राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस पर विशेष: दो बूंद जिंदगी की बनी, जन स्वास्थ्य की संजीवनी
देश में टीकाकरण से बचाई लाखों जिंदगी,कोरोना काल में भी टीकाकरण से मिला संबल
-प्रदीप कुमार वर्मा
कहते हैं की बीमारी और शत्रु को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए और बीमारी कभी बता कर नहीं आती। अगर हमें स्वस्थ रहना है तो इसके सबसे अच्छा उपाय यह है कि हम पूर्व में ही बीमारियों से बचाव के लिए खुद को तैयार कर लें। आधुनिक दौर में स्वास्थ्य की इस संकल्पना में "टीकाकरण" एक महत्वपूर्ण हथियार के रूप में उभरा है। यही वजह है कि समय पर टीकाकरण करने के बाद हम कई बीमारियों से बच सकते हैं। बीते दिनों कोरोना काल में टीकाकरण का महत्व और अधिक उजागर हुआ, तब कोरोना से बचाव के लिए पूर्व में ही लाखों लोगों को कोरोना का टीका लगाया गया। जिसके बाद कोरोना पर निर्णायक विजय प्राप्त की जा सकी। टीकाकरण के प्रति आम लोगों में जागरूकता तथा इसकी उपयोगिता बताने के लिए हर वर्ष 16 मार्च को राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन टीकाकरण के संबंध में भ्रांतियां के उन्मूलन के साथ-साथ इसके लाभों को बात कर आम जन में एक संदेश दिया जाता है, जिससे वह खुद ही टीकाकरण के लिए प्रोत्साहित हो सके।
अब अगर 16 मार्च को राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस मनाए जाने की बात करें तो, पहली बार नेशनल वैक्सीनेशन डे यानि राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस को 16 मार्च 1995 में मनाया गया था। उस दिन पहली बार ओरल पोलियो वैक्सीन यानी कि मुंह के माध्यम से पोलियो वैक्सीन दी गई थी। इसी के साथ भारत सरकार ने पोलियो को जड़ से खत्म करने का अभियान ‘पल्स पोलियो’ शुरू किया था। उस दौर में भारत में पोलियो के मामले काफी तेजी से बढ़ रहे थे। उस समय पल्स पोलियो अभियान के तहत 5 वर्ष तक के सभी बच्चों को समय-समय पर पोलियो वैक्सीन की बूंद दी जाती थी। तब इस अभियान के प्रचार- प्रसार की कमान सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने संभाली और उनके द्वारा किए गए प्रचार "दो बूंद जिंदगी की" को टीकाकरण के क्षेत्र में बड़ी सफलता एवं चर्चा मिली। और यह अभियान लोगों के घर-घर तक पहुंच गया। पोलियो के खिलाफ व्यापक रूप से चलाए गए इस अभियान का यह असर हुआ कि 2014 में भारत को पोलियो मुक्त देश घोषित कर दिया गया। जो भारत जैसे विशाल देश के लिए स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत ही सुखद है।
भारत में टीकाकरण के इतिहास पर गौर करें, तो टीकाकरण की शुरुआत वर्ष 1802 में हुई। तब पहली बार मुंबई की एक 3 वर्षीय बच्ची को चेचक के टीके की पहली खुराक दी गई थी। चेचक महामारी को कम करने के लिए भारत में अनिवार्य टीकाकरण अधिनियम पारित किया गया था। बीसवीं शताब्दी के शुरुआत में देश में कम से कम चेचक, हैजा, प्लेग और टाइफाइड से बचाव के लिए टीका उपलब्ध थे। इसी क्रम में अगस्त 1948 में भारत ने पहला बीसीजी टीकाकरण किया। इसके बाद वर्ष 1951 में बीसीजी टीके का व्यापक अभियान शुरू किया गया और 1977 में भारत को चेचक मुक्त घोषित कर दिया गया। आज के दौर में भी भारत में हेपेटाइटिस जैसी बीमारी के लिए पूर्व टीकाकरण की व्यवस्था उपलब्ध है। जिससे भावी पीढी को हेपेटाइटिस के घातक प्रभावों से बचाया जा सका है। इसके साथ ही आज कई अन्य बीमारियों से बचाव के तक भी बाजार में उपलब्ध है। शिशुओं के लिए टीकाकरण बहुत ज़रूरी है,क्योंकि कम उम्र में ही उन्हें संक्रमण का ख़तरा होता है और बीमारियों की गंभीरता भी ज़्यादा होती है।
