गांधी के विचार पृथ्वी के प्रत्येक व्यक्ति की जरूरत पूरी कर सकती हैः अरविंद मोहन
- आईटीएम यूनिवर्सिटी में गांधी विचार श्रृंखला-4 कार्यक्रम का हुआ समापन
ग्वालियर। आईटीएम यूनिवर्सिटी में भारतीय ज्ञान परम्परा अध्ययन पीठ के तहत ‘गांधी विचार श्रृंखला-4‘ (महात्मा गांधी-जय प्रकाश नारायण-पं. दीनदयाल उपाध्याय) कार्यक्रम का चतुर्थ सत्र संपन्न होन के साथ ही समापन हुआ। इस सत्र की अध्यक्षता आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के प्रो-चांसलर डाॅ. दौलत सिंह चैहान द्वारा की गई। जिसका विषयः ‘समकालीन चुनौतियां (पर्यावरण, तकनीक व विषमता) और आग का मार्ग रहा। वहीं सत्र में वक्ता के रूप में गांधी विचारक अरविंद मोहन, जेपी विचाकर शिवदयाल और दीनदयाल विचारक हरेन्द्र प्रताप शामिल हुए। इस अवसर पर आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के फाउंडर चांसलर रमाशंकर सिंह जी, चांसलर श्रीमती रुचि सिंह, रजिस्ट्रार डाॅ. ओमवीर सिंह सहित विभिन्न विभागों के अध्यक्ष, डीन, प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर एवं ग्वालियर शहर से आए गणमान्य नागरिक और बड़ी संख्या में युवा छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘गांधी श्रृंखला-4‘ के तहत चतुर्थ सत्र का आयोजन संस्थान के तुरारी परिसर में लियोनार्दो द विंची ब्लाॅक स्थित उस्ताद अलाउद्दीन खान आडिटोरियम में किया गया। इस अवसर पर वक्ता अरविंद मोहन ने गांधी दृष्टि पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि गांधी को गए लगभग 80 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने गांधी के विचार पृथ्वी के प्रत्येक व्यक्ति की जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन किसी एक व्यक्ति के लोभ को नहीं का उल्लेख करते हुए उपभोक्तावाद और बढ़ती आर्थिक असमानता पर चिंता व्यक्त की। चरखे और मैनचेस्टर की कपड़ा मिलों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि गांधी का स्वदेशी आंदोलन केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता का माध्यम नहीं था, बल्कि इसमें श्रम की प्रतिष्ठा और मानवीय संवेदनशीलता भी निहित थी। उन्होंने कहा कि गांधी भारतीय गरीबों के साथ-साथ इंग्लैंड के मजदूरों की बेरोजगारी को लेकर भी संवेदनशील थे। उन्होंने कहा कि आज आर्थिक असमानता के साथ तकनीक और संसाधनों पर बड़ी कंपनियों का प्रभाव भी बढ़ रहा है। बाजार और विज्ञापन लोगों की जरूरतों के बजाय उनकी इच्छाओं को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे अनावश्यक उपभोग और पर्यावरणीय समस्याएं बढ़ रही हैं। औद्योगिक प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और अनियंत्रित शहरीकरण को गंभीर चुनौती बताते हुए उन्होंने कहा कि गांधी का ग्राम स्वराज, स्थानीय उत्पादन और विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था का विचार आज भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने जोर दिया कि विज्ञान और तकनीक का उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि मानवता, समाज और पर्यावरण के हित में कार्य करना होना चाहिए।
गांधी के बाद जयप्रकाश नारायण ऐसे नेता थे जो सत्ता से सबसे अधिक विरक्त रहेः शिवदयाल
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘गांधी श्रृंखला-4‘ कार्यक्रम में वक्ता और जेपी विचारक शिवदयाल जी ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जीवन, विचारों और राजनीतिक यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गांधी के बाद जयप्रकाश नारायण ऐसे नेता थे जो सत्ता से सबसे अधिक विरक्त रहे। उनका चिंतन हमेशा आम जनता और उसके हितों पर केंद्रित रहा। उन्होंने कहा कि जयप्रकाश नारायण ने 1921 के असहयोग आंदोलन के दौरान पढ़ाई छोड़ दी थी। आगे की शिक्षा के लिए अमेरिका गए, जहां मजदूर के रूप में काम करते हुए उन्होंने श्रमिकों की समस्याओं और पूंजीवादी व्यवस्था की असमानताओं को करीब से समझा। वर्ष 1929 में भारत लौटने के बाद उन्होंने भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप समाजवाद की अवधारणा विकसित की और 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और 1974 के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में जयप्रकाश नारायण की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और जनता की भागीदारी को महत्व दिया। उन्होंने कहा कि जयप्रकाश नारायण आर्थिक विषमता, संपत्ति के असमान वितरण और जन्म आधारित भेदभाव को सामाजिक समस्याओं का प्रमुख कारण मानते थे। उन्होंने कहा कि पहचान आधारित राजनीति के कारण कई बार आर्थिक और वर्गीय असमानता जैसे मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। उन्होंने कहा कि ग्राम समुदाय, स्थानीय स्वशासन और विकेंद्रीकरण को मजबूत किए बिना वास्तविक सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है। इसके लिए आम जनता की सक्रिय भागीदारी और सामुदायिक शक्ति को बढ़ावा देना आवश्यक है।
