विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की नींव शिक्षा प्रणाली में निहित : डॉ. अतुल भाई कोठारी

ग्वालियर। भारत को विकसित देश के रूप में स्थापित करने के लक्ष्य की नींव वास्तव में शिक्षा प्रणाली में निहित है। विकास की ऐसी अवधारणा आवश्यक है, जिसमें भौतिक और आर्थिक विकास के साथ व्यक्ति का चारित्रिक, नैतिक और भावात्मक विकास तथा पर्यावरण, समाज और मानवता के प्रति दायित्व-बोध भी सम्मिलित हो। यह बात शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल भाई कोठारी ने जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली, मध्यभारत प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “विकसित भारत 2047 हेतु शिक्षा” विषय पर राष्ट्रीय शैक्षिक परिसंवाद में कही।
डॉ. कोठारी ने कहा कि सामान्यतः पश्चिमी जगत के प्रभाव में विकास को भौतिक, आर्थिक और अधोसंरचनात्मक विकास के रूप में देखा जाता है, जो एकांगी दृष्टिकोण है। विकास तभी पूर्ण होता है, जब लोगों का चारित्रिक, नैतिक और भावात्मक विकास हो तथा उनमें पर्यावरण, समाज और मानवता के प्रति दायित्व-बोध हो। अन्यथा भौतिक विकास के साथ पर्यावरण का क्षरण और सामाजिकता का ह्रास विकास को निरर्थक बना देते हैं। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया को विकास का एक नवीन प्रतिमान दे सकता है, जो विकास और रोजगार के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास में समन्वय स्थापित कर सके। यह कार्य शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। इसके लिए सक्षम, नैतिक और चरित्रवान नागरिकों का निर्माण आवश्यक है। विकास केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि देश के नागरिकों का भी दायित्व है। शिक्षा जगत में विद्यार्थियों और संस्थानों को स्वावलंबी बनाकर नवाचार, नवोन्मेष, आविष्कार और उद्यम को बढ़ावा दिया जा सकता है। डॉ. कोठारी ने बताया कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को लेकर शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास देश के विभिन्न स्थानों पर ज्ञान सभाओं का आयोजन कर रहा है। इस निमित्त देश के विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ट लोगों, जैसे उद्योगपतियों, विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, अभियंताओं तथा अन्य नीति-निर्माताओं से चर्चा कर इस विषय पर एक समग्रतावादी दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही, विषय को लेकर जागरूकता हेतु देश के विभिन्न संस्थानों में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं तथा तत्काल रूप से किए जा सकने वाले कार्यों को क्रियान्वित कराने का प्रयास भी किया जा रहा है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राज्य वित्त आयोग, मध्यप्रदेश के अध्यक्ष जयभान सिंह पवैया ने अपने प्रभावोत्पादक संबोधन में कहा कि देश में भौतिक विकास से भव्यता तो प्राप्त की जा सकती है, लेकिन दिव्यता नहीं। यह देश में सांस्कृतिक उन्नयन और आध्यात्मिक चेतना के विकास से ही संभव है। उन्होंने अपील की कि हम अपनी जड़ों से भी जुड़े रहें और चंद्रमा पर ध्वज भी फहराएँ। हमें परंपरा और आधुनिकता का समन्वय करना है, लेकिन किसी की नकल नहीं करनी है। श्री पवैया ने शिक्षा के पूर्ण सरकारीकरण अथवा पूर्ण व्यापारीकरण को उचित नहीं बताया। उन्होंने कहा कि हमें अपनी परंपराओं से सीखना है, विशेषकर पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में, और अपने परिवेश के अनुसार कार्य करना है। अपनी पुरानी उद्यम की परंपरा को पुनर्स्थापित करना है। उन्होंने बताया कि करीब एक हजार वर्ष तक भारत की वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी एक तिहाई थी।
अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत ने ‘विकसित’ शब्द के अक्षरों के माध्यम से विकास की अवधारणा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ‘वि’ से विकास को लेकर विमर्श, जिसे जन-जन तक पहुँचाना है; ‘क’ से कर्तव्यनिष्ठा; ‘सि’ से सिद्धियाँ, शिक्षा, विकास और रोजगार की; तथा ‘त’ से तरंग, अर्थात लोगों में उत्साह और उमंग का प्रसार। प्रारंभ में डॉ. एम. के. गुप्ता, विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान ने समस्त अतिथियों का परिचय एवं शाब्दिक स्वागत किया। श्री धीरेन्द्र सिंह भदौरिया, संयोजक, मध्यभारत प्रांत, के साथ अन्य पदाधिकारियों ने अतिथियों का शॉल, श्रीफल एवं पुष्पगुच्छ से स्वागत किया। राजेन्द्र वैद्य क्षेत्र संयोजक विषय शिक्षा में स्वायत्तता ने सभागार में उपस्थित श्रोताओं को न्यास के विषय में जानकारी दी। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुशील मंडेरिया, विभागाध्यक्ष, सूक्ष्म जीव विज्ञान ने किया। कार्यक्रम का संचालन अशोक तिवारी ने किया। इस अवसर पर न्यास के राष्ट्रीय संयोजक विनोद, सह-संयोजक ओम जी, अजय तिवारी, डॉ. अमिता जोशी, सदानंद सप्रे, प्रह्लाद जोशी, डॉ. स्मिता सहस्रबुद्धे, डॉ. हरीश अग्रवाल समेत अनेक विश्वविद्यालयों के कुलगुरु, संस्थानों के निदेशक, महाविद्यालयों के प्राचार्य, शिक्षाविद, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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