ग्वालियर। हिंदी केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन, दर्शन और संस्कृति की संवाहक है, फिर भी वह आज भी अपने उचित सम्मान के लिए संघर्षशील है। यह बात सांची बौद्ध विवि की कार्यकारी परिषद के सदस्य महर्षि अभय कात्यायन ने कही।
जीवाजी विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान परंपरा नोडल केंद्र द्वारा ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में हिंदी की भूमिका’ विषय पर भाषण, निबंध प्रतियोगिता और व्याख्यान आयोजित किया गया। अध्यक्षता कुलगुरु प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत ने की। उन्होंने कहा मातृभाषा से जुड़कर ही भावों की सहज अभिव्यक्ति संभव है, मातृभाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए। कार्यक्रम में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के धीरेन्द्र सिंह भदौरिया, डॉ. कुमार संजीव और संयोजक डॉ. शांतिदेव सिसोदिया भी मंचासीन रहे।
प्रतियोगिता परिणाम
भाषण में मुस्कान गुर्जर प्रथम, शिवम सिंह द्वितीय।
निबंध में शिवि चौधरी प्रथम, सचिन रामपुरे द्वितीय, शिवानी कोठारी तृतीय रहे।