भारतीय दर्शन प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा मानता हैः हरेंद्र प्रताप
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘गांधी श्रृंखला-4‘ कार्यक्रम में वक्ता हरेंद्र प्रताप ने महात्मा गांधी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और भारतीय ज्ञान परम्परा के विचारों को सामने रखते हुए कहा कि गांधी को केवल उनके वृद्धावस्था के चित्रों से नहीं, बल्कि दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष करने वाले युवा गांधी के रूप में भी समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय ज्ञान परम्परा और राष्ट्र जीवन के मूल्यों को जनसंघ की नीति एवं सिद्धांतों के निर्माण में महत्वपूर्ण स्थान दिया था। भारतीय और पश्चिमी चिंतन की तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा मानता है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे सूत्र इसी व्यापक कल्याण और जिम्मेदारी की भावना को व्यक्त करते हैं। पर्यावरण संरक्षण पर चिंता जताते हुए उन्होंने हिरोशिमा-नागासाकी और भोपाल गैस त्रासदी का उल्लेख किया तथा कहा कि औद्योगिक और रासायनिक प्रदूषण का दुष्प्रभाव आने वाली पीढ़ियों तक बना रहता है। उन्होंने मड़ुआ, ज्वार और बाजरा जैसी पारंपरिक फसलों को बढ़ावा देने, रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग को कम करने तथा मिट्टी, जल, वायु और स्थानीय वनस्पतियों के संरक्षण पर जोर दिया।
गांधी विचार श्रृंखला का उद्देश्य विद्यार्थियों को विभिन्न विचारधाओं से परिचित कराना हैः प्रो-चांसलर डाॅ. दौलत सिंह चैहान
‘गांधी श्रृंखला-4‘ कार्यक्रम में चतुर्थ सत्र की अध्यक्षता कर रहे आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के प्रो-चांसलर डाॅ. दौलत सिंह चैहान ने कहा कि आज इन विचारों को समझना युवाओं के लिए बेहद जरूरी है। हो सकता है कि आज युवाओं को गांधी, जयप्रकाश नारायण और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार पुराने या अपने जीवन से अलग लगें, लेकिन भविष्य में इन्हीं विचारों की प्रासंगिकता और अधिक समझ में आएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि गांधी विचार श्रृंखला का उद्देश्य किसी एक विचारक को श्रेष्ठ या किसी दूसरे को कमतर बताना नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को विभिन्न विचारधाराओं से परिचित कराना है, ताकि वे उनमें से श्रेष्ठ विचारों को समझकर अपने जीवन में अपना सकें।
प्रो-चांसलर डाॅ. दौलत सिंह चैहान ने कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता और सांस्कृतिक विशिष्टता में है। यदि दुनिया के सभी देश एक जैसे बनने लगें, तो उनकी अपनी सभ्यता और पहचान समाप्त होने लगेगी। उन्होंने कहा कि आज पूंजीवाद और बड़ी कंपनियों का प्रभाव केवल आर्थिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीक के माध्यम से लोगों की सोच, पसंद और निर्णयों को भी प्रभावित कर रहा है। उन्होंने गांधी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ का उल्लेख करते हुए कहा कि युवाओं को यह समझने की आवश्यकता है कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल मनोरंजन या दुनिया से जुड़ने के माध्यम नहीं हैं। इनके माध्यम से लोगों की सोच और व्यवहार को भी प्रभावित किया जा सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों को इंस्टाग्राम, फेसबुक और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के उपयोग के प्रति जागरूक रहने की सलाह दी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि तकनीक का अत्यधिक उपयोग कहीं न कहीं मनुष्य की स्वतंत्र सोचने, लिखने और समझने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों से सवाल किया कि क्या वे तकनीक का उपयोग कर रहे हैं या धीरे-धीरे तकनीक उन पर नियंत्रण स्थापित कर रही है।उन्होंने कहा कि तकनीक का उपयोग समाज को जोड़ने, पर्यावरण को बचाने और असमानता कम करने के लिए होना चाहिए। उन्होंने सभी वक्ताओं और विद्यार्थियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि गांधी, जयप्रकाश नारायण और दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को समझना केवल इतिहास को जानना नहीं, बल्कि भविष्य के समाज की दिशा तय करने के लिए भी जरूरी है।
‘गांधी श्रृंखला-4‘ कार्यक्रम के दौरान प्रश्नोत्तर सत्र का आयोजन किया गया। जहां छात्र-छात्राओं ने वक्ताओं से समकालीन चुनौतियों, तकनीक, सामाजिक व्यवस्था और गांधीवादी विचारों की वर्तमान प्रासंगिकता से जुड़े प्रश्न पूछे। जिनके जवाब वक्ताओं ने बड़े ही सहजता से दिए। सत्र के समापन पर बीसीए की छात्र जिया खान द्वारा अतिथियों को स्मृति-चिह्न भेंट किए गए। इसके बाद सम्पूर्ण राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के साथ ‘गांधी विचार श्रृंखला-4‘ कार्यक्रम का समापन हुआ।