भारत की शाश्वत पहचान है हिंदुत्व : सुरेन्द्र शर्मा
भारत केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से विकसित होती एक जीवंत सभ्यता है। इसकी पहचान नदियों, पर्वतों, नगरों और सीमाओं के साथ उन विचारों, संस्कारों और परंपराओं से बनती है, जिन्होंने पीढ़ियों को आपस में जोड़ा है। भारत की इसी सांस्कृतिक निरंतरता को समझने का एक दृष्टिकोण हिंदुत्व है। इस संदर्भ में हिंदुत्व का अर्थ हिंदू सभ्यता से विकसित उस व्यापक सांस्कृतिक चेतना से है, जिसमें जीवन के प्रति श्रद्धा, कर्तव्यबोध, आध्यात्मिक खोज और लोककल्याण का भाव समाहित है।
“भारत की पहचान हिंदुत्व” का विचार अपनी सार्थकता तब प्राप्त करता है, जब वह सांस्कृतिक आत्मबोध के साथ प्रत्येक भारतीय की समान गरिमा को स्वीकार करे। भारत अनेक धर्मों, भाषाओं और समुदायों का साझा देश है। इसलिए उसकी सांस्कृतिक जड़ों का सम्मान और उसकी विविधता का आदर एक साथ चलना चाहिए। अपनी विरासत पर गर्व का श्रेष्ठ रूप वह है, जो हमें आत्मविश्वासी, उदार और उत्तरदायी बनाए तथा देश के प्रत्येक नागरिक में अपनत्व का भाव जगाए।
भारत की सभ्यता की एक विशिष्ट विशेषता सत्य की खोज रही है। यहाँ जीवन के गहरे प्रश्नों पर चिंतन हुआ—मनुष्य कौन है, उसका कर्तव्य क्या है और जीवन का उद्देश्य क्या होना चाहिए? वेदों, उपनिषदों, गीता तथा विभिन्न दर्शन-परंपराओं में इन प्रश्नों के अनेक उत्तर मिलते हैं। विचारों की यह बहुलता भारतीय बौद्धिक जीवन की समृद्धि है। सांस्कृतिक अर्थ में हिंदुत्व की शक्ति इसी जिज्ञासा में देखी जा सकती है, जहाँ श्रद्धा के साथ प्रश्न करने और समझने के लिए भी स्थान हो।
हिंदू परंपरा में धर्म का संबंध पूजा-पद्धति के अतिरिक्त आचरण और कर्तव्य से भी है। सत्य बोलना, न्याय करना, निर्बल की सहायता करना, माता-पिता की सेवा करना और अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करना धर्म के व्यावहारिक रूप हैं। इस दृष्टि से हिंदुत्व की पहचान व्यक्ति के व्यवहार में प्रकट होनी चाहिए। मंदिर में प्रार्थना के साथ समाज के दुख को समझना और उसे दूर करने का प्रयास करना हमारी सांस्कृतिक चेतना को जीवन में उतारता है।
“वसुधैव कुटुम्बकम्” का भाव भारतीय चिंतन की व्यापकता का सुंदर परिचायक है। समस्त पृथ्वी को परिवार मानने वाली दृष्टि हमें अपने हितों के साथ दूसरों की आवश्यकताओं और सम्मान के प्रति भी संवेदनशील बनाती है। परिवार में मतभेद हो सकते हैं, फिर भी संबंधों का आधार आत्मीयता रहता है। इसी प्रकार समाज में विविध विश्वासों और जीवन-पद्धतियों के बीच संवाद बना रहना चाहिए। अपने धर्म के प्रति निष्ठा और दूसरे की आस्था के प्रति सम्मान, दोनों मिलकर सामाजिक सद्भाव को मजबूत करते हैं।
भारत की सांस्कृतिक एकता उसकी विविध अभिव्यक्तियों में दिखाई देती है। अलग-अलग क्षेत्रों के मंदिर, लोकदेवता, उत्सव, कथाएँ और भाषाएँ अपनी विशिष्टता रखते हुए भी अनेक साझा सूत्रों से जुड़े हैं। रामायण और महाभारत की कथाएँ विभिन्न भाषाओं और कलाओं में नए रूप ग्रहण करती रही हैं। तीर्थयात्राओं ने दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों को मिलने और एक-दूसरे को जानने के अवसर दिए हैं। इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने भारत की पहचान को समृद्ध और उसकी आत्मीय एकता को सुदृढ़ किया है।
