निशांत के मुरझाए चेहरे पर लौटी मुस्कान...
(हितेन्द्र सिंह भदौरिया)
ग्वालियर। एक माँ की गोद में जब बच्चा किलकारियाँ भरता है, तो वह हँसी पूरे घर को रोशन कर देती है। लेकिन कुछ महीने पहले तक ग्वालियर जिले के विकासखंड मुरार स्थित ग्राम बिल्हेटी के छोटे से घर में यह हँसी कहीं खो गई थी। धर्मेन्द्र और श्रीमती निशा के आँगन में जन्मा उनका लाडला निशांत, जन्म के साथ ही एक कठिन लड़ाई में उलझ गया था। वह लड़ाई थी कुपोषण के खिलाफ।
महज 6.600 किलोग्राम वजन और 65 सेंटीमीटर की लंबाई के साथ जन्मा यह नन्हा जीवन बेहद नाजुक था। हर गुजरता दिन माता-पिता के लिए चिंता की एक नई परत जोड़ रहा था। कहा जाता है कि हर अंधेरे के पीछे एक उम्मीद की किरण जरूर होती है। यह किरण बनकर आईं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती ऊषा राणा और साथ में सरकार द्वारा संचालित पोषण पुनर्वास केन्द्र (एनआरसी) । आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने अपनी अनुभवी नजरों से समय रहते निशांत में कुपोषण के लक्षण भाँप लिए। उन्होंने निशा और धर्मेन्द्र से मुलाकात कर निशांत के स्वास्थ्य पर खुलकर बात की। साथ ही उसे पोषण पुनर्वास केन्द्र (एनआरसी) में भर्ती कराने की सलाह दी।
शुरुआत में यह सलाह आसान नहीं थी। किसी भी माता-पिता की तरह, निशा और धर्मेन्द्र के मन में भी झिझक और डर था कि अपने नवजात को घर से दूर, एक केन्द्र में कैसे लेकर रहें। लेकिन आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ऊषा राणा ने हार नहीं मानी। उन्होंने धैर्य के साथ, बार-बार परिवार से संवाद किया, समझाया कि यही रास्ता निशांत को स्वस्थ भविष्य दे सकता है। आखिरकार, एक माँ का दिल अपने बच्चे की भलाई के आगे झुक गया, और परिवार निशांत को एनआरसी में भर्ती कराने के लिए राजी हो गया। पोषण पुनर्वास केन्द्र में बीते निशांत के 14 दिन उसके जीवन के सबसे निर्णायक अध्याय बनकर आए। पोषण पुनर्वास केन्द्र में उसे मिली विशेषज्ञ देखभाल, संतुलित पोषण और सतत चिकित्सा निगरानी ने धीरे-धीरे कमाल दिखाना शुरू किया। जो बच्चा कुछ दिन पहले तक कमजोर और सुस्त था, अब उसका वजन बढ़ने लगा, लंबाई सामान्य गति से बढ़ने लगी, और सबसे खूबसूरत बात उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आई।
एनआरसी से छुट्टी के बाद भी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ऊषा राणा ने निशांत का हाथ नहीं छोड़ा। तीन फॉलोअप विजिट्स के जरिए उसके स्वास्थ्य पर नजर बनाए रखी। साथ ही माता-पिता को पोषण व देखभाल की बारीकियाँ समझाईं। अब निशांत की खिलखिलाहट इस बात की जीती-जागती मिसाल है कि सही समय पर पहचान, सही इलाज और निरंतर अपनापन किसी भी कुपोषित बच्चे की जिंदगी बदल सकता है। उसके माता-पिता की आँखों में जो चमक है, वह शब्दों में बयां करना मुश्किल है। उनका कहना है कि सरकार एनआरसी के माध्यम से हम जैसे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को नई जिंदगी दे रही है। निशांत की खुशियों की यह दास्तां सिर्फ एक बच्चे की जीत और एनआरसी की सफलता ही नहीं, बल्कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का समर्पण भी है, जो चुपचाप, बिना थके घर-घर जाकर उम्मीद के दीये जलाती रहती हैं।