कैप्टन स्मित मछार से लेकर भारत की हजारों वर्षों की साहस, सेवा और करुणा की परंपरा तक : डॉ. सोनल मेहता
जब नेतृत्व साहस को संस्कार बना देता है
कभी कभी कोई एक घटना हमें अपने पूरे इतिहास को एक नई दृष्टि से देखने के लिए प्रेरित करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कैप्टन स्मित मछार के बीच हाल की बातचीत ऐसी ही एक घटना है। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद कैप्टन मच्छर ने यात्रियों की जान बचाने का प्रयास किया, संकट की घड़ी में महत्वपूर्ण निर्णय लिए और उन कठिन क्षणों में हनुमान चालीसा का स्मरण किया। यह केवल उनके कर्तव्य और पेशे का साहस नहीं था, बल्कि उस गहरे संस्कार का परिचायक था, जिसमें अपनी सुरक्षा से पहले दूसरों की सुरक्षा को महत्व दिया जाता है। प्रधानमंत्री ने उनके साहस और सूझबूझ की सराहना की तथा उनकी माता से मिले संस्कारों का भी उल्लेख किया।
यह घटना एक बड़ा सवाल हमारे सामने रखती है, क्या नेतृत्व केवल नीतियां बनाने का नाम है, या समाज में मौजूद अच्छे गुणों को पहचानकर उन्हें सामूहिक प्रेरणा में बदलना भी नेतृत्व का हिस्सा है? शायद यहीं से ‘लीडर का माइंडसेट’ आकार लेता है।
वर्ष 2014 से 2026 के बीच हमने साहस और करुणा के अनेक उदाहरण देखे हैं। नेपाल में भूकंप के बाद ऑपरेशन मैत्री, यमन में ऑपरेशन राहत, डोकलाम का गतिरोध, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट और विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान का साहस और गरिमा ये सभी अलग-अलग परिस्थितियों के उदाहरण हैं। कोरोना महामारी के दौरान वैक्सीन मैत्री और विदेशों से भारतीयों को सुरक्षित लाने के लिए ऑपरेशन देवी शक्ति, ऑपरेशन गंगा, ऑपरेशन कावेरी और ऑपरेशन अजय जैसे अभियान भी हुए। तुर्की-सीरिया भूकंप के बाद ऑपरेशन दोस्त, म्यांमार में ऑपरेशन करुणा, म्यांमार में भूकंप के बाद ऑपरेशन ब्रह्मा और आतंकवाद के जवाब में ऑपरेशन सिंदूर जैसे उदाहरण भी सामने आए।
इन सभी घटनाओं का स्वरूप अलग था। कहीं सैन्य कार्रवाई थी, कहीं कूटनीति, कहीं लोगों को सुरक्षित निकालना, कहीं स्वास्थ्य सहायता और कहीं आपदा राहत। लेकिन इन सबके पीछे एक भावना दिखाई देती है, संकट से मुंह नहीं मोड़ना, आगे बढ़कर खड़ा होना और अपनी क्षमता के अनुसार मदद करना।
जब ऐसी भावना नेतृत्व से संस्थाओं और फिर नागरिकों तक पहुंचती है, तो वह केवल नीति नहीं रहती। धीरे धीरे वह समाज की सोच और राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बन जाती है।
यह बात भी महत्वपूर्ण है कि यह किसी एक सरकार या किसी एक पीढ़ी की उपलब्धि नहीं है। यह भारत की लंबे समय से चली आ रही साहस और सेवा की परंपरा की निरंतरता है।
यह कहानी निश्चित रूप से वर्ष 2014 से शुरू नहीं हुई।
स्वतंत्र भारत ने हमेशा ऐसे लोगों को जन्म दिया है जिन्होंने अपने स्वार्थ से ऊपर कर्तव्य को रखा। मेजर सोमनाथ शर्मा, मेजर शैतान सिंह, कैप्टन विक्रम बत्रा, कैप्टन मनोज पांडे, नीरजा भनोट और मेजर संदीप उन्नीकृष्णन इस भावना के अलग-अलग अध्याय हैं। कुछ ने युद्धभूमि में साहस दिखाया, तो कुछ ने आम नागरिकों की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया।
इनकी कहानियां हमें बताती हैं कि साहस किसी एक दशक, सरकार या संस्था की संपत्ति नहीं है। साहस उन लोगों का गुण है, जो असाधारण परिस्थिति आने पर भी खड़े होने का निर्णय लेते हैं।
यही भावना हमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी दिखाई देती है। महात्मा गांधी का सत्याग्रह, सुभाष चंद्र बोस का संघर्ष, भगत सिंह की क्रांतिकारी सोच, चंद्रशेखर आजाद का संकल्प तथा राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला खान की मित्रता और बलिदान ये साहस के अलग अलग रूप हैं।
भगत सिंह का साहस केवल मृत्यु का सामना करने का साहस नहीं था। वह पढ़ने, प्रश्न करने, सोचने और एक बेहतर समाज की कल्पना करने का साहस भी था।
लेकिन भारत की सभ्यतागत कहानी इससे भी बहुत पुरानी है।
वसुधैव कुटुम्बकम्।
सर्वे भवन्तु सुखिनः।
बुद्ध ने जीवन के केंद्र में करुणा को रखा। जैन दर्शन ने अहिंसा और प्रत्येक जीव के प्रति संवेदना को विशेष स्थान दिया। सिख परंपरा ने सेवा और लंगर को सामुदायिक जीवन का हिस्सा बनाया। सम्राट अशोक के शासन में जनकल्याण और धम्म के प्रति चिंता दिखाई देती है।
राजा दाहिर, सिंध से जुड़ी एक लोकप्रिय कथा भी शरण मांगने वालों की रक्षा और उन्हें संरक्षण देने की भावना से जुड़ी हुई है। इस विशेष कथा के ऐतिहासिक प्रमाण निर्णायक नहीं हैं, लेकिन लोकस्मृति में इसका बने रहना यह दर्शाता है कि शरणागत की रक्षा का आदर्श भारतीय चिंतन में लंबे समय से स्थान रखता आया है।
इसलिए भारत को केवल उसके युद्धों से नहीं समझा जा सकता।
भारत को उसकी करुणा से भी समझना होगा।
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है समाज का चरित्र बनता कैसे है?
