चेंबर : जनादेश तो स्पष्ट था लेकिन समझ ही नहीं पाये ?

(माधव अग्रवाल)
जनादेश स्पष्ट था, उसे स्वीकार करना चाहिए। एक जीतेगा, एक हारेगा लेकिन याद यही किया जाएगा कि आप कैसे लड़े, किन मुद्दों पर चुनाव लड़े। अगर हाउस का विरोध होता तो व्हाइट हाउस तीन सीटें नहीं ला पाता। मसला तो साफ है कि व्यापारियों ने व्यक्तिगत वोट डाले किसी हाउस या निर्दलीय को देख कर नहीं डाले और ऐसा लगभग हर चुनाव में होता है। मुझे इस मामले में भाजपा सबसे अच्छी पार्टी लगती है, 5 राज्यों के चुनाव हों और सिर्फ 1 या 2 राज्य भी जीत ले तो लड्डू बांटती है, उसी जीते राज्य की बात करती है।  जश्न मनाती है। व्हाइट हाउस को तो जश्न मनाना चाहिए कि छः मैं से तीन प्रत्याशी जीत कर आए हैं जबकि बगावत किए हुए हाउस के कोर सदस्य पूरे हाउस के खिलाफ थे। जीते हुए लोगों की पीठ थपथपाने की जगह कपड़े फाड़ेंगे तो वह भी किसी दिन हाथ न छोड़ दें।
बुद्धिजीवी वर्ग है, यदि पूरे प्रत्याशी मिल कर भी किसी एक के लिए वोट मांगते तो जन धारणा नहीं बदल पाते। नाम निर्धारित होते ही जो स्थिति अमूनन एक महीने पहले होती है वही नतीजे आते हैं। किसी का भी प्रचार ज्यादा प्रभाव नहीं दिखा पाता। स्पीड हवा में दिखती है, माहौल बदला बदला लगता है लेकिन व्यापारी का मन आम जनता की तरह आसानी से नहीं बदला जा सकता। वह अपने माल की तरह हर चीज तौल कर तिजोरी में रखे बैठा होता है और वोट देते वक्त ही तिजोरी खोलता है। प्रत्याशी केवल इतना कर सकते हैं कि चुनाव को ढीला न छोड़ें और व्यापारी यह न मान ले कि वह हार मान चुके हैं। जनादेश स्वीकारें और मंथन केवल इस बात पर करें कि जिन प्रत्याशियों ने सीट हारी, भविष्य में उनकी इमेज कैसे सुधारी जाए कैसे व्यापारियों के मन से सीधा जुड़ा जाए।

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