इस विरासत का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व सामाजिक समरसता है। यदि हम प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वरीय अंश देखते हैं, तो जन्म और जाति के आधार पर अपमान या भेदभाव का कोई औचित्य नहीं रह जाता। संतों और समाज-सुधारकों की अनेक धाराओं ने मानव गरिमा, भक्ति और समानता पर बल दिया है।शिक्षा, सम्मान, अवसर और सार्वजनिक जीवन में समान भागीदारी सुनिश्चित करना सांस्कृतिक एकता की ठोस कसौटी है। समरस समाज ही सशक्त राष्ट्र का आधार बनता है।
भारतीय सांस्कृतिक चेतना में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भी विशेष स्थान है। नदियों, वृक्षों, पर्वतों और जीव-जंतुओं के प्रति श्रद्धा मनुष्य को अपने परिवेश से जोड़ती है। वर्तमान समय में इस भावना को पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में बदलना आवश्यक है। नदी को माता मानने का संकल्प उसकी स्वच्छता की जिम्मेदारी लेने में दिखाई देना चाहिए। वृक्षों के प्रति सम्मान पौधरोपण और उनकी देखभाल में प्रकट हो। जल बचाना, प्रदूषण घटाना और संसाधनों का संयमित उपयोग हमारी परंपरा को समकालीन अर्थ देते हैं।
नारी के प्रति सम्मान भी हमारी सांस्कृतिक पहचान की महत्वपूर्ण कसौटी है। शक्ति, ज्ञान और समृद्धि के स्त्री स्वरूपों की आराधना करने वाला समाज महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षा, स्वतंत्र निर्णय और नेतृत्व के अवसरों के प्रति सजग रहे। मातृशक्ति का सम्मान दैनिक व्यवहार और संस्थागत व्यवस्थाओं में दिखाई देना चाहिए। बेटियों को आगे बढ़ने का अवसर देना, महिलाओं की उपलब्धियों को स्वीकार करना और उनके अधिकारों की रक्षा करना सांस्कृतिक मूल्यों की सार्थक अभिव्यक्ति है। इससे परिवार, समाज और राष्ट्र तीनों मजबूत होते हैं।
सेवा की भावना भारतीय जीवन-दृष्टि को धरातल देती है। भूखे को भोजन, रोगी को उपचार, विद्यार्थी को शिक्षा और संकटग्रस्त व्यक्ति को सहारा देना लोककल्याण के प्रत्यक्ष कार्य हैं। सेवा का मूल्य तब और बढ़ जाता है, जब सहायता पाने वाले की जाति, धर्म या भाषा के आधार पर भेद न किया जाए। राष्ट्र के प्रति प्रेम अपने आसपास के लोगों के प्रति जिम्मेदारी से शुरू होता है। स्वच्छता, ईमानदार श्रम, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा और जरूरतमंद की सहायता प्रत्येक नागरिक के लिए राष्ट्रसेवा के सुलभ मार्ग हैं।
आधुनिक भारत में सांस्कृतिक स्वाभिमान को वैज्ञानिक दृष्टि, लोकतांत्रिक संवाद और संवैधानिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ना चाहिए। हमारा संविधान सभी नागरिकों की समानता और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इन मूल्यों का सम्मान राष्ट्रीय एकता को विश्वसनीय आधार देता है। इसी प्रकार परंपरा के प्रति सम्मान हमें अध्ययन, अनुसंधान और नवाचार के लिए प्रेरित करे। युवा अपनी भाषाओं, साहित्य और इतिहास को जानें तथा आधुनिक विज्ञान और तकनीक में उत्कृष्टता प्राप्त करें। अपनी जड़ों से जुड़ा समाज भविष्य के प्रति अधिक आत्मविश्वास से बढ़ सकता है।
