सुख नहीं दे सकता अनैतिक रूप से कमाया धन: संत रमेश भाई
दंदरौआ धाम में श्रीमद् भागवत कथा का पांचवां दिन
ग्वालियर। संसार में रहकर धन कमाना गलत नहीं है, क्योंकि बिना पैसे के संसार नहीं चलता। धन नीतिपूर्वक कमाना चाहिए। अनीति से कमाया धन कभी सुख नहीं देता। यह विचार संत रमेश भाई ओझा ने रविवार को दंदरौआ धाम में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पांचवें दिन व्यक्त किए। इस मौके पर मनाया गया नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की सुन श्रोता झूम उठे।
उन्होंने कहा कि जल्दी पैसा और प्रतिष्ठा कमाने की होड़ में हम यह भूल जाते हैं कि हमारी बदनामी भी हो सकती है। आजकल कहा जाता है कि जिसका नाम होता है, वही बदनाम होता है, लेकिन यह सोच ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि सत्ता, पैसा और प्रतिष्ठा व्यक्ति को अभिमानी बना देते हैं। जब तक सद्गुरु के चरणों की कृपा नहीं होती, तब तक अभिमान से बचना कठिन है।
भाई श्री ने कहा कि संसार में सुख अकेला नहीं आता, बल्कि अपने साथ दुख भी लेकर आता है। यह मृगमरीचिका की भांति है। संसार में सुख दिखता तो है, लेकिन होता नहीं है। जिस पुत्र को पैदा करके हम खुश होते हैं, कई बार वही हमें रुलाता है।
पूर्ण समर्पण है प्रेम
संत रमेश भाई ने कहा कि प्रेम में कोई सौदा नहीं होता। कंडीशन तो सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट में होती है। प्रेम में तो सिर्फ समर्पण होता है।
चाह के साथ राह भी ठीक हो
उन्होंने कहा कि भगवत प्राप्ति और शांति तो सभी चाहते हैं। चाहत तो रावण और सूर्पणखा की भी गलत नहीं थी। सूर्पणखा भी भगवान को पाना चाहती थी, लेकिन उसका रास्ता गलत था। भगवान को पाना और पैसा कमाना तो सब चाहते हैं, लेकिन शांति और सुख तभी मिलता है, जब हमारी राह ठीक हो।
नित्य पूजा-पाठ और सत्संग करें
उन्होंने कहा कि गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए मां-बाप के प्रति कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए। थोड़ा समय प्रतिदिन पूजा-पाठ और सत्संग के लिए निकालना चाहिए। जब हम नित्य भगवान का ध्यान करते हैं, तो विपरीत समय में भी दुख नहीं होता है। समय परिवर्तनशील है, दुख के बाद सुख आता है। परिस्थितियां तो बदल जाती हैं, लेकिन मनःस्थिति नहीं बदलनी चाहिए। हवा का रुख किधर भी हो, लेकिन नाविक की नाव वहीं पहुंचती है, जहां वह उसे ले जाना चाहता है। इसी प्रकार परिस्थिति के अनुसार हमारा लक्ष्य नहीं बदलना चाहिए।
गरीबों से प्रेम करो, गरीबी से नहीं
ओझा ने कहा कि दरिद्रता जैसा दुख नहीं और सत्संग जैसा सुख नहीं है। गरीबों से प्रेम रखो, लेकिन गरीबी से प्रेम मत रखो। यदि गरीबी से प्रेम रखोगे, तो आर्थिक तरक्की नहीं होगी। दरिद्रता दूर होनी चाहिए।
खुद को नहीं, भगवान को प्रसन्न करने के लिए करें सेवा
उन्होंने कहा कि सेवा वही है, जिसमें सेव्य प्रसन्न हो। यदि सेवा से सेवक प्रसन्न होता है, तो वह भोग है। उन्होंने बताया कि संत या गुरु के पास जाओ, तो उन्हें बालक और खुद को खिलौना समझकर जाओ। इस भाव से जाओगे, तो संत आपको देखकर वैसे ही प्रसन्न होंगे, जैसे खिलौना देखकर बालक प्रसन्न हो जाता है। उन्होंने कहा कि सिर्फ श्लोक पढ़ लेने से काम नहीं चलता, उनका गूढ़ अर्थ सद्गुरु ही बता सकते हैं। उन्होंने बताया कि दूध में घी है लेकिन उसे दिया नहीं चलता एक निश्चित प्रक्रिया के बाद ही उसमें से घी निकलता है। भगवान को गाय के दूध घी से बनी मिठाइयों का भोग लगाना चाहिए।
इस अवसर पर दंदरौआधाम के महामंडलेश्वर रामदास महाराज, संत अवधबिहारी दास, पूर्व मंत्री डॉ गोविंद सिंह,कथा यजमान व पूर्वमंत्री अनूप मिश्रा.पूर्व मंत्री गिर्राज दंडोतिया, समाजसेवी अशोक भारद्वाज, आशीष शर्मा, ब्राह्मण महासभा के जिला अध्यक्ष ओमप्रकाश पुरोहित ,समाजसेवी रामशंकर शर्मा,देवेश शर्मा. रामबरन पुजारी, जलज त्रिपाठी, प्रदीप त्रिवेदी, वीरेंद्र राणा, कपिल भारद्वाज, शिवशंकर कटारे, अम्बरीष आचार्य सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।।