रजोनिवृत्ति से घबरायें नहीं, योग शैली से आसान बनाये जीवन

महिलाओं के स्वास्थ्य और रजोनिवृत्ति पर इन दिनों देशभर में डा. अनुमिता पाठक की लिखी एक पुस्तक बेहद चर्चित है। इस पुस्तक में डा. अनुमिता पाठक ने महिलाओं की जिंदगी से उनके शरीर संरचना व मेनोपाज पर ऐसी जानकारी आम महिलाओं के सामने रखी हैं जिससे रजोनिवृत्ति के दौरान महिलायें अपनी जीवनशैली को मामूली फेरबदल करके आसान बना सकती हैं। डा. पाठक का मानना है कि महिलाओं के शरीर में होने वाले बदलाव और मासिक धर्म से उनके जीवन को महिलाएं कठिन दौर मानती हैं, जबकि यह एक बदलती उम्र के साथ एक सामान्य प्रक्रिया है। इसे योग, जीवनशैली व सप्लीमेंट फूड से हम बेहतर कर सकते हैं।
पीरियडस के दिनों में खासकर ग्रामीण अंचल में महिलाओं के साथ अछूत जैसा व्यवहार किया जाता है। यह दर्द पीरियडस के दर्द से भी कई गुना ज्यादा होता है। हमारे देश में सालों तक पीरियडस आते ही महिलाओं को कहा जाता था रसोई मत छूना मंदिर मत जाना, चारपाई अलग, बर्तन अलग, बाहर किसी को मत बताना, कपडे का फटा टुकडा इस्तेमाल करो, पैड तक नसीब नहीं। बरसों तक महिलायें न तो कपड़ा ठीक से सुखा पाती थी, किसी से दर्द कह पाती थी। उनकी दिनचर्या तक बदल दी जाती थी। वो रसोई में नहीं जा सकती, सो नहीं सकती, पानी तक भरने पर ताने सुनने पड़ते थे। पीरियडस का असली दर्द पेट में कम, मन में और समाज में ज्यादा था और फिर महिला जब 40 प्लस उम्र में मेनोपोज की तरफ बढती बढती है, तो शरीर कहता है। अब मेरे अंदर एक बडा बदलाव आ रहा है। ध्यान दो लेकिन समाज को अब भी चुप्पी ओढे रहता है तब इस एक विषय को लेकर लेखिका डाॅ अनुमिता पाठक की किताब महिलाओं के लिये स्वास्थ्य गाइडरू रजोनिवृति और उससे संबंधित सभी जानकारी एक सहेली बनकर आई हैक्योंकि भारत की 40 प्लस महिलिा सिर्फ मेनोपोज नहीं झेल रही होती। वह अपनी पूरी जिंदगीकी थकान, पीरियडस से जुडे शर्म ताने चुप्पी और वे नार्मल है। वाली सोच का बोझ लेकर चल रही होती है। इसलिये जब शरीर में बदलाव आते है। थकान, चक्कर,, गर्मी के दौरे, मूड स्विंग तो उसे लगता है कि शायद वह कमजोर हो रही है। लेकिन कमजोर वह नहीं कमजोर तो वो सोच थी जिसमें पीरियडस से मेनोपोज तक उसे खुलकर जीने ही नहीं दिया।
किताब में क्या है खास  -
1. हार्मोन्स कैसे बदलते हैंः बदलाव क्यों रोने पर मजबूर करते हैं। किताब में बताया गया है कि महिलाओं के शरीर में बदलाव अचानक नहीं आते यह एक महिला की पूरी जीवन यात्रा का हिस्सा होते हैं। वो यात्रा जो कपड़े के पीरियड्स से पैड तक और अब मेनोपॉज तक की तकलीफें झेलती है।