इस प्रकार “भारत की पहचान हिंदुत्व” को सांस्कृतिक उत्तरदायित्व के रूप में समझा जा सकता है। इसकी श्रेष्ठ अभिव्यक्ति सत्य, करुणा, सेवा, समरसता और कर्तव्यनिष्ठा में होगी। भारत की सभ्यतागत विरासत का गौरव तभी सार्थक होगा, जब उसका प्रकाश हर नागरिक के जीवन तक पहुँचे। ऐसा आत्मबोध हमें अपनी परंपराओं से शक्ति लेने, अपनी कमियों को सुधारने और सबके लिए सम्मानपूर्ण भविष्य बनाने की प्रेरणा देता है। यही भावना भारत की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत रख सकती है और राष्ट्र को एकजुट होकर आगे बढ़ने का आधार दे सकती है।
स्वामी विवेकानंद के विचारों में हिंदू धर्म का गौरव, वेदांत की व्यापकता, आत्मविश्वास और मानवसेवा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। 11 सितंबर 1893 के शिकागो भाषण में उन्होंने हिंदू धर्म के प्रति गर्व व्यक्त करते हुए कहा कि इसकी परंपरा विश्व को सहिष्णुता और सभी धर्मों की स्वीकृति सिखाती है। उनके लिए अपनी आस्था के प्रति निष्ठा के साथ दूसरी आस्थाओं का आदर भी आवश्यक था, उनकी व्याख्या में प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दिव्यता मौजूद है। इसी आधार पर वे मनुष्य को स्वयं को दुर्बल और असमर्थ मानने से ऊपर उठने की प्रेरणा देते हैं। आत्मविश्वास उनके आध्यात्मिक संदेश का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
वे चाहते थे कि वेदांत का आदर्श दैनिक जीवन में दिखाई दे। आध्यात्मिक ज्ञान के नाम पर किसी व्यक्ति या वर्ग द्वारा श्रेष्ठ अधिकार का दावा करने की उन्होंने आलोचना की। उनका आग्रह था कि एकता का सिद्धांत हमारे सामाजिक व्यवहार में भी लागू हो। उन्होंने स्पष्ट रूप से सबके लिए समान अवसर और किसी के लिए विशेषाधिकार न होने की बात कही। उनके अनुसार, व्यवसाय या सामाजिक स्थिति अलग होने से किसी मनुष्य का आध्यात्मिक मूल्य कम नहीं होता; वही दिव्यता सभी में है। शिकागो धर्म संसद के अंतिम संबोधन में उन्होंने धार्मिक परंपराओं के बीच सहयोग और सामंजस्य की कामना की। उनका विचार था कि अपनी विशिष्टता बनाए रखते हुए दूसरे से अच्छी बातें ग्रहण की जा सकती हैं। उनकी हिंदू चेतना को सांस्कृतिक स्वाभिमान, आध्यात्मिक उदारता, मानव गरिमा और सेवाभाव के समन्वय के रूप में समझा जा सकता है।
पूज्य महात्मा गांधी जी स्वयं को ‘सनातनी हिंदू’ कहते थे। उनके लिए हिंदू धर्म सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम और सभी धर्मों के प्रति आदर का मार्ग था। गांधीजी वेदों, उपनिषदों, पुराणों, अवतार और पुनर्जन्म में विश्वास व्यक्त करते थे। साथ ही, वे किसी धार्मिक व्याख्या को केवल विद्वानों के समर्थन के कारण स्वीकार करने को तैयार नहीं थे, यदि वह विवेक और नैतिकता के विरुद्ध हो। गांधी जी की दृष्टि में धर्म का मूल्य मनुष्य के आचरण से प्रकट होता है। वे अहिंसा को सभी धर्मों में उपस्थित मानते थे और हिंदू धर्म में उसकी विशेष अभिव्यक्ति देखते थे।
गांधीजी मानते थे कि अन्य धर्मों का श्रद्धापूर्वक अध्ययन करने से अपने धर्म में उनकी आस्था कम नहीं हुई। वे दूसरे धर्मों को उनके अनुयायियों के दृष्टिकोण से समझने का आग्रह करते थे।
उन्होंने अस्पृश्यता को हिंदू धर्म पर कलंक माना और जन्म के कारण किसी व्यक्ति को अछूत समझने का विरोध किया। उनके अनुसार, धार्मिक परंपरा को भी मानवता, विवेक और नैतिकता की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