एक नेता सीधे हर नागरिक का चरित्र नहीं बदल सकता। लेकिन नेतृत्व यह अवश्य प्रभावित कर सकता है कि समाज किन मूल्यों को सम्मान देता है और किन आदर्शों को आगे बढ़ाता है।
जब किसी सैनिक के बलिदान को याद किया जाता है, तो बच्चों को कर्तव्य का अर्थ समझ में आता है। जब वैज्ञानिक उपलब्धियों का सम्मान होता है, तो युवा विज्ञान की ओर प्रेरित होते हैं। जब कोई सामान्य नागरिक किसी दूसरे व्यक्ति की जान बचाता है, तो समाज सीखता है कि नायक बनने के लिए प्रसिद्ध होना जरूरी नहीं है।
और जब कैप्टन स्मित मच्छर या विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान जैसे लोगों के साहस को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलता है, तो एक व्यक्ति की कहानी सामूहिक प्रेरणा बन सकती है।
Leader’s Mindset-> Citizen’s Mindset -> National Character
नेतृत्व की सोच-> नागरिक की सोच -> राष्ट्रीय चरित्र
भारत की खूबसूरत विशेषताओं में से एक यह भी है कि यहां शक्ति और करुणा साथ साथ चलती रही हैं।
हमारी सेनाएं सीमाओं की रक्षा करती हैं और वही सेनाएं बाढ़, भूकंप तथा अन्य आपदाओं में लोगों की मदद के लिए भी आगे आती हैं। एक देश आतंकवाद के खिलाफ कठोर कदम उठा सकता है और उसी समय किसी दूसरे देश में भूकंप आने पर राहत दल भी भेज सकता है। हम अपनी सुरक्षा को मजबूत करते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर दुनिया के साथ वैक्सीन और मानवीय सहायता भी साझा करते हैं।
यह विरोधाभास नहीं है।
यही वह संतुलन है जो भारत के चरित्र को विशेष बनाता है, शक्ति के साथ करुणा और करुणा के साथ शक्ति।
एक शिक्षा-विद, सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्ति के रूप में मेरा मानना है कि इस पूरी यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी शिक्षा और संस्कार हैं।
हम अपने बच्चों को केवल यह न सिखाएं कि सफल कैसे होना है। उन्हें यह भी सिखाएं कि सफल होने के बाद वे किसके काम आ सकते हैं।
उन्हें प्रतिस्पर्धा सिखाएं, लेकिन करुणा भी।
उन्हें अधिकार सिखाएं, लेकिन जिम्मेदारी भी।
उन्हें आगे बढ़ना सिखाएं, लेकिन यह भी सिखाएं कि जब किसी को उनकी जरूरत हो, तो रुककर उसका हाथ थामना भी जरूरी है।
क्योंकि राष्ट्र केवल संसद, सीमाओं या संस्थाओं से नहीं बनता।
राष्ट्र अपने नागरिकों के चरित्र से बनता है।
कैप्टन स्मित मच्छर ने संकट की घड़ी में अपना कर्तव्य निभाया। सैनिक सीमा पर अपना कर्तव्य निभाते हैं। डॉक्टर अस्पताल में, शिक्षक कक्षा में और किसान खेत में अपना योगदान देते हैं। हर नागरिक किसी न किसी रूप में भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निभा रहा है।
एक व्यक्ति का साहस किसी की जान बचा सकता है।
एक परिवार के संस्कार एक चरित्र का निर्माण कर सकते हैं।
एक नेता की सोच एक वातावरण बना सकती है।
और करोड़ों अच्छे चरित्र मिलकर एक राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।
इसलिए कैप्टन स्मित मछार का साहस केवल सम्मान का विषय नहीं, बल्कि उससे सीख लेने का अवसर भी है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति केवल यह नहीं है कि हम संकट का सामना कर सकते हैं। हमारी असली शक्ति यह है कि संकट की घड़ी में भी हम इंसान बने रह सकते हैं।
यही भारत है।
यही भारतीयता है।
और शायद यही सच्चे नेतृत्व की सबसे बड़ी कसौटी भी है।
लेखक : डॉ. सोनल मेहता