(प्रस्तुति: रेणु सिंह परमार)
मानव जाति सदैव असीम सुख की खोज में रहती है, लेकिन श्री श्री परमहंस योगानन्दजी के अनुसार यह खोज केवल ईश्वर-प्राप्ति पर ही समाप्त होती है। 5 जनवरी को उनके आविर्भाव दिवस के अवसर पर दुनिया भर के साधक उनके दिव्य मार्गदर्शन का स्मरण कर रहे हैं।
5 जनवरी, 1893 को गोरखपुर में जन्मे मुकुन्द (योगानन्दजी) का झुकाव बचपन से ही ध्यान और ईश्वर की ओर था। 17 वर्ष की आयु में उन्हें अपने गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी का सान्निध्य मिला, जहाँ कठिन आध्यात्मिक प्रशिक्षण के बाद वे 'परमहंस योगानन्द' बने। उनका मानना था कि गुरु-शिष्य का संबंध पार्थिव शरीर से परे और शाश्वत होता है। योगानन्दजी ने अध्यात्म को विज्ञान से जोड़ा। उन्होंने भारत में योगदा सत्संग सोसाइटी (YSS) और अमेरिका में सेल्फ़-रियलाइजेशन फ़ेलोशिप (SRF) की स्थापना की। उन्होंने 30 से अधिक वर्षों तक पश्चिम में क्रियायोग का प्रचार किया और सिखाया कि ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव ही धर्म का वास्तविक आधार है।
उनकी आत्मकथा 'योगी कथामृत' आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणापुंज बनी हुई है। साथ ही, उनकी कृतियाँ 'ईश्वर-अर्जुन संवाद: श्रीमद्भगवद्गीता' और 'द सेकंड कमिंग ऑफ़ क्राइस्ट' पूर्वी व पश्चिमी परंपराओं के साझा सत्य को प्रकट करती हैं। योगानन्दजी का आश्वासन था कि वे इस जीवन के परे भी साधकों की सहायता के लिए उपस्थित रहेंगे। उनका जीवन संदेश स्पष्ट है: भक्ति, अनुशासन और नियमित ध्यान के माध्यम से ही मनुष्य उस परम आनंद को प्राप्त कर सकता है, जिसकी उसे तलाश है।