करीब पांच साल पहले कोविड-19 का दौर हम सबने देखा है। समूचे विश्व में कोविड जैसी महामारी के बीच वैक्सीनेशन की बहुत अहमियत रही। कोविड के दौर में कोई दवा उपलब्ध नहीं थी और लोगों को लक्षण के आधार पर उपचार दिया जा रहा था। इस दौरान विश्व पटल पर कोविड से बचाव के लिए किसी प्रभावी टीकाकरण आवश्कता महसूस की गई। कोविड से बचाव के लिए प्रभावी टीकाकरण के इस दौर में भारत का भी प्रदर्शन बेहतर रहा और भारत में दो कंपनियों ने कोविड के टीके विकसित किए। जिनसे देश के साथ-साथ विदेशों में भी कोविड पर नियंत्रण किया जा सका। भारत ने समूचे विश्व में वसुदेव कुटुंबकम और मानवता की मिसाल पेश करते हुए विदेशों को भी कोविड वैक्सीन की आपूर्ति की, जो काफी हद तक कारगर रही। कोविड टीकाकरण से न केवल इस महामारी को रोका गया और भारत समेत विश्व के लाखों लोगों को मौत के मुंह में जाने से पहले ही बचा लिया गया। तब लोगों को एक बार फिर टीकाकरण के महत्व का आवास हुआ।
कोविड से पहले भी भारत में पोलियो, चेचक जैसी बीमारियां महामारी का रूप ले चुकी हैं और इनसे निजात दिलाने के लिए समय-समय पर टीकाकरण अभियान चलाए जाते रहे हैं। वरिष्ठ राजकीय चिकित्सक डॉ. विजय सिंह बताते हैं कि टीकाकरण अभियान में प्रयुक्त वैक्सीन वायरस और बैक्टीरिया से हमारा बचाव करते हैं और हमें गंभीर बीमारियों से बचाते हैं। आमजन को टीकाकरण का महत्व समझाने के उद्देश्य से हर साल 16 मार्च को नेशनल वैक्सीनेशन डे आयोजित किया जाता है। प्रभावी राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान के कारण ही चेचक और पोलियो जैसी बीमारियों के बाद एक बार फिर से कोविड-19 के दौर में वैक्सीनेशन लोगों के लिए वरदान साबित हुआ। इस संबंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी मानना है कि टीकाकरण की मदद से करीब 2-3 मिलियन लोगों की जान बचाई जाती है।
देश और दुनिया में चलाए जा रहे टीकाकरण अभियान का ही नतीजा है कि कई संक्रामक बीमारियाँ अब दुर्लभ हो गई हैं या फिर मौजूद ही नहीं हैं। इन बीमारियों में कोविड-19 जैसी महामारी भी शामिल है। इसके साथ ही कई प्रकार के फ्लू, चिकन पॉक्स ,काली खांसी एवं खसरा जैसी कई वायरस जनित बीमारियां अब नियंत्रण में हैं। लेकिन अभी भी ज़ीका, इबोला तथा एचआईवी-एड्स के लिए कोई टीका उपलब्ध नहीं है, लेकिन अनुसंधान जारी है। टीके हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं, ताकि संक्रमण से लड़ सकें और हमें स्वस्थ रख सकें। बच्चों और वयस्कों को बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकरण सबसे प्रभावी रणनीति है। शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में समर्पित भाव से काम कर रहे चिकित्सकों को यह उम्मीद है कि जल्दी ही जीका, इबोला एवं एड्स की रोकथाम के लिए भी वैक्सीन तैयार हो जाएगी और इन घातक रोगों से बचाव के लिए पूर्व में टीकाकरण करके मानव जाति को इन लोगों की चपेट में आने से बचाया जा सकेगा।
-लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।