बीहड़ को अभिशाप नहीं, विकास और पर्यावरणीय पुनरुद्धार के अवसर के रूप में देखने की जरूरत : श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
ग्वालियर। बीहड़ केवल भौगोलिक विकृति या अनुपयोगी भूमि का नाम नहीं हैं, बल्कि वे मिट्टी के कटाव, जल-प्रबंधन, वनस्पति, कृषि, मानव बसाहट और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के लंबे इतिहास का परिणाम हैं। इसलिए बीहड़ क्षेत्रों के विकास के लिए केवल समतलीकरण या निर्माण कार्य पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों, जलधाराओं, मिट्टी, जैव-विविधता और आजीविका को केंद्र में रखकर दीर्घकालीन वैज्ञानिक योजना बनानी होगी।
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने बीहड़ क्षेत्रों पर किए गए शोधपरक अध्ययन के संदर्भ में कहा कि देश में बीहड़ समस्या नई नहीं है। विभिन्न क्षेत्रों में प्राकृतिक जल-प्रवाह, वर्षाजल, मिट्टी का क्षरण, वनस्पति का ह्रास और मानवीय गतिविधियों ने समय के साथ गहरी गली-कटाव वाली भूमि का स्वरूप विकसित किया। चंबल अंचल सहित देश के अनेक हिस्सों में यह समस्या कृषि, आवागमन, जल संरक्षण, पर्यावरण और स्थानीय अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ी हुई है।
उन्होंने कहा कि बीहड़ को केवल 'बंजर भूमि' मानना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है। बीहड़ की प्रकृति एक समान नहीं होती। कहीं हल्का कटाव है, कहीं गहरी नालियाँ और गली संरचनाएँ हैं, तो कहीं नदी एवं बरसाती जलधाराओं से प्रभावित विस्तृत भू-भाग है। इसलिए सभी क्षेत्रों के लिए एक जैसी योजना लागू करने के बजाय बीहड़ का वैज्ञानिक सर्वेक्षण और श्रेणीकरण किया जाना आवश्यक है।
जल संरक्षण को बनाना होगा विकास की आधारशिला
श्री निमराजे के अनुसार बीहड़ पुनर्वास की पहली आवश्यकता जल को रोकना और उसके प्रवाह को वैज्ञानिक ढंग से नियंत्रित करना है। छोटे जलागम क्षेत्रों का उपचार, कंटूर आधारित संरचनाएँ, चेकडैम, जल-संचयन, उपयुक्त वनस्पति, घास विकास और मिट्टी संरक्षण जैसी गतिविधियों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाया जाना चाहिए।
इसके साथ यह भी जरूरी है कि जहां बीहड़ क्षेत्र कृषि योग्य बनाए जा सकते हैं, वहां वैज्ञानिक भूमि उपचार किया जाए और जहां प्राकृतिक भू-दृश्य एवं जैव-विविधता अधिक महत्वपूर्ण है, वहां प्राकृतिक पुनरुद्धार, वन क्षेत्र और इको-टूरिज्म जैसी संभावनाओं को विकसित किया जाए।
हर बीहड़ का एक जैसा उपचार नहीं
शोध में यह महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है कि बीहड़ क्षेत्रों को उनकी भौगोलिक और पारिस्थितिक स्थिति के आधार पर कितनी श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। इसके लिए विस्तृत वैज्ञानिक मैपिंग की आवश्यकता है।
संभावित रूप से बीहड़ क्षेत्रों को—
- हल्के एवं प्रारंभिक कटाव वाले क्षेत्र,
- मध्यम गली-कटाव वाले क्षेत्र,
- अत्यधिक गहरे एवं सक्रिय कटाव वाले क्षेत्र,
- नदी/जलधारा प्रभावित बीहड़,
- कृषि एवं पुनर्वास योग्य क्षेत्र,
- तथा संरक्षण एवं जैव-विविधता की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र
के रूप में अध्ययन किया जा सकता है। अंतिम वर्गीकरण संबंधित क्षेत्र के वैज्ञानिक सर्वेक्षण और भू-आकृतिक अध्ययन के आधार पर होना चाहिए।
कागजों से निकलकर जमीन पर दिखे परिणाम
श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कहा कि बीहड़ विकास से जुड़ी योजनाओं की सबसे बड़ी कसौटी यह होनी चाहिए कि उनका परिणाम जमीन पर दिखाई दे। केवल स्वीकृति, बजट, निर्माण और कागजी उपलब्धियों से बीहड़ की समस्या का समाधान नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक परियोजना के लिए पूर्व स्थिति और बाद की स्थिति का वैज्ञानिक मूल्यांकन, उपग्रह/जीआईएस आधारित निगरानी, भू-क्षरण में कमी, जलस्तर, हरित आवरण, कृषि उत्पादकता और स्थानीय परिवारों की आय जैसे मापदंड तय किए जाने चाहिए।
