जीवन में सबसे मुष्किल दौर स्कूल षिक्षा से काॅलेज षिक्षा में प्रवेष करना होता है जब यह तय किया जाता है कि अब हम आगे की परामर्ष व दोस्तों की सलाह के अनुसार अपने कोर्स का चयन करता है जिसमें वह यह नहीं सोचता कि उनकी रूचि के अनुसार कौन सा कोर्स सही रहेगा या किस कोर्स में उनका सही भविष्य तय हो सकेगा। यही बजह है कि बाद में वह अपने किसी भी सही नतीजे पर नहीं पहुॅच पाता है। आज हम देखते हैं कि बहुत से युवा आज छोटी नौकरी या छोटा व्यवसाय करने के लिये मजबूर हैं जो कही न कही अच्छी षिक्षा प्राप्त कर चुके हैं पर बेरोजगारी की बजह से उन्हें छोटी नौकरी से संतुष्ठ होना पड़ता है। हर माता-पिता अपने बच्चे को अच्छी षिक्षा देने के लिये सदैव प्रयासरत रहते हैं लेकिन क्या यह जरूरी नहीं है कि बच्चे की अच्छी षिक्षा के लिये उनकी रूचि भी जानना आवष्यक हो। कोई बच्चा अगर सही दिषा निर्देष से आगे बढ़ता है तो निष्चित ही वह सफल रहता है।
यह भी देखने में आता है कि माता-पिता जिस भी प्रोफेषन में कार्य कर रहे होते हैं तो उनकी कोषिष भी यही रहती है कि उनका बच्चा भी उसी प्रोफेषन में कार्य करे। जैसे- अगर माता-पिता व्यवसायी हो तो उनकी कोषिष रहती है कि उनका बच्चा व्यवसाय ही संभाले। कोई माता-पिता अगर षिक्षक हो तो उनकी कोषिष रहती है कि उनका बच्चा षिक्षक बनें। इस स्थिति में बच्चा अपनी रूचि से आगे नहीं बढ़ पाता है। अब नई जनरेषन के हिसाब से तो काफी बदलाव आ गया है अब माता-पिता बच्चे की रूचि पूछने लगे हैं। किसी भी विषय को चयन करने के लिये उस विषय के प्रति बच्चे की रूचि जरूरी होती है। यदि बिना रूचि के वह आगे बढ़ता है तो सिर्फ उस विषय का किताबी ज्ञान प्राप्त हो सकता है कैरियर नहीं बनाया जा सकता है।
हमें अगर बच्चे को अपनी रूचि के हिसाब से चलाना है तो एक तरीका है जिसको अपनाकर हम बच्चे की रूचि को आदत में बदल सकते हैं। इसके लिये हमें अपने बच्चे को शुरू से ही उस प्रोफोषन से जुडे़ लोगों से जोड़ देना चाहिए जिससे बच्चे को चार-पांच सालों में उस प्रोफेषन की आदत पड़ जाये। उदाहरण के तौर पर आप समझ सकते है कि माता-पिता बच्चे को वकालत लाइन में ले जाना चाहता है तो वह बच्चे को अपने पहचान के किसी वकील के पास पार्ट टाइम के लिये भेजना शुरू कर दे तो फिर आप देखेंगे कि वह बच्चा चार-पांच सालों में वकील के अनुभव को प्राप्त कर लेगा और उसे उस प्रोेफेषन की आदत हो जायेगी या फिर यह कहें कि उस प्रोफेषन में उसकी रूचि आ जायेगी। व्यापारी भी अपने बच्चे को बचपन से ही अपने व्यवसाय पर ले जाकर के व्यवसाय से संबंधित कार्य कराता है ताकि आगे चलकर वह बच्चा उस कारोबार को संभाल करें।