2. खाने-पीने के नियमः क्योंकि कई बार पीरियड्स में जिन चीजों के खाने की मनाही होती है वही मेनोपॉज में खाने को कहा गया होता है, ये किताब ऐसे दिनों ने खान पान को लेकर हर कन्फ्यूजन को पूरी तरह दूर करती है।
3. योग और जीवनशैलीः किताब आसन ऐसे समझाती है कि पढ़ते ही मन में लगेगा, काश ये ज्ञान मुझे 20 साल पहले किसी ने दिया होता। सारे आसन को करने का तरीका इतनी सरलता से किताब में बताया गया है कि 50 प्लस महिला भी आराम से कर ले।
4. सप्लीमेंट्स और फंक्शनल फूडः उन महिलाओं के लिए जो पीरियड्स के दर्द में गुड़ और गर्म पानी ही इलाज मानती आईं। अब वही महिलाएं इस किताब से ये जान पाएंगी कि कब कैल्शियम जरूरी है, कब आयरन और कौन से फूड हार्मोन्स को बैलेंस रखते हैं।
किताब इसी दर्द पर गजब की मरहम लगाने का काम करती दिखती है। यह कहती है-
पीरियड्स के दौरान तुमने जो अकेलापन झेला, मेनोपॉज में तुम अकेली नहीं हो । यह किताब 40 प्लस महिला को ये बताती है कि रात में पसीना आना, हॉट फ्लैश, बेचैनी, नींद उड़ जाना, गुस्सा, वजन बढ़ना ये कोई बीमारी नहीं, बल्कि शरीर का नया अध्याय है।
किताब की रीढ़ डॉ. अनुमिता पाठक
20 प्लस साल का अनुभव, बड़े हॉस्पिटल्स और कॉरपोरेट कंपनियों के साथ काम, इंटरनेशनल एनजीओ से जुड़ाव, महिलाओं की हेल्थ पर गहरी रिसर्च, एम. फील और पीएचडी में टॉप रैंक, और तेलंगाना सरकार का बेस्ट न्यूट्रीशियन एंड लाइफस्टाइल एक्सपर्ट अवॉर्ड - ये सब मिलकर डॉ. अनुमिता को एक ऐसी एक्सपर्ट बनाते हैं जिनकी बात पर पूरा भरोसा किया जा सकता है । लेखिका ने जिसे सोच के साथ इस किताब को लिखा है वो तो कुछ इस ओर इशारा करती है मानो इन्होंने किताब के सहारे सिर्फ सलाह ही नहीं दी, बल्कि एक मिशन चलाने में जुट गई है - हैल्दी वुमन = हैल्दी फेमिली = हैल्दी इंडिया किताब सिर्फ एक गाइड नहीं पीरियड्स से मेनोपॉज तक की एक गजब की जर्नी है यह किताब ये बताती है कि जिस महिला ने कपड़े बदलते-बदलते जवानी निकाली, जिस महिला ने हर महीने दर्द छुपाकर काम किया, जिसे रसोई तक जाने से रोक दिया गया, जिसे घिसकर भी सब ठीक है कहना पड़ा मेनोपॉज उस महिला का अंत नहीं, उसका अधिकार है कि अब वह खुद को पहली बार समझे।
यह किताब उसी समझ का नाम है। इसलिए कहा जा सकता है कि ये किताब हर महिला खरीदेगी नहीं बल्कि अपनाएगी। क्योंकि किताब के हर पन्ने की 1-1 लाइन में उसका जीवन, उसका संघर्ष, उसकी चुप्पी, उसकी जीत और उसकी अपूर्ण रह गई इच्छाएँ बोलती हैं। यह किताब हर 40 प्लस महिला के लिए नही बल्कि उसकी नई, समझदार, मजबूत, खुद को प्राथमिकता देने वाली जिंदगी के लिए लिखी गई है।
डा अनुमिता पाठक 
( लेखिका देशभर में महिलाओं से संबंधित समस्याओं पर लेखन व विचार के लिये प्रसिद्ध हैं )

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