मृदा केवल खेती का आधार नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा ,एवं पर्यावरणीय संतुलन की महत्वपूर्ण धुरी हैः प्रोफेसर डाॅ जेडी शर्मा

 
 जैविक विकल्पों के प्रयोग से मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ती है, फसल की गुणवत्ता में सुधार होता हैः डाॅ- रोहित चौहान

- प्राकृतिक खेती कम लागत, अधिक टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल होती हैः डाॅ- प्रदीप राजपूत

- वर्मी कम्पोस्ट और उन्नत किस्म के बीच किसानों को बांटे

- किसानों से संवाद कर किया उनकी समस्याओं का समाधान

ग्वालियर। आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के स्कूल आफ एग्रीकल्चर द्वारा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के ‘खेत बचाओ अभियान‘ के तहत जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। स्कूल आफ एग्रीकल्चर की डीन डाॅ- शमा परवीन के तत्वावधान में संपन्न हये, जागरूकता कार्यक्रम का समन्वयन डाॅ- पारस नाथ झारिया द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्रोफेसर डाॅ- जेडी शर्मा, डाॅ- रोहित चौहान, डाॅ- प्रदीप राजपूत द्वारा किसानों के साथ संवाद कर उन्हें प्राकृतिक खेती करने के प्रति जागरूक किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में कृषक और ग्रामीण जन मौजूद रहे।
मृदा केवल खेती का आधार नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा ,एवं पर्यावरणीय संतुलन की महत्वपूर्ण धुरी हैः प्रोफेसर डाॅ- जेडी शर्मा 
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के स्कूल आफ एग्रीकल्चर द्वारा ‘खेत बचाओ अभियान‘ के तहत तुरारी गांव में आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में प्रोफेसर डाॅ- जेडी शर्मा ने कहा कि मृदा केवल खेती का आधार नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा ,एवं पर्यावरणीय संतुलन की महत्वर्पू धुरी है। उन्होंने किसानों से भूमि की उर्वरता बना, रखने के लिये, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, फसल चक्र अपनाने तथा जैविक संसाधनों के अधिकतम उपयोग पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि मृदा स्वास्थ्य संरक्षा से न केवल उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है, बल्कि कृषि की स्थिरता और किसानों की आय में भी सकारात्मक सुधार आता है।
जैविक विकल्पों के प्रयोग से मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ती है, फसल की गुणवत्ता में सुधार होता हैः डाॅ- रोहित चैहान
वहीं डॉ- रोहित चौहान ने किसानों को जैव उर्वरकों, जैव कीटनाशकों तथा हरी खाद के महत्व से अवगत कराते हुये  बताया कि रासायनिक उर्वरकों ,एवं कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि जैविक विकल्पों के प्रयोग से मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ती है, फसल की गुणवत्ता में सुधार होता है उन्होंने किसानों को विभिन्न जैविक उत्पादों के उपयोग की विधियों की व्यावहारिक जानकारी भी प्रदान की।
प्राकृतिक खेती कम लागत, अधिक टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल होती हैः डाॅ- प्रदीप राजपूत
इसी क्रम में डाॅ- प्रदीप राजपूत ने प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों पर विस्तार से चर्चा करते हुये कहा कि यह खेती पद्धति कम लागत, अधिक टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल है। उन्होंने प्राकृतिक खेती के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता बना, रखने, जल संरक्षण को बढ़ावा देने और रासायनिक अवशेषों से मुक्त गुणवत्ता पूर्ण उत्पादन प्राप्त करने के लाभों को रेखांकित किया। उन्होंने किसानों को स्थानीय संसाधनों पर आधारित खेती अपनाने और प्राकृतिक कृषि तकनीकों के प्रयोग के लिये  प्रेरित किया।
किसानों से संवाद कर किया उनकी समस्याओं का समाधान
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के स्कूल आफ एग्रीकल्चर द्वारा ‘खेत बचाओ अभियान‘ के तहत तुरारी गांव में आयोजित जागरूकता कार्यक्रम के अंतर्गत संवादात्मक सत्र का भी आयोजन किया गया। जहां उपस्थित विशेषज्ञों ने कृषि उत्पादन, कीट ,एवं रोग प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य तथा प्राकृतिक खेती से संबंधित विभिन्न समस्याओं और जिज्ञासाओं पर किसानों से विस्तार से चर्चा की। इसके साथ ही विशेषज्ञों ने किसानों की समस्याओं का समाधान करते हुये उन्हें वैज्ञानिक ,एवं व्यावहारिक सुझाव प्रदान किये। 
वर्मी कम्पोस्ट और उन्नत किस्म के बीज किसानों को बांटे
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के स्कूल आफ एग्रीकल्चर द्वारा ‘खेत बचाओ अभियान‘ के तहत तुरारी गांव में आयोजित जागरूकता कार्यक्रम के दौरान संस्थान की ओर से किसानों को वर्मी कम्पोस्ट और उन्नत किस्म के बीज वितरित किये गये, जिससे वे आधुनिक ,एवं टिकाऊ कृषि तकनीकों को अपनाने के लिये, प्रेरित हो सकें। कार्यक्रम में उपस्थित किसानों ने इस पहल को अत्यंत उपयोगी, ज्ञानवर्धक ,एवं लाभकारी बताते हुये  आयोजकों की सराहना की।

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