आइये इसे और गहराई से समझते हैं सबसे पहले माता-पिता को बच्चों की एक्टिविटी को समझना चाहिए, फिर बच्चे के स्कूल षिक्षक से बात करनी चाहिए, बच्चें के स्कूल के दोस्तों से बात करनी चाहिए और फिर विचार कर के एक निष्चित लक्ष्य पर पहुॅचना चाहिए कि बच्चें को आखिर क्या कराया जाये। अक्सर देखने में आता है कि माता-पिता बच्चे को नौकरी के लिये प्रेषर डालकर नौकरी की तैयारी के लिये कोचिंग लगा देते हैं और बच्चा दिमागी प्रेषर में लगातार नौकरी की तैयारी करता रहता है। आम तौर पर बच्चे अपनी स्किल को न समझकर लगातार बड़ी-बड़ी नौकरी अथवा बडे़ कोर्स की तैयारी जैसे-यूपीएससी, नीट, जेइई आदि उच्च स्तरीय कोर्स की तैयारी करने बड़े-बड़े शहरों में बड़ी-बड़ी कोचिंग सेन्टरों को ज्वाइन कर तैयारी करते हैं। सिलेक्सन न होने से आर्थिक बोझ को दूर करने के लिये उन्हें मजबूरी में छोटी नौकरी अथवा छोटा व्यवसाय चलाना पड़ता है।
भारत में षिक्षा केवल किताबी ही रह गयी है स्कूलों में षिक्षा कही भी प्रेक्टिकल तरीके से नहीं सिखाई जाती है। अगर षिक्षा प्रेक्टिकल रूप में स्कूल, काॅलेजों में शुरू हो जाये तो आप देखेंगे कि प्रत्येक बच्चे का दिमागी स्तर तेजी से प्रगति करेगा तथा बच्चा स्किल के साथ तैयार हो सकेगा। इससे आने वाले समय में वह अपना स्वयं का व्यापार या नौकरी का चयन कर सके। अक्सर हम यह तय नहीं कर पाते हैं कि हमारा बच्चा किस लाइन में जाये और अपने बच्चे को किताबी षिक्षा की ओर ढकेलते रहते हैं। उन्हें बचपन से तैयार ही नहीं किया जाता है बाद में नौकरी तथा उच्च षिक्षा के लिये बिना स्वेच्छा के प्रेषर डाला जाता है इससे बच्चा मानसिक तौर पर परेषान होता रहता है। हमें बचपन से ही अपने बच्चे को किसी एक स्किल से जोड़ने के लिये स्किल से संबंधित अच्छे राइटर व ज्ञान बढ़ाने वाली किताबों को पढ़ने की आदत अवष्य डालनी चाहिए। एक ताजा सर्वे के अनुसार भारत के 70 प्रतिषत से ज्यादा स्कूलों में आज भी स्किल षिक्षा पर जोर नहीं दिया जा रहा है। हां यह जरूर हुआ है कि पहले की अपेक्षा कुछ सुधार हुआ है पर हम आज भी कही न कही स्किल की षिक्षा को न अपनाकर बेरोजगारी की गहरी खाई में जा रहे हैं। शहरों के स्कूलों में फिर भी स्किल षिक्षा को काफी हद तक लागू किया जा रहा है।
शासकीय स्कूलों में पढ़ाई खराब होने के पीछे एक कारण प्रषासन की कमी भी है आज हम देखते हैं कि षिक्षकों से पढ़ाई को छोड़कर सारे कार्य कराये जाते हैं जिसमें सभी प्रकार के सर्वे, जनगणना, चुनाव कार्य आदि शामिल हैं इससे कूल की षिक्षा बिल्कुल खराब हो गयी है। प्रषासन को चाहिए कि षिक्षकों से षिक्षा का कार्य लिया जाये और आपातकालीन कार्य के लिये ऐसे कर्मचारियों की जिला स्तर पर अलग से भर्ती करें जिनसे केवल आपातकालीन कार्य जैसे सर्वे, चुनाव, जनगणना आदि का कार्य कराया जा सके तभी जाकर के स्कूल स्तर की पढ़ाई में सुधार किया जा सकेगा। इसके साथ ही उच्च अधिकारियों के बच्चों तथा समस्त नेताओं के बच्चों को स्कूल षिक्षा शासकीय स्कूल के माध्यम से दिया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए। मेरा ऐसा व्यक्तिगत मानना है कि आने वाले भविष्य को ध्यान में रखते हुये प्रत्येक माता-पिता को अपने बच्चे को स्किल तथा किताबी दोनो तरह की षिक्षा से जरूर जोड़ना चाहिए और जहाॅ तक हो सके बच्चे को उससे जुड़ी लाइन का अनुभव जरूर दिलाना चाहिए ताकि वह स्वयं को आने वाले समय के लिये तैयार कर सके।