सबसे बडा संतोष धन : लवदास महाराज
श्रीमद् भागवत कथा के समापन पर सुदामा चरित्र का वर्णन
ग्वालियर। शताब्दीपुरम स्थित दंदरौआ धाम में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के समापन अवसर पर शुक्रवार को कथा व्यास पंडित लवदास महाराज ने सुदामा चरित्र का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि सुदामा जी के पास भले ही आर्थिक संसाधन नहीं थे, लेकिन जिनके मित्र स्वयं द्वारकाधीश हों, वे गरीब कैसे हो सकते हैं। सुदामा के पास संतोष धन था और संतोष से बड़ा कोई धन नहीं है। उनके मन में किसी वस्तु की कामना नहीं थी, लेकिन पत्नी सुशीला ने बच्चों की स्थिति देखकर उन्हें द्वारकाधीश श्रीकृष्ण के पास जाने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने कहा कि सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता त्याग, प्रेम और निस्वार्थ भाव का उदाहरण है। सुदामा जब श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे तो भगवान ने अपने मित्र का जिस आत्मीयता से स्वागत किया, वह भक्ति और प्रेम का अनुपम उदाहरण है है।
कथा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए लवदास महाराज ने कहा कि जिस प्रकार डॉक्टर औषधि देकर शरीर के रोगों को ठीक करता है, उसी प्रकार कथा व्यास कथा का अमृत घोलकर मनुष्य के मन में भक्ति की धारा प्रवाहित करता है। कथा कानों का रसायन( औषधि) है, जो मनुष्य के भीतर भक्ति और सकारात्मक भाव जगाती है।
समापन अवसर पर कथा के आयोजन में निस्वार्थ भाव से सेवाएं देने वाले वॉलिंटियर्स का सम्मान किया गया। इस अवसर पर कथा परीक्षित साधना राजीव कोठारी, भास्कर शर्मा, सागर नाती सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।