युद्धकाल में मानव अधिकारों के संरक्षण का प्रश्न
(आलोक बन्धु श्रीवास्तव )
वर्तमान में समूचे विश्व पटल पर विभिन्न देशों के बीच शक्ति और वर्चस्व की लडाई जो कि एक गंभीर युद्ध में परिवर्तित हो चुकी है मानव अधिकारों की रक्षार्थ बनाये गये कानूनों, मानव अधिकारों के लिये कार्य करने वाली राश्ट्रीय एवं अन्र्तराश्ट्रीय संस्थाओं की जीवन्तता पर प्रश्न चिन्ह खडा कर रही है, आधुनिक मिसाईलों, गोला बारूद्ध से सिर्फ इन युद्धग्रस्त देशों में ही मानव जीवन और मानव अधिकार दम नहीं तोड रहे बल्कि संलग्न सभी देषों में मानव जीवन त्राहीमाम कर उठा है, उर्जा संसाधनों एवं खाध्य सामग्री की कमी, चिकित्सकीय सुविधाओं के अभाव से गंभीर बीमारियों का बढता खतरा, अराजकता, आक्रेाष, साम्प्रदायिक उन्माद, देशों के अन्दर घरेलू अन्दरूनी अस्थिरता को जन्म दे रहा है। वर्तमान गंभीर सामरिक हालात के दौर में संयुक्त राश्ट्र संघ जैसी संस्थायें भी धृतराश्ट्र की तरह आंखों पर पटटी बांधे मानव अधिकारों की धज्जियां उडते देख रही है ।
विश्व परिदृष्य पर मानव अधिकारों की सार्थकता के विशय में भ्रम की स्थिति है । अन्र्तराश्ट्रीय स्तर पर एमनेस्टी इंटरनेषनल के साथ दुनिया भर के देषों में सरकारी व निजी तौर पर मानवाधिकार संगठन और अनेक समूह कार्य रहे हैं, फिर भी मानवाधिकारों की स्थिति विसंगतियों पूर्ण है । वर्तमान में अन्र्तराश्ट्रीय स्तर पर, अनेक देषों में युद्ध और गृहयुद्ध की स्थिति है, विगत कुछ समय पूर्व ही पडौसी देषों में कटटरवाद, के कारण उपजी विघ्वंषक स्थिति भी किसी से छिपी नहीं रही, इन देषों में अपनी ही सरकार के विरूद्ध आमजन का विद्रोह, और इस बहाने जाति, धर्म, सम्प्रदाय के नाम पर अराजकता, षोशण, और मानव अधिकारों का खुले आम गला घोंटा गया फिर भी, क्या विश्व भर के मानव अधिकार संगठनों ने इस पर संज्ञान लिया , उत्तर है नहीं, मानव अधिकार संरक्षण के ये ठेकेदार संगठन आतंकबाद को अपने अपने तरीके से परिभाशित करते रहे हैं । जबकि हर परिस्थिति में आतंकवाद मानव जीवन के लिये घातक ही होता है । यही कारण है कि इन संगठनों की सार्थकता और प्रभावषीलता प्रष्नों के घेरे में हैं ।
जहां तक भारतीय परिदृष्य में मानव अधिकारों का प्रष्न है, इसका विष्लेशण निष्चिित रूप से सुखद परिणामकारक प्रतीत होता है । वर्तमान समय में भारत ही एक मात्र ऐसा देष है जो सामाजिक समरसता, से ओतप्रोत होकर आिर्थक, सामाजिक, धार्मिक, सुरक्षा के सभी क्षैत्रों में विश्वभर के लिये उन्नतिकारक एवं आषा का केन्द्र बना हुआ है । भगवान राम, कृश्ण, बुद्ध, भगवान महावीर, गुरूनानक की इस धरा पर मानव अधिकारों का सिद्धांत हमेषा से भारत की मूल अवधारणा में रहा है, भारतीय संविधान के सृजन का आधार भी मूल अधिकार समानता, और लोक कल्याणकारी राज्य का रहा । भारतीय संस्कृति के मूल में भी सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय के लक्ष्य के साथ समाज के अंतिम पायदान पर खडे व्यक्ति के कल्याण का ध्येय हमेषा रहा । देष के संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 17, 19, 20, 21, 23, 24, 39, देष के मानवाधिकारों की रक्षा के लिये स्थापित है इस दिषा में कार्य करने हेतु भारत में राश्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं देष के राज्यो में राज्य मानव अधिकार आयोग एवं अनेकों निजी संगठन अपनी भूमिका निभा रहे हैं । अन्र्तराश्टीय स्तर पर मानव जीवन की अभिरक्षा, सम्मानपूर्ण जीवन, षिक्षा, चिकित्सा, साफ स्वच्छ प्रदूशण मुक्त वातावरण,, महिलाओं के प्रतिश्ठापूर्ण व्यवहार का अधिकार, साफ स्वच्छ पेय जल, खाध्यान सुरक्षा आदि कई मानव अधिकार संयुक्त राश्ट्र संध द्वारा मान्य किये गये हैं कम से कम भारत में तो जीवन्त होकर देष के विकास को गति प्रदान कर रहे हैं ।
