आज के दौर मे यह बहुत ही गहरी चिंता और मनन का विषय है कि जिस व्रत में त्याग, तपस्या, संयम और अखंड समर्पण, शक्ति की पराकाष्ठा होती है , उसे आज के युग में सरेआम डिजिटल मंचों पर उपहास उड़ाया जा रहा है।साथ ही फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप जैसे लोक-लुभावन मंचों पर पति-पत्नी के पावन रिश्ते को लेकर फूहड़ और गरिमाहीन चुटकुले शेयर किए जा रहे हैं। क्या हमारा आधुनिक समाज इतना असंवेदनशील हो चुका है? कि वह प्राचीन संस्कारों और धार्मिक आस्थाओं पवित्र बंधन की मर्यादा पूरी तरह भूल गया है?करवा चौथ केवल दिनभर भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह दांपत्य जीवन के अटूट प्रेम, आपसी विश्वास, समर्पण, त्याग और आत्मिक जुड़ाव का एक जीवंत उदाहरण वा प्रतीक है।
निश्चित ही कथित मजाकिया पोस्टर्स में अक्सर पतियों को लाचार, शोषित और पत्नियों को क्रूर या डरावने रूप में प्रस्तुत कर वैवाहिक मर्यादा को तार-तार किया जा रहा है। इस प्रकार से शालीनता की सभी सीमाएं लांघकर बनाए गए अश्लील मीम्स और भ्रामक टिप्पणियां हमारी आने वाली पीढ़ी के कोमल मन में गलत संस्कार, का बीज बो रही हैं। पर इसके लिए पुरुष और महिला दोनों ही जिम्मेदार है आधुनिकता की इस दौड़ में रिल्स पोस्ट, फोटो बनाने की होड में हम सभी जिम्मेदार है।
पुरुषों और महिलाओं की यह नैतिक दायित्व है कि वे पति,पत्नियों के इस पावन त्याग का एक दूसरे का सम्मान करें। महिलाओं को रील्स और सोशल मीडिया के दिखावे से ऊपर उठकर व्रत की मूल सात्विकता अपनाने और अभद्र पोस्ट्स का खुलकर विरोध करे ना का उसे आगे परोसे।
इस डिजिटल कुरीति को रोकने के लिए पुरुष और महिला दोनों को अपनी सोच में व्यापक बदलाव लाना होगा !पुरुषों को यह समझना होगा कि एक पत्नी का दिन भर निर्जला उपवास रखना कोई सामान्य व्रत नहीं है, अपितु उसके प्रति असीम प्रेम और दीर्घायु, त्याग,समर्पण , पराकाष्ठा की सच्ची कामना है। इस पावन त्याग का हृदय से सम्मान करने की वजह,ऐसे किसी भी मजाक या पोस्ट को आगे बढ़ाना पुरुषों और महिलाओं की संकीर्ण मानसिकता का उजागर करता है !पुरुष समाज का यह परम नैतिक दायित्व है कि ऐसे किसी भी डिजिटल ग्रुप या चैट का हिस्सा ना बने जिसमें नारी शक्ति और इस पावन व्रत, और त्योहारों का उपवास उड़ाया जाता हो । पतियों के प्रति सम्मान केवल घर की चार दिवारी तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि डिजिटल दुनिया में पत्नी का सम्मान रखना भी हर पुरुष का कर्तव्य है ,इसी प्रकार हमारी माता और बहनों और समस्त सुहागन महिलाओं को भी इस डिजिटल भटकाव के प्रति पूरी तरह से सतर्क सजक और रूडी मुक्त होना चाहिए। सोशल मीडिया पर रीलस बनाने, लाइक्स पाने और खुद को आर्थिक दिखावे के चक्कर में व्रत की आंतरिक शांति साहित्यिकता और एकाग्रता को नष्ट न होने दे। महंगे कपड़े भारी गहनों और आधुनिकता की इस दौड़ में भौतिक प्रदर्शन से ऊपर उठकर इस व्रत के वास्तविक आध्यात्मिक महत्व को अपने जीवन में आत्मसात करें ।यदि सोशल मीडिया पर कोई आपके सामने ऐसी अमर्यादित या अश्लील सामग्री पहुंचता है तो मुकविदुर बनने की बजाय हम उसका खुलकर विरोध करें ।अश्लीलता को नजर अंदाज करना भी मौन सहमति देने के समान है। इसलिए महिलाओं को अपने अपनी आवाज प्रखर करनी होगी!पवित्रता केवल बाहरीआचरण या वेस्टन से नहीं बल्कि हमारी सोच हमारे विचारों , हमारे संस्कार हमारे संपूर्ण डिजिटल व्यवहार में भी स्पष्ट रूप से झलकनी चाहिए ।माता-पिता का का भी परम कर्तव्य है कि वह अपने बच्चों को इन त्योहारों के पीछे छिपे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारणों से पूरी तरह से अवगत कराया जाए ।जब तक नई पीढ़ी को यह पता नहीं होगा कि यह हमारे त्यौहार,व्रत क्यों रखा जाते है तब तक वह इस वास्तविक सम्मान करना कभी नहीं सीख पाएंगे ! डिजिटल बाजार में नीलाम होती संस्कृति, हमारी सजगता और जिम्मेदारी हमारी। इसलिए आज हम सब मिलकर यह दृढ़ संकल्प लें कि हम अपने सभी पावन त्यौहारों की गरिमा को सोशल मीडिया के बाजार में कभी नीलम नहीं होने देंगे और एक सभ्य समाज सुसंस्कृति समाज का निर्माण करेंगे।