नवरात्रि: भक्ति, विज्ञान और आत्मजागरण का दिव्य पर्व : दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी
नवरात्रि: भक्ति, शक्ति और आत्मजागरण का दिव्य संगम
जानिए नवरात्रि पर्व का आध्यात्मिक रहस्य एवं वैज्ञानिक महत्त्व
दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी
(संस्थापक एवं संचालक, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान)
नवरात्रों में समूचा भारत “जय माता दी” के जयकारों से गूँज उठता है। मंदिरों में जुड़ते सांस्कृतिक मेले, भक्त श्रद्धालुओं की लम्बी कतारें, गली-गली से उठता कीर्तन संगीत, ऐसे लगता है मानों जनमानस की धमनियों में दौड़ती भक्ति-भावना में नई स्फूर्ति आ गयी हो। भारत भूमि पर मनाया जाने वाला हर पर्व अपने भीतर गूढ़ अध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक प्रयोजनों को संजोए हुए है। नवरात्रे भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी है। इसके एक-एक पक्ष में अभूतपूर्व वैज्ञानिकता और आध्यात्मिकता निहित है।
नवरात्रे वर्ष में दो बार आते हैं। दोनों बार ऋतु-परिवर्तन के समय! सर्दियाँ आरंभ होने से पहले के ये नवरात्रे शारदीय नवरात्रे कहलाते हैं। ऋतुऔं की इस संधिवेला में प्रकृति अनेकानेक परिवर्तनों के दौर से गुजरती है। आरोग्यशास्त्र के अनुसार इस समय महामारी, ज्वर, शीतल, कफ खाँसी आदि रोगों के होने की संभावनाएँ प्रबल हो जाती हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले हमारे ऋषिओं ने इन दिनों में फलाहार अथवा कम और सुपाच्य आहार लेने पर बल दिया। इसलिये ही नवरात्रों के दौरान व्रत-उपवास आदि करने का विधान है।
नवरात्रों के दिनों में देवी के तीन रूपों की उपासना करने की भी परम्परा है। ये तीन रूप हैं – माँ दुर्गा, माँ लक्ष्मी और माँ शारदा। देवी दुर्गा शक्ति का प्रतीक हैं। लक्ष्मी धन-ऐश्वर्य-वैभव की द्योतक हैं तो माँ शारदा सर्वोत्तम विद्या अर्थात ब्रह्मज्ञान का प्रतिनिधित्व करती हैं। अतः इन तीनों देवियों का पूजन-विद्यान शक्ति-वैभव-ज्ञान के समन्वय की महत्ता पर प्रकाश डालता है। यह संकेतक है कि जीवन को शांत एवं पूर्णतः सफल बनाने के लिये इन तीनों की समरसता जरूरी है।
नवरात्रों से जुड़ी महिषासुर की पौराणिक कथा भी संदेशात्मक है। कथा उस समय की है जब धरती महिष आदि असुरों के अत्याचारों से आक्रांत थी। ऐसे में, सभी देवगण एकत्र हुए और उस परम शक्ति महामायी दुर्गा का आह्वान किया। माँ दुर्गा विकराल रौद्र रूप धारण कर प्रकट हुई और इन दैत्यों से भीषण संग्राम किया। यह संग्राम नौ दिनों और नौ रातों तक लगातार चलता रहा। अंत में दशम दिवस के सूर्योदय के साथ माँ दुर्गा ने इन समस्त आसुरी शक्तियों को परास्त कर दिया। तभी से इस युद्ध काल के ये नौ दिन नवरात्रों के रूप में देवी माँ की पूजा वंदना में समर्पित किए जाते हैं। इस कथा का एक-एक पहलू प्रतीकात्मक है। महिषासुर हमारे मन में स्थित तामसी प्रवृत्तियों का प्रतीक है। आलस्य, जड़ता, अविवेक, कामुकता, नृशंसता, तमोगुण महिष के ही विभिन्न रूप हैं। पर यह भी एक शाश्वत सत्य है कि जहाँ हमारे भीतर इन आसुरी प्रवृत्तियों का बोल बाला है, वहीं इनका हनन कर सकने वाली परम शक्ति जगदम्बा भी अन्तस् में ही विद्यमान है। पर हमारी यह अन्तर्निहित चेतना (देवी) अभी सुषुप्तावस्था में है। जाग्रत नहीं है। इसलिए हमारे भीतर महिष का आधिपत्य है। नवरात्रों का यह पर्व हमें सन्देश देता है कि हम अपनी सभी सात्विक प्रवृत्तियों, शुभ संकल्पों (देवताओं के प्रतीक) को एकत्र करें, चाहे वह कितने ही कम व दुर्बल क्यों न हों और अपनी चेतना की जाग्रति के लिये कटिबद्ध हो जाएँ। एक तत्ववेता गुरु के सान्निध्य में पहुंचकर ‘ब्रह्मज्ञान’ प्राप्त कर अपनी सोई चेतना को जाग्रत करवाएँ। फिर यही जाग्रत चेतना भीतरी महिषासुर के विरोध में महायुद्ध का बिगुल बजती है। दरअसल, ये जितने भी विकार, वासनाएँ, दुष्प्रवृत्तियाँ हैं, हमारी देह में स्थित नौ द्वारों से ही हमारे भीतर प्रवेश पाते हैं। देवी-महिषासुर संग्राम के नौ दिनों का प्रत्येक दिन साधक की अपने एक ऐन्द्रिक द्वार पर विजय का प्रतीक है। अंततः जब साधक इन नौ द्वारों पर विजय प्राप्त कर लेता है, तब कहीं जाकर भीतरी महिष का मर्दन होता है और साधक की अंतर चेतना दशम द्वार में स्थित हो जाती है। यही अध्यात्मिक विजयादशमी है। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से सभी पाठकों को नवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।