धरोहर में सजीव हो उठी रस्में व रीति रिवाज

- वर्षों बाद अग्रवाल समाज के इस पारिवारिक आयोजन ने मनमोहा
(विनय अग्रवाल)
ग्वालियर। ग्वालियर में धरोहर के आयोजन से पुरानी रस्में, परंपरायें जीवित हो उठी। संस्कृति वेंकट हाल में रविवार को अ.भा. अग्रवाल संगठन द्वारा आयोजित धरोहर कार्यक्रम की सबने सराहना की और कहा कि ऐसे आयोजनों की श्रृंखला चलनी चाहिये, ताकि अग्रवाल समाज की नई पीढ़ी सांस्कृतिक विरासत एवं पारंपरिक वैवाहिक संस्कारों से अवगत हो सकें और उन्हें सहेज कर रख सकें। इस आयोजन में अग्रवाल समाज की वैवाहिक रीति रिवाजों, रस्मों, नेग चलन एवं मांगलिक गीतों को भी बताया गया।
कुल मिलाकर ग्वालियर में अ.भा. अग्रवाल संगठन के प्रदेशाध्यक्ष डा. राकेश अग्रवाल व उनकी टीम ने जिस तरह से धरोहर का आयोजन गरिमामयी तरीके से किया, उससे समाज के 1200 से भी अधिक लोग बेहद प्रभावित हुये। कार्यक्रम इतने भव्य तरीके से दृश्य, श्रवण और मंचन से आयोजित हुआ कि सैंकड़ों लोग, महिलायें, पुरूष और उनके परिवार के सदस्य उसमे सम्मोहित होकर पूरे समय बैठे रहे। अ.भा. अग्रवाल संगठन की ओर से इस मौके पर एक अग्रवंश परिणय संस्कार पुस्तिका भी विमोचित कराई गई। जिसमे महाराजा अग्रसेन जी, माता लक्ष्मी जी की आरती के अलावा अग्रवाल समाज की विवाह रस्में जैसे रोका, सगाई, गोदभराई, गणेश पूजन, देवता लाना, देहरी आरवत, लगुन, मसीना, हलदान, बंधी का मांगर, बरबाई, रतजगा, मेंहदी, देवताओं का थापा, माड़ा (मंडप), तेल, मरियाना, घूरा पूजन, भात, निकासी (घुड़चढ़ी), खोइया, खेत मिलनी रस्म, तोरण रस्म द्वाराचार, टीका, वरमाला, कन्यादान, हाथ पीले करना, पैर पुजाई रस्म, धान बुवाई रस्म, फेरे की रस्म, ढरकावनी की रस्म, सिंदूर दान, गोद भराई रस्म, जूता चुराई, कंगल उठालने वाला खेल, श्लोक छंद पढ़ना, कुंवर कलेवा, विदाई, वधू आगमन, द्वार रोकना, सिर गूंधी, मुंह दिखाई, माता पूजन छड़ी, बीजासेन माता का पाठ एवं सत्यनारायण भगवान की कथा का जिक्र किया गया है।
इस संदर्भ में अ.भा. अग्रवाल संगठन के प्रदेश प्रमुख डा. राकेश अग्रवाल का कहना है कि मानव जीवन में संस्कार केवल औपचारिक रस्में नहीं है, बल्कि वे हमारे जीवन मूल्यों, दर्शन और गौरवशाली इतिहास के संवाहक है। सनातन संस्कृति में वर्णित सोलह संस्कारों में पाणिग्रहण यानी विवाह संस्कार को सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। जब हम बात अग्रवंश यानी अग्रवाल समाज की करते है तो हमारा वैवाहिक स्वरूप सिर्फ दो परिवारों का मिलन नहीं, बल्कि महाराजा अग्रसेन जी के समाजवाद, समरसता और सांस्कृतिक वैभव की जीवंत अभिव्यक्ति बन जाता है। समय के तीव्र प्रवाह और आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अक्सर अपनी मूल जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी विवाह के उत्सव और चकाचैंध से तो भली भांति परिचित है, लेकिन उसके पीछे छिपे गहरे अर्थ, लोक परंपराओं और नेगचार की महत्ता से अनभिज्ञ होती जा रही है। इसीलिये हमारा प्रयास धरोहर सबने मिलकर किया है, जो आगे अग्रवाल समाज का मार्गदर्शन भी करता रहेगा।
इस धरोहर में पवन कुमार अगव्राल, संदीप नारायण अग्रवाल, रामकुमार गोयल, राजेश अग्रवाल, अनुज अग्रवाल, अजय गोयल, मनोज अग्रवाल बाबा, राकेश अग्रवाल, विवेक बंसल, दिलीप अग्रवाल, सीए अजय सिंघल, श्याम बंसल, राजीव अग्रवाल, विनय अग्रवाल, आशीष जैन, मुकेश सांघी, प्रतीक अग्रवाल, सुनील गोयल, योगेश अग्रवाल, रविकुमार गर्ग, शिवमोहन अग्रवाल, राजकुमार गर्ग फतेह बाबा, सुरेन्द्र अग्रवाल, विवेक अग्रवाल सहित महिला विंग श्रीमती ज्योति अग्रवाल, मीरा अग्रवाल, सीमा अग्रवाल आदि का विशेष सहयोग रहा। 

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