प्रसिद्ध दार्शनिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, पत्रकार एवं क्रांतिकारी समाजवादी विचारक कॉमरेड कार्ल मार्क्स जयंती पर संगोष्ठी संपन्न
*मार्क्स, जिन्होंने पूंजीवाद को चुनौती देकर कम्युनिज्म की नींव रखी*--------
*कौशल शर्मा एडवोकेट भा क पा*
ग्वालियर । भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कार्यालय सरवटे भवन हजीरा ग्वालियर पर विश्व के प्रसिद्ध श्रमिक वर्ग की आवाज बुलंद करने वाले विचारक , दार्शनिक , अर्थशास्त्री पत्रकार एवं क्रांतिकारी समाजवादी विचारक कॉमरेड कार्ल मार्क्स की जयंती के अवसर पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मध्य प्रदेश राज्य कार्यकारिणी सदस्य कॉमरेड कौशल शर्मा एडवोकेट कॉम रवीन्द्र सरवटे एडवोकेट,कॉम रतन कुमार वर्मा , कॉम भूपेश पलरिया ने कार्ल मार्क्स की जीवनी पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहां की कार्ल मार्क्स का जन्म 05 मई 1818 को जर्मनी के रेन प्रांत के ट्रियर नगर मैं एक यहूदी परिवार में हुआ था 1824 में उनके परिवार ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया 17 वर्ष की उम्र में मार्क्स ने कानून का अध्ययन करने के लिए बॉन विश्वविद्यालय जर्मनी में प्रवेश लिया। बर्लिन और जेना विश्वविद्यालय में साहित्य, इतिहास और दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया इसी काल में हीगेल के नैतिक दर्शन से बहुत प्रभावित हुए और कई लेख लिखें। 1839- 41 में उन्होंने दिमाक्रितस ओर ऐपीक्यूरस से प्राकृतिक दर्शन शास्त्र पर शोध पत्र लिखकर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। अपने राजनीतिक प्रकाशनों के कारण मार्क्स को राज्य विहीन हो गए और दशकों तक लंदन में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ निर्वासन में रहे।
कार्ल मार्क्स श्रमिक वर्ग की आवाज देने वाले विचारक, दार्शनिक ,क्रांतिकारी थे । 1948 में पेरिस में मार्क्स से फ्रेडरिक एंगेल्स से मुलाकात हुई दोनों ने मिलकर *कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो* लिखा,आर्थिक संघर्षों के बीच मार्क्स ने लंदन में रहते हुए *दास कैपिटल* लिखी जिसे 200 से अधिक भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है।
मार्क्स ने दुनिया को दिखाया की पूरी पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूर का शोषण कैसे होता है । उन्होंने स्पष्ट किया कि मजदूर और उसे अर्जित मूल्य यानी पूरी मेहनत मूल्य नहीं मिलता बल्कि उसका "अवेतनिक श्रम " ही पूंजीपति का मुनाफा है।
*मार्क्स ने कहा था _मजदूरी दी नहीं जाती छीनी जाती है*
जब हम न्यूनतम वेतन की मांग करते हैं तो हम साफ करते हैं कि यह भीख नहीं हमारे द्वारा अर्जित मूल्य का हक है। यह संघर्ष का मैदान है जहां मजदूर और पूंजी के बीच टकराव होता है पिछले 12 वर्षों में मोदी की केंद्र सरकार और भाजपा शासित राज्य सरकारों के माध्यम से ट्रेड यूनियन और श्रमिक अधिकारों पर लगातार हमले किए है । ये हमले 2015 में कुख्यात "मेकइन इंडिया" से शुरू होकर 2018 में "फिक्स्ड टर्म रोजगार" की शुरुआत कोविड-19 के दौरान मजदूरी और कार्य समय से जुड़े श्रम कानून में बार-बार ढील और हाल ही में चार श्रम संहिताओं के रूप में सामने आए हैं इन सभी हमले का साझा उद्देश्य भारत के बड़े एकाधिकार पूजीपतियों के शासक वर्ग को खुश करना है। इन नीतियों को "ईज ऑफ डूइंग बिजनेस" "प्रतिस्पर्धी संघवाद" ओर "इंस्पेक्टर और लाइसेंस राज का अंत" जैसे आकर्षक शब्दों में पेश किया जाता है लेकिन वास्तविकता इन कॉरपोरेट प्रचारकों द्वारा गढ़ी गई कल्पनाओं से बिल्कुल अलग है। आज का भारत इतिहास का सबसे असमान समाज बन चुका है । फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने अपनी रचना"फ्रॉम द ब्रिटिश राज टू द बिलियनेयर राज" में बताया है कि आज की आय असमानता ब्रिटिश उपनिवेशकाल से भी अधिक है। स्वतंत्रता के बाद जमींदारी उन्मूलन,सीमित भूमि सुधार, प्रिवीपर्स समाप्ति, बैंकों के राष्ट्रीयकरण और सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उपक्रमों की स्थापना से जो सामाजिक- आर्थिक उपलब्धियां हासिल हुई थी वे पिछले तीन दशकों के बेलगाम क्रोनी पूंजीवाद और नवउदारवाद के दौर में पूरी तरह उलट दी गई है।वर्तमान की केंद्र सरकार का लचीलापन और प्रतिस्पर्धा और श्रम और श्रम सुधार के नाम पर मजदूरों के अधिकारों को कुचल रही है। कार्ल मार्क्स के विचारों को आज के भारत की जमीन पर और मजदूर वर्ग की चेतना में जिंदा रखना आवश्यक है, मजदूरों के श्रम अधिकारो के ऐतिहासिक, सैद्धांतिक, और क्रांतिकारी विचारों की जानकारी देते हुए उनके सिद्धांतो पर कार्य करने का संकल्प लेते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।
संगोष्ठी सभा में कॉम कौशल शर्मा, कॉम रविंद्र सरवटे एडवोकेट, कॉम रतन कुमार वर्मा,कॉम प्रकाश वर्मा , कॉम अनवर खान,कॉम जालिम सिंह, कॉम बारेलाल पाल, कॉम बी डी धूपर,कॉम सुरेश वर्मा, कॉम आनंद ठाकुर,कॉम बिरखा राम,कॉम भूपेश पलरिया, कॉम सौरभ श्रीवास्तव,कॉम अशोक कुमार वर्मा,कॉम करन पटेरिया, कॉम अशोक राठौर, कॉम सुशिल,कॉम ज्ञान देवी वर्मा आदि बड़ी संख्या में साथियों ने भाग लिया।