किसी भी देष के विकास के लिये उस देष का सामाजिक विकास आवष्यक है और सामाजिक विकास के लिये उस देष की समस्याओं जैसे भूखमरी, गरीबी, असमानता, अराजकता, धार्मिक कट्ररता, असहिंश्णुता, भृश्टाचार, और राश्ट्र विरोधी गतिविधियों पर नकेल कसना आवष्यक है । क्या विष्वभर की सरकारें और वहां के स्थानीय षासन इस दिषा में कार्य कर पा रहे हैं संषय है क्योंकि विभिन्न देषों के बीच वर्तमान युद्धकाल मानव जीवन को, अंधकार में धकेलने की परिस्थिति पैदा कर चुका है । मानव जीवन के विकास की अवधारणा को मानव अधिकारों की रक्षा ही पूरक बनाती है । कानून के षासन में मानवीय अधिकारों की रक्षा, स्वतंतत्रता का सम्मान, आर्थिक और सामाजिक कल्याण, और इन सबके प्रति जिम्मेदार सुषासन महत्वपूर्ण हैं । पर आज क्षैत्रवाद, जाति सम्प्रदाय का हथियारों के बल पर विस्तार, और न्यूक्लियर हथियारों की होड ने मानव जीवन मूल्यहीन बना दिया प्रतीत होता है, वर्तमान परिस्थिति में समूचे विष्व में आतंकवाद एक विराट समस्या है, जो मानव अधिकारों को ही नहीं बल्कि मानव जीवन को ही नश्ट कर रही है ।
कुछ वर्शों पूर्व ही कोविड-19 जैसी महामारी ने जहां समूचे विष्व की मानवजाति में हाहाकार मचा दिया था, कोरोनाकाल सिर्फ मानव जीवन के लिये खतरा ही नहीं था, बल्कि संवेदनाओं, पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों को नश्ट करने का कारण भी बना, महामारी के इस दौर में भारत जैसे विषाल देष ने मानव अधिकारों की रक्षार्थ उसके संविधान की मूल अवधारणा के अनूकूल सुषासन से कोरोना जैसी महामारी पर विजय हांसिल की, जहां मानव अधिकारों की रक्षार्थ देष ही नहीं विष्वभर के अनेक देषों में वेक्सीनेषन एवं निषुल्क चिकित्सा, खाध्यान की आपूर्ति जैसी सुविधा उपलबध करा कर, मानव जीवन की रक्षा की ।
भारत में मानव अधिकारों के लिये हर कदम राम राज्य एवं महात्मा गांधी के स्वराज के प्राचीन मूल्यों पर आधारित है, महाभारत काल में युद्ध रोकने के लिये श्री कृश्ण का षांति प्रस्ताव मानव अधिकारों की रक्षार्थ उत्कृश्ठ प्रयास था । एक समृद्ध और सुषासित राश्ट्र के लिये जातिवाद, सम्प्रदायिक भेदभाव, आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, जनसंख्या वृद्धि पर नकेल कसना आवष्यक है । विष्वभर मे कार्य कर रहे मानव अधिकार संगठनों को अपनी विसंगतिपूर्ण छवि से निकलकर, मानव जीवन को सामरिक स्थिति में सुरक्षित करने, मानव जाति को सर्वोत्तम देनेे, मानव जीवन को संर्कीणवाद, क्षैत्रवाद से निकाल कर सहज, सरल, भयमुक्त और प्रभावषील बनाने के लिये अपने उदेष्यों के अनुरूप अपनी प्रभावषीलता दिखानी होगी ।
समस्त विष्व में अधिकांश देशों के बीच अराजकता, वैमनस्यता के कारण चल रहे युद्ध के कारण, मानव रक्षक की जगह भक्षक ना बन जाये भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध के सदआचरण उनके बताये सिद्धान्तों को अपना कर मानव जीवन को संरक्षित एवं उन्नति कारक बना सकते हैं । समाज में एकता, समानता, मैत्री न्याय एवं विश्वबन्धुत्व का भाव हो सके, अश्टांग योग में भगवान बुद्ध ने यही धर्मोपदेश दिया है । शांति और सदभाव का मार्ग दुर्गम हो सकता है परन्तु कठिन नहीं । ससुशासित और शांतिपूर्ण राष्ट्र के निर्माण के लिये युद्ध समस्या का हल नहीं भारतीय दृश्टिकोण में व्याप्त बुद्ध के बताये सदमार्ग से ही मानव अधिकार सुरक्षित और जीवन्त रह सकते हैं ।
आलोक बन्धु श्रीवास्तव
लेखक-उच्च न्यायालय के अधिवक्ता है।