जिस अच्छाई को हम सराहते नहीं, वह अप्रासंगिक हो जाती है
- राजकुमार जैन, स्वतंत्र चिंतक एवं स्तंभकार
समाज की पहचान अपराधियों के कुकर्मों के डिजिटल प्रचार से नहीं बनती। उसकी असली परख इससे होती है कि वह अपने बीच मौजूद अच्छे और भले लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
हमने भले लोगों के प्रति एक अनजानी चुप्पी साध रखी है। चौराहे पर धूप और बारिश में खड़ा सिपाही, अस्पताल में रात भर जागती नर्स, गहरे गड्ढे में उतकर ड्रेनेज की सफाई करता सफाईकर्मी या स्कूल की छुट्टी के बाद किसी कमजोर बच्चे को अलग से पढ़ाता शिक्षक, इनकी कभी बड़ी खबर नहीं बनती। इंटरनेट पर इनका कोई नाम नहीं उछालता, ये खबरे वायरल नहीं होती। इन्हे वो लाईक नहीं मिलते जिनके वो हकदार हैं। इन्हें शेयर करने में हमारी उँगलिया कांपती हैं। और जिस बात की ऑनलाइन चर्चा न हो, हमारे दौर में मान लिया जाता है कि वह कभी हुई ही नहीं या समाज को उसकी जरूरत नहीं।
यह कोई नई समस्या नहीं है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री एमिल दुर्खाइम ने बहुत पहले कहा था कि समाज तभी जिंदा रहता है जब लोग किसी साझा भावना के लिए एक साथ आगे आएं, जब सब मिलकर किसी अच्छे काम को आदर दें और कहें कि यही हमारा आदर्श है। आज हमने यह आदत खो दी है। अब हम केवल गुस्से और विरोध में इकट्ठा होते हैं। हमारी एकता सिर्फ कमियां निकालने पर टिकी है, किसी का सम्मान करने पर नहीं।
एक अन्य विचारक गेओर्ग सिमेल ने आभार या धन्यवाद को समाज की 'नैतिक याददाश्त' कहा था। जब किसी समाज से आभार जताने की आदत गायब हो जाती है, तो वह भीतर से टूटने लगता है। जब हम किसी के अच्छे काम पर धन्यवाद कहना छोड़ देते हैं, तो हम केवल एक शब्द नहीं भूलते, हम उस इंसान के परिश्रम को हमेशा के लिए मिटा देते हैं।
अमेरिका के एक कॉलेज में छात्रों को एक काम सौंपा गया: किसी अजनबी के साथ चुपचाप कोई भलाई करो और फिर आकर अपना अनुभव बताओ। समाजशास्त्र में इसे 'सकारात्मक विचलन' कहा गया। सोचने वाली बात यह है कि इसे सामान्य से अलग यानी 'विचलन' इसलिए कहा गया, क्योंकि आज के दौर में बिना स्वार्थ के भलाई करना अजीब और असामान्य मान लिया गया है। यह हमारे समय की सामाजिक पतन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है।
बात यह नहीं है कि गलत काम का विरोध न हो। गलतियों पर सवाल उठाना हर नागरिक का हक है और यह बहुत जरूरी भी है। लेकिन सवाल यह है कि अच्छे काम को अनदेखा क्यों कर दिया जाता है।
किसी डॉक्टर की एक गलती पहले पन्ने की खबर बन जाती है, पर उसी अस्पताल में सालों से दिन-रात जान बचाने वाले डॉक्टर को कोई याद नहीं रखता। एक सफाईकर्मी की लापरवाही का वीडियो तुरंत फैल जाता है, लेकिन भोर में चुपचाप शहर की गंदगी साफ करने वाले हजारों सफाईकर्मी किसी को दिखाई नहीं देते। यह कोई इत्तेफाक नहीं है, यह हमारी चुनी हुई आदत है। और इस आदत को कोई और नहीं सिर्फ हम ही बदल सकते हैं।
आलोचना आईने जैसी है, जो हमें हमारी कमियां दिखाती है। लेकिन प्रशंसा एक बीज की तरह है, जिससे कुछ नया और बेहतर जन्म लेता है। जो समाज केवल आईना देखकर अपनी दरारें गिनता रहता है, वह कभी अच्छाई का कोई नया पौधा नहीं लगा पाता।
इसलिए अगली बार जब कोई व्यक्ति चुपचाप अपना काम ईमानदारी से करे, तो एक पल रुकिए। उसकी मेहनत को देखिए और उसकी तारीफ कीजिए। आपकी चुप्पी सहमति नहीं है, अनदेखी है। और जिस इंसान की मेहनत को अनदेखा कर दिया जाए, वह दोबारा पूरी लगन से काम करने का हौसला खो देता है।
किसी जाने वाले को श्रद्धांजलि देना बहुत आसान है, क्योंकि वह अब आपसे कुछ नहीं मांगता। असली चुनौती तो जीते-जी किसी भले इंसान के काम को पहचानना और उसका आदर करना है।
आज ही अपने आसपास किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढिए जो बिना किसी शोर के अपना काम ईमानदारी से कर रहा हो। बस उसके पास जाइए और कहिए: "मैंने आपकी मेहनत देखी। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।"
ये चंद शब्द उस अच्छाई को बचा सकते हैं, जिसे हम अपने अधीर आचरण से, धीरे-धीरे अपने परिवेश से मिटा रहे हैं।