फसल अवशेष प्रबंधन पर कृषक प्रशिक्षण सह जागरूकता कार्यक्रम आयोजित
ग्वालियर। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद जोन-9 जबलपुर द्वारा जिले में फसल अवशेष प्रबंधन हेतु कृषि विज्ञान केन्द्र, ग्वालियर का चयन किया गया है। जिले में धान-गेहूं फसल पद्धति का व्यापक रूप से प्रचलन है। धान एवं गेहूं की कटाई के उपरांत अनेक कृषकों द्वारा खेतों में नरवाई जलाने की समस्या सामने आती है। यह समस्या विशेष रूप से डबरा एवं भितरवार विकासखण्डों में अधिक देखने को मिलती है।
फसल अवशेष प्रबंधन के प्रति कृषकों को जागरूक एवं प्रशिक्षित करने तथा खेतों में फसल अवशेष प्रबंधन की विभिन्न तकनीकों के प्रदर्शन के उद्देश्य से कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा ग्राम स्तर पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में भितरवार विकासखण्ड के ग्राम निकोड़ी में फसल अवशेष प्रबंधन विषय पर एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण-सह-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. राजीव सिंह चैहान ने कृषकों को फसल कटाई के उपरांत नरवाई जलाने से होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि नरवाई जलाने से भूमि में पाए जाने वाले लाभदायक कीट, केंचुए एवं उपयोगी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे मृदा की उर्वरता एवं गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही नरवाई जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव मानव स्वास्थ्य, पशु-पक्षियों एवं पर्यावरण पर पड़ता है। केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. एस.सी. श्रीवास्तव ने फसल अवशेष प्रबंधन को वर्तमान समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बताते हुए कहा कि फसल अवशेषों को खेत में मिलाने से मृदा की भौतिक एवं जैविक दशा में सुधार होता है। कार्यक्रम में ग्राम निकोड़ी के कृषक महेश रावत, बृजमोहन रावत, भरत रावत, अजमेर रावत, श्रीमती ऊंषा रावत, श्रीमती संगीता रावत इत्यादि के साथ 75 कृषकों ने सहभागिता की।