल सुंदरता का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि उनके भीतर प्रेम, प्रतीक्षा, संकोच, इच्छा, पीड़ा, अकेलापन, गरिमा और प्रतिरोध जैसे अनेक भाव दिखाई देते हैं।
प्रो. चारु चित्रा ने कहा कि राजा रवि वर्मा की कला को समझते समय उसकी लोकप्रियता के साथ-साथ उसके सामाजिक और लैंगिक पक्ष को भी देखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि राजा रवि वर्मा ने भारतीय पौराणिक आख्यानों, यूरोपीय कला-तकनीक और तत्कालीन सामाजिक कल्पनाओं को मिलाकर स्त्री का एक ऐसा आदर्श सामंजस्य प्रस्तुत किया, जिसने भारतीय दृश्य संस्कृति को लंबे समय तक प्रभावित किया।
राजा रवि वर्मा ने एक ऐसा महत्वपूर्ण काम किया, जिसने धार्मिक छवियों को मंदिरों की सीमाओं से बाहर निकालकर आमजन के घरों तक पहुंचा दियाः फाउंडर चांसलर श्री रमाशंकर सिंह जी 
राजा रवि वर्मा के प्रिंट्स और ओलियोग्राफ्स चित्रों की प्रदर्शनी के समापन पर आयोजित परिचर्चा में विशिष्ट सहभागी वक्ता श्री रमाशंकर सिंह जी (फाउंडर चांसलर, आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर) ने राजा रवि वर्मा की कला और भारतीय सांस्कृतिक कल्पना पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि जब भारत में धर्मस्थलों पर वर्ग विशेष के लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध जैसी सामाजिक व्यवस्थाएं मौजूद थीं, उस समय राजा रवि वर्मा ने एक ऐसा महत्वपूर्ण काम किया, जिसने धार्मिक छवियों को मंदिरों की सीमाओं से बाहर निकालकर आमजन के घरों तक पहुंचा दिया। उन्होंने कहा कि राजा रवि वर्मा ने मानो हर घर में एक मंदिर बना दिया और देवी-देवताओं की ऐसी छवियां जनमानस तक पहुंचाईं, जिन्हें लोग अपने घरों में स्थापित कर सके।

फाउंडर चांसलर  रमाशंकर सिंह  ने कहा कि इन कल्पनाओं को सबसे पहले कवियों और साहित्यकारों ने शब्दों में अभिव्यक्त किया। कवियों ने अपनी रचनाओं में देवी-देवताओं और पौराणिक पात्रों के स्वरूप और व्यक्तित्व की कल्पना की और बाद में कलाकारों ने उन्हीं साहित्यिक कल्पनाओं को चित्रों का रूप दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य चाहे लेखक हो, ऋषि हो या मुनि, वह भी कहीं न कहीं अपनी ही छवि और अपने समय की कल्पनाओं में कैद होता है। उन्होंने कहा कि कवि की महत्ता इसी बात में है कि उसकी कल्पना समाज की सामूहिक चेतना का हिस्सा बन जाती है। रामचरितमानस इसका बड़ा उदाहरण है। लोकमान्यता और व्यापक स्वीकार्यता के कारण यह भारतीय समाज में एक महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ के रूप में स्थापित हुआ।
उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे विज्ञान और तकनीक आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे अनेक चीजें आएंगी और चली जाएंगी, लेकिन मनुष्य की बुद्धि, विवेक और सृजन की क्षमता हमेशा महत्वपूर्ण रहेगी।

आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर परिसर में कला संग्रहालय किया जाएगा स्थापितः फाउंडर चांसलर श्री रमाशंकर सिंह जी
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के फाउंडर चांसलर  रमाशंकर सिंह  ने कहा कि मेरी इच्छा है कि ग्वालियर को एक ऐसा कला परिसर मिले जो बहुआयामी हो और जिसमें विभिन्न कलाओं के लिए पर्याप्त स्थान और अवसर उपलब्ध हों। ऐसा परिसर शहर की कला, संस्कृति और विरासत को नई पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
राजा रवि वर्मा ने भारतीय समाज, संस्कृति और श्रद्धा में रंग भरने का सुखद कार्य कियाः रश्मि सबा
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर द्वारा राजा रवि वर्मा के प्रिंट्स और ओलियोग्राफ्स चित्रों की प्रदर्शनी के समापन पर आयोजित परिचर्चा में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही कवियत्री रश्मि सबा ने कहा कि आमतौर पर प्रत्येक भारतीय परिवार के घर में देवी-देवताओं की तस्वीरें देखने को मिलती हैं। इन तस्वीरों के माध्यम से हमारी श्रद्धा, भावनाएं और सांस्कृतिक विश्वास पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं। उन्होंने कहा कि राजा रवि वर्मा ने भारतीय समाज, संस्कृति और श्रद्धा में रंग भरने का सुखद कार्य किया। उनकी कला का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि उन्होंने देवी-देवताओं की छवियों को ऐसा रूप दिया, जिससे आम व्यक्ति भावनात्मक रूप से जुड़ सका। शिव के नेत्र, देवी-देवताओं के स्वरूप और उनके आसपास दिखाई देने वाली प्रकृति ने इन चित्रों को केवल धार्मिक प्रतीक न रखकर सौंदर्य और अनुभूति से भी जोड़ दिया। उन्होंने कहा कि राजा रवि वर्मा की कला को केवल धार्मिक चित्रों के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं है। उनके चित्रों में रंग, प्रकृति, सौंदर्य, भावनाएं और भारतीय सांस्कृतिक चेतना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने रंगों की इसी विविधता को रेखांकित करते हुए एक शेर भी प्रस्तुत किया‘ 
 “अजब ही बात है, रंगरेज की उलझन है... इतने सारे रंग कैसे जोड़े...”। 


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