सद्गुरु अज्ञान का आवरण हटाकर ज्ञान का दीपक जलाते हैं : संत रमेश भाई
दंदरौआ धाम में श्रीमद् भागवत कथा का चौथा दिन, जल संरक्षण से लेकर धर्म, अर्थ और मोक्ष तक के बताए जीवन सूत्र
ग्वालियर। ज्ञान का कभी अभाव नहीं होता, सद्गुरु केवल अज्ञान का आवरण दूर कर देते हैं। जिस प्रकार दीपक अंधकार को मिटा देता है, उसी प्रकार सद्गुरु मनुष्य के जीवन से अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर देते हैं। यह विचार संत रमेश भाई ओझा ने शनिवार को दंदरौआ धाम में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन व्यक्त किए।
कथा के शुभारंभ पर यजमान अनूप मिश्रा ने धाम के महामंडलेश्वर रामदास महाराज के सानिध्य में अपनी पत्नी रामशंकर शर्मा के साथ पोथी पूजन किया।
गुरु के मार्गदर्शन से जलाएं ज्ञान का दीपक
संत रमेश भाई ने कहा कि देव मंदिर और गुरुदेव के पास कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। अज्ञान और विकारों से लड़ने के बजाय मन के मंदिर में गुरु के मार्गदर्शन से ज्ञान का दीपक जला लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसार के विकारों से लड़ने में उलझने के बजाय ज्ञान का मार्ग अपनाना चाहिए। ब्रह्मचर्य का आशय वासना और विकारों से लड़ना नहीं, बल्कि ब्रह्म में विचरण करना है।
उन्होंने नदियों और समुद्र के स्नान का महत्व बताते हुए कहा कि नदियों में स्नान करने से पुण्य मिलता है, लेकिन समुद्र का भी विशेष महत्व है, क्योंकि सभी नदियां अंततः समुद्र में ही मिलती हैं। इसी तरह जब मनुष्य कथा रूपी समुद्र में गोते लगाता है तो उसका जीवन धन्य होने लगता है।
जल है तो कल है, संरक्षण जरूरी
जल का महत्व बताते हुए संत रमेश भाई ने कहा कि समुद्र समस्त जल का प्रमुख स्रोत है। समुद्र का पानी खारा जरूर है, लेकिन प्रकृति की प्रक्रिया से यही पानी बादलों के रूप में बरसकर मीठा बनता है और नदियों में प्रवाहित होता है। नदियों का जल अमृत के समान है। कुआं खोदकर धरती से भी मीठा पानी प्राप्त किया जाता है। यदि पानी नहीं होता तो पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं था। इसलिए जल का संरक्षण करना जरूरी है।
उन्होंने पर्वत, नदी और समुद्र के संबंध को समझाते हुए कहा कि पर्वत पिता, नदियां बेटी और सागर पति के समान है। सागर में मिलकर ही सरिता की यात्रा पूर्ण होती है। कथा रूपी सरिता आनंद प्रदान करती है और मनुष्य के जीवन को आध्यात्मिक दिशा देती है।
अनीति से बनाई सोने की लंका भी टिकती नहीं
रावण के चरित्र का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि रावण ने सोने की लंका बनाई नहीं थी, बल्कि उस पर कब्जा किया था। आज भी दुनिया के कुछ देश दूसरे देशों पर कब्जा करना चाहते हैं, जिसके कारण अशांति उत्पन्न हो रही है। रावण ने वासना के वशीभूत होकर न केवल सीता माता, बल्कि अनेक सुंदर कन्याओं का हरण किया। अंततः यही उसके विनाश का कारण बना।
उन्होंने कहा कि धर्म से रहित अर्थ और काम जीवन में अनर्थ पैदा करते हैं। धर्म के मार्ग से अर्जित धन सुख देता है, जबकि अधर्म से कमाया धन अशांति का कारण बनता है। इसी प्रकार धर्म के अनुरूप काम और इच्छाएं मोक्ष की प्राप्ति में बाधा नहीं बनते, बल्कि उसमें सहयोग करते हैं।
राम के प्रति हो ऐसी आसक्ति
गोस्वामी तुलसीदास के भावों का उल्लेख करते हुए संत रमेश भाई ने कहा कि जिस प्रकार कामी व्यक्ति की आसक्ति स्त्री में और लोभी की आसक्ति धन में होती है, उसी प्रकार मनुष्य की आसक्ति भगवान श्रीराम में होनी चाहिए। यदि यह भाव मन में पैदा हो जाए तो व्यक्ति एक न एक दिन भगवान की ओर अवश्य मुड़ जाएगा।
उन्होंने कहा कि नास्तिक व्यक्ति को भी ईश्वर की जरूरत पड़ती है, क्योंकि ईश्वर को नकारने के लिए भी उसका अस्तित्व स्वीकार करना पड़ता है। धर्म का उद्देश्य केवल अर्थ प्राप्त करना नहीं, बल्कि मोक्ष की ओर ले जाना है। धर्म से धन मिले या न मिले, लेकिन धर्म के प्रति आसक्ति जरूर बढ़नी चाहिए। अनीति से सोने की लंका खड़ी करने वालों का अंत भी निश्चित है। हनुमान जी के हाथों रावण की लंका का उजड़ना इसी बात का उदाहरण है।
राजमाता के समय ग्वालियर में हुई थी पहली कथा
संत रमेश भाई ने ग्वालियर में आयोजित अपनी पहली कथा का स्मरण करते हुए बताया कि उस कथा की यजमान राजमाता विजयाराजे सिंधिया थीं। उस दौरान कृष्ण चरित्र का अद्भुत वर्णन हुआ था। ग्वालियर के लोगों की स्मृति में आज भी वह कथा बसी हुई है।
इस अवसर पर श्रीश्री 1008 महामंडलेश्वर महंत रामदास महाराज, महंत कालिदास महाराज तेजपुरा, संत अनिरुद्धवन महाराज धूमेश्वर धाम, संत अवध बिहारी दास, पूर्व कैबिनेट मंत्री अनूप मिश्रा, समाजसेवी रामशंकर शर्मा, महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान भोपाल के अध्यक्ष कौशल शर्मा, रामबरन पुजारी, जलज त्रिपाठी, प्रदीप त्रिवेदी, अमन दैपुरिया, शिवशंकर कटारे, अम्बरीष आचार्य सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।