स्थानीय समुदाय को बनाया जाए भागीदार
बीहड़ सुधार का स्थायी मॉडल तभी सफल हो सकता है जब स्थानीय लोगों को केवल लाभार्थी न मानकर योजना का सहभागी बनाया जाए। स्थानीय किसानों, भूमिहीन परिवारों, महिलाओं, युवाओं और ग्राम संस्थाओं की भागीदारी से जल संरक्षण, पौधरोपण, चारागाह विकास, कृषि-विविधीकरण और वैकल्पिक आजीविका के कार्यक्रम संचालित किए जा सकते हैं।
इससे बीहड़ उपचार के साथ-साथ रोजगार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पलायन की समस्या पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
बीहड़ क्षेत्रों में नई अर्थव्यवस्था की संभावनाएँ
शोध के अनुसार प्रत्येक बीहड़ को कृषि भूमि में बदलना आवश्यक अथवा उचित नहीं है। कुछ क्षेत्रों में औषधीय पौधे, देशी प्रजातियों का वृक्षारोपण, घास एवं चारा विकास, मधुमक्खी पालन, फलदार पौधों का चयनित विकास, जल संरक्षण आधारित गतिविधियाँ और नियंत्रित इको-टूरिज्म स्थानीय अर्थव्यवस्था के नए अवसर पैदा कर सकते हैं।
चंबल जैसे क्षेत्रों में प्राकृतिक भू-दृश्य, जैव-विविधता और नदी तंत्र को संरक्षित करते हुए पर्यावरणीय पर्यटन और स्थानीय समुदाय आधारित पर्यटन विकसित करने की संभावनाओं पर भी गंभीर अध्ययन किया जाना चाहिए।
सरकारी प्रयासों की स्वतंत्र समीक्षा जरूरी
श्री निमराजे ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जल संरक्षण, मृदा संरक्षण, वनीकरण, वाटरशेड विकास और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में विभिन्न योजनाएँ संचालित की जाती रही हैं। आवश्यकता इस बात की है कि बीहड़ क्षेत्रों में इन योजनाओं के वास्तविक प्रभाव का स्वतंत्र सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक ऑडिट कराया जाए।
उन्होंने सुझाव दिया कि बीहड़ क्षेत्रों के लिए विभागीय योजनाओं को अलग-अलग चलाने के बजाय एकीकृत बीहड़ पुनरुद्धार मिशन की दिशा में विचार होना चाहिए, जिसमें जल संसाधन, कृषि, वन, ग्रामीण विकास, पंचायत, पर्यावरण, पर्यटन और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय हो।
श्रीप्रकाश सिंह निमराजे की प्रमुख मांगें
उन्होंने सरकार से मांग की कि—
1. बीहड़ क्षेत्रों का वैज्ञानिक एवं डिजिटल सर्वेक्षण कराया जाए।
2. बीहड़ की श्रेणीवार पहचान कर अलग-अलग उपचार मॉडल तैयार किए जाएँ।
3. प्रत्येक परियोजना के लिए परिणाम आधारित लक्ष्य निर्धारित हों।
4. सरकारी योजनाओं के प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जाए।
5. जलागम एवं मिट्टी संरक्षण को प्राथमिक आधार बनाया जाए।
6. स्थानीय समुदायों को योजना और क्रियान्वयन में वास्तविक भागीदारी दी जाए।
7. कृषि योग्य क्षेत्रों में टिकाऊ कृषि और वैकल्पिक आजीविका विकसित की जाए।
8. संवेदनशील प्राकृतिक क्षेत्रों को जबरन समतल करने के बजाय उनका संरक्षण किया जाए।
9. बीहड़ क्षेत्रों में इको-टूरिज्म की वैज्ञानिक संभावनाओं का अध्ययन कराया जाए।
10. सफल मॉडलों का दस्तावेजीकरण कर उन्हें अन्य बीहड़ क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार लागू किया जाए।
श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कहा कि बीहड़ को समस्या के रूप में देखने के साथ-साथ उसके भीतर छिपी पर्यावरणीय, आर्थिक और पर्यटन संभावनाओं को पहचानना समय की आवश्यकता है। यदि वैज्ञानिक शोध, स्थानीय अनुभव, आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं को एक मंच पर लाया जाए तो बीहड़ क्षेत्रों का पुनरुद्धार केवल भूमि सुधार की परियोजना नहीं, बल्कि जल सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण रोजगार और समावेशी विकास का मॉडल बन सकता है।
उन्होंने कहा कि बीहड़ विकास की सफलता का वास्तविक प्रमाण कागज पर खर्च हुई राशि नहीं, बल्कि धरातल पर घटता कटाव, बढ़ता जल-संचय, विकसित हरित आवरण, बेहतर आजीविका और स्थानीय लोगों के जीवन में आया सकारात्मक परिवर्तन होना चाहिए।