गांधीजी स्वयं को सुधारक मानते थे। किसी प्रथा के प्राचीन होने को वे उसके उचित होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं मानते थे; बालविवाह और अस्पृश्यता जैसी प्रथाओं की आलोचना इसी दृष्टि से करते थे।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों में हिंदुत्व का प्रमुख व्यावहारिक रूप था—हिंदू समाज का संगठन, सांस्कृतिक स्वाभिमान और राष्ट्र के प्रति समर्पित चरित्र का निर्माण,उनकी दृष्टि में जाति और अन्य आधारों पर बँटे हिंदू समाज में सामूहिकता पैदा करना महत्वपूर्ण था। संघ का इतिहास इन विभाजनों को सामाजिक दुर्बलता का कारण बताते हुए उनके प्रयासों को साझा पहचान और एकता विकसित करने से जोड़ता है।
उनके लिए संगठन की नींव ऐसे व्यक्ति थे, जिनमें अनुशासन, निःस्वार्थ भाव और मातृभूमि के लिए त्याग की तत्परता हो। संघ द्वारा प्रकाशित जीवन-विवरण में व्यक्ति के इस निर्माण को उनके कार्य का केंद्रीय उद्देश्य बताया गया है। डॉ. हेडगेवार ने हिंदुत्व को संगठित हिंदू समाज और राष्ट्रनिर्माण के लिए समर्पित जीवन के रूप में कार्यान्वित करने का प्रयास किया। डॉक्टर हेडगेवार ने स्पष्ट रूप से कहा
> “मैं, केशव बलिराम हेडगेवार, कहता हूँ कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है।”
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद स्वयं को आस्था और दैनिक आचरण से ‘सनातनी हिंदू’ कहते थे। उनके विचारों में अपनी धार्मिक विरासत पर गर्व, सभी धर्मों का सम्मान और नागरिक समानता साथ-साथ थे। उनके विचारों का स्पष्ट उदाहरण 11 मई 1951 का सोमनाथ मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा भाषण है। उन्होंने सोमनाथ के पुनर्निर्माण को भारतीय आस्था और संस्कृति की जीवंतता का प्रतीक माना।
विनायक दामोदर सावरकर के लिए हिंदुत्व एक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान की अवधारणा थी, जिसका दायरा धार्मिक आस्था और पूजा-पद्धति से व्यापक था। उन्होंने 1923 में प्रकाशित ‘Essentials of Hindutva’ में इसे व्यवस्थित रूप दिया। सावरकर ने हिंदू धर्म को धार्मिक मतों और आध्यात्मिक परंपराओं से संबंधित माना। हिंदुत्व में उन्होंने हिंदुओं का साझा इतिहास, पूर्वजों से संबंध, संस्कृति और राष्ट्रीय जीवन भी सम्मिलित किया।
सावरकर के अनुसार हिंदू वह है जो भारत को अपनी पितृभूमि, अर्थात पूर्वजों की भूमि, और पुण्यभूमि, अर्थात अपनी धार्मिक परंपरा की उद्गमभूमि, दोनों माने। इसलिए उनकी अवधारणा में भूगोल के साथ धार्मिक-सांस्कृतिक संबंध भी आवश्यक था। उन्होंने हिंदुत्व के आधारों में साझा राष्ट्र, साझा वंशगत संबंध तथा साझा संस्कृति को प्रमुखता दी। संस्कृति के अंतर्गत भाषा, साहित्य, कला, इतिहास, संस्कार और उत्सव आते थे। उनका वंश संबंधी विवेचन विभिन्न समुदायों के ऐतिहासिक मेल को भी स्वीकार करता है।
उन्होंने भारत में जन्मी धार्मिक परंपराओं को एक व्यापक पहचान में रखा इस आधार पर उन्होंने वैदिक, बौद्ध, जैन और सिख परंपराओं को व्यापक हिंदू सांस्कृतिक पहचान के भीतर रखा ।
