आंगनवाड़ी की दीदियों ने बदल दी साहिल की दुनिया

(हितेन्द्र सिंह भदौरिया)
ग्वालियर ।  नन्हे-मुन्ने डेढ़ वर्षीय बच्चे साहिल का मानसिक व शारीरिक विकास सामान्य बच्चों की तरह नहीं हो रहा था। उसकी सुस्ती, चिड़चिड़ापन और मोबाइल स्क्रीन की लत से साहिल की मां सदैव चिंतित रहती थी। सरकार द्वारा चलाए गए पोषण पखवाड़ा के दौरान आंगनबाड़ी की दीदियों की सक्रिय पहल और मां की लगन ने मिलकर इस नन्हे-मुन्ने बच्चे की जिंदगी में अदभुत बदलाव ला दिया है। यह सच्ची कहानी है शहर के नाका चंद्रबदनी क्षेत्र में स्थित रानीपुरा बस्ती में निवासरत श्रीमती नगीना के बेटे साहिल की। सरकार की पहल पर बीते माह 9 से 23 अप्रैल तक के बीच “जीवन के पहले छह वर्षों में मस्तिष्क के विकास को अधिकतम करना” थीम पर पोषण पखवाड़ा आयोजित किया गया । इसी दौरान ग्वालियर शहर के अंतर्गत आंगनबाड़ी केन्द्र रानीपुरा क्रमांक 02 की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती कुशुमलता साहू और पर्यवेक्षक श्रीमती आरती मिश्रा ने नगीना के घर गृह भ्रमण किया। 
आंगनबाड़ी की दीदियों ने नगीना को बताया कि मानव मस्तिष्क का 85 प्रतिशत से अधिक विकास शुरुआती 6 वर्षों में ही होता है। उन्होंने तिरंगा भोजन, मोटे अनाज और मौसमी सब्जियों के महत्व के साथ-साथ आंगनवाड़ी केन्द्र से मिलने वाले टेक होम राशन (THR) से पौष्टिक हलवा और खिचड़ी बनाने की विधि सिखाई। स्क्रीन टाइम बंद कर बच्चे के साथ कहानियाँ, खेल और बातचीत को दिनचर्या में शामिल करने की सलाह दी ।
नगीना ने यह सीख पूरी लगन से अपनाई। नतीजा सबके सामने है पोषण ट्रैकर की ग्रोथ मॉनिटरिंग में साहिल का वजन और लंबाई अब सामान्य श्रेणी (ग्रीन जोन) में आ चुके हैं। उसकी सुस्ती और चिड़चिड़ापन छूमंतर हो गया है, वह अब अन्य बच्चों के साथ खेलता है, कविताएँ सुनता है और उसकी सीखने की क्षमता में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। केंद्र की 'स्वस्थ बालक-बालिका स्पर्धा' में भी साहिल को उसकी बेहतर सेहत के लिए सराहा गया।
नगीना कहती हैं पहले लगता था बच्चा खुद सीख जाएगा। लेकिन आंगनवाड़ी दीदी ने समझाया कि ये 6 साल पूरे भविष्य की नींव हैं। आज मेरा बेटा मोबाइल छोड़कर खेल-खेल में नई चीजें सीख रहा है। वह शारीरिक रूप से भी मजबूत हुआ है। नगीना भावुक होकर बोलीं कि मैं सरकार द्वारा चलाए गए पोषण अभियान के प्रति दिल से आभारी हूँ। इसी अभियान की बदौलत मेरे आंखों के तारे को नई जिंदगी मिली है। 
साहिल की खुशियों की यह दास्तां बताती है कि सरकार की संवेदनशील योजनाएँ और समर्पित आंगनवाड़ी कार्यकर्ता मिलकर किस तरह एक बच्चे का भविष्य सँवार सकती हैं। 

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