उनके अनुसार, भारत अनेक मुसलमानों और ईसाइयों की पितृभूमि हो सकता है, लेकिन उनकी धार्मिक उद्गमभूमियाँ बाहर होने के कारण वे उनकी इस हिंदू-परिभाषा में नहीं आते। इससे स्पष्ट है कि उनकी अवधारणा में केवल भारत में जन्म लेना या उससे प्रेम करना पर्याप्त कसौटी नहीं था। सावरकर के हिंदुत्व का केंद्र हिंदुओं को एक साझा ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय समुदाय के रूप में परिभाषित करना था।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय के हिंदुत्व संबंधी विचारों को उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और ‘एकात्म मानववाद’ के माध्यम से समझा जा सकता है। उन्होंने अप्रैल 1965 के चार व्याख्यानों में भारतीय संस्कृति के आधार पर व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और राज्य के संबंधों की व्याख्या की।
राष्ट्र का आधार सांस्कृतिक चेतना दीनदयाल उपाध्याय जी के अनुसार राष्ट्र केवल भूभाग या शासन-व्यवस्था से नहीं बनता। उसकी एक आंतरिक सांस्कृतिक प्रकृति होती है, जिसे उन्होंने ‘चिति’ कहा। यह राष्ट्र के जीवन और उसकी संस्थाओं को दिशा देने वाला तत्व है।
दीनदयाल जी ने मनुष्य को शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की एकात्म इकाई माना। इसलिए विकास में आर्थिक आवश्यकताओं के साथ मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं को भी स्थान मिलना चाहिए। व्यक्ति और समाज के हितों में समन्वय उनकी दृष्टि का महत्वपूर्ण आधार था।
उनके विचार में ‘धर्म’ केवल पूजा-पद्धति या संप्रदाय का नाम नहीं था। वह व्यक्ति और समाज को धारण करने वाले नैतिक सिद्धांतों तथा कर्तव्यों से जुड़ा था। इसी आधार पर उन्होंने ‘धर्मराज्य’ की अवधारणा रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्मराज्य का अर्थ धार्मिक पुरोहितों का शासन या किसी एक संप्रदाय का राज्य नहीं है। उनकी व्याख्या में उपासना की स्वतंत्रता रहती है और राज्य को किसी धर्म के अनुयायियों के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए।
वे भारत की समस्याओं के समाधान में भारतीय अनुभव और संस्कृति को आधार बनाना चाहते थे। साथ ही, उपयोगी ज्ञान ग्रहण करने और उसे अपनी परिस्थितियों के अनुकूल बनाने का समर्थन करते थे। इस प्रकार दीनदयाल उपाध्याय जी की दृष्टि में हिंदुत्व का संबंध सांस्कृतिक राष्ट्रीय पहचान, कर्तव्य और समग्र मानवकल्याण से समझा जा सकता है।
भारत के उच्चतम न्यायालय ने 1995 के एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि ‘हिंदुत्व’ को हर संदर्भ में संकीर्ण धार्मिक अर्थ में नहीं समझना चाहिए; यह भारतीय लोगों की जीवन-पद्धति और सांस्कृतिक परिवेश का संकेत है।
गायत्री परिवार के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के विचारों में हिंदुत्व का संबंध भारतीय संस्कृति, आत्मपरिष्कार और समाज-सुधार से था। गायत्री परिवार की पत्रिका ‘अखण्ड ज्योति’, अगस्त 1992 में प्रकाशित ‘हिन्दुत्व क्या है?’ प्रश्नोत्तर में उनके साथ हुई वार्ता के रूप में ये विचार स्मरणीय हैं उनका आग्रह था कि अतीत का गुणगान करने के साथ संस्कृति के जीवन-मूल्यों को अपने व्यवहार में अपनाया जाए। व्यक्तित्व का सुधार और सामाजिक जिम्मेदारी इसके आवश्यक अंग थे।
वे वर्ण का निर्धारण जन्म के बजाय गुण, कर्म और स्वभाव से करते थे। उनके अनुसार साधना, संस्कार और पुरुषार्थ से व्यक्ति अपना विकास कर सकता है। यह उनकी वर्ण-व्यवस्था की सुधारवादी व्याख्या थी। उन्होंने महिलाओं को दोयम दर्जा देने तथा जप और यज्ञ जैसे धार्मिक कार्यों से वंचित करने की आलोचना की। वे नारी-जागरण और सार्वजनिक नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी के पक्षधर थे। उन्होंने धर्म और संस्कृति के नाम पर पनपती प्रतिगामी प्रवृत्तियों को शिक्षा, जागरण और संस्कार से दूर करने पर बल दिया।
स्वामी अवधेशानंद गिरि जी ने हिंदू पहचान का संबंध सनातन संस्कृति, समस्त सृष्टि के कल्याण, सामाजिक एकता और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण से दिखाई देता है।
महाकुंभ 2025 से जुड़े एक साक्षात्कार में उन्होंने सनातन धर्म की व्यापकता समझाते हुए कहा कि उसका परिवार केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है; पृथ्वी और प्रकृति भी उसमें शामिल हैं। उन्होंने सबके सुख और सम्मान की भावना पर बल दिया।
उन्होंने संगम और कुंभ को ऐसा अवसर बताया जहाँ विभिन्न जातियों, वर्गों और संप्रदायों के लोग एक होते हैं। इससे उनके विचारों में धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों की सामाजिक एकता स्थापित करने वाली भूमिका सामने आती है।
भारत के मनीषियों भारत के विद्वानों और भारत माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय के आधार पर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि हिंदुत्व भारत की जीवन पद्धति है, जो सनातन काल से चली आ रही है सनातन इसकी आत्मा है और हिंदुत्व शरीर इन्हें एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।
समस्त चराचर के कल्याण की अगर किसी ने कामना की है तो वह हिंदुत्व है।
"सर्वे भवन्तु सुखिन:,सर्वे संतु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित दुखात भवेत्।"
यह भाव अगर कहीं है तो हिंदुत्व में है।
पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी जी ने अपनी कविता
हिंदू तनमन, हिंदू जीवन में लिखा है..
"होकर स्वतंत्र मैंने कब चाहा है ,कर लूं जग को गुलाम?
मैंने तो सदा सिखाया करना, अपने मन को गुलाम।
गोपाल-राम के नामों पर ,
कब मैंने अत्याचार किए?
कब दुनिया को हिन्दू करने घर-घर में नरसंहार किए?
कोई बतलाए काबुल में जा कर ,कितनी मस्जिद तोड़ीं?
भूभाग नहीं, शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!
कुछ लोग जो किसी राजनैतिक स्वार्थवश ,हिंदू होते हुये भी स्वयं को हिंदू कहने में संकोच करते हैं उनके लिये अटल जी ने लिखा है।
"हिंदू कहने में शर्माते, दूध लजाते, लाज न आती?
घोर पतन है, अपनी माँ को माँ कहने में फटती छाती।"
सबके कल्याण की भावना का भाव ही हिंदुत्व है,कंकर में शंकर देखने का भाव ही हिंदुत्व है,प्राणियों में सद्भावना का भाव ही हिंदुत्व है ।
धर्म की जय हो,अधर्म का नाश हो का भाव ही हिंदुत्व है।
विश्व का कल्याण हो का भाव ही हिंदुत्व है।
हिंदू होकर भी जो लोग यह कहते हैं कि में "हिंदुत्व" को नहीं मानता उनके बारे कहा जा सकता है कि वह "मनुष्य" तो हैं लेकिन उनके अंदर "मनुष्यत्व" नहीं है क्योंकि हिंदुत्व और मनुष्यत्व दोनों एक सिक्के के ही दो पहलू हैं ।
(लेखक भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता है और प्रदेश उपाध्यक्ष है।)