बनाकर नाम वापस आ गए हैं।
सुखद परिणाम वापस आ गए हैं।
कहीं वनवास अब भी चल रहा है,
कहीं पर राम वापस आ गए हैं।।
जो दीवाली पर भी अपने घर से दूर कहीं किसी अंजान शहर के कोने में बैठकर, मायूसी के साथ आसमान में बिखरे रंगों से कुछ रंग चुरा कर जबरन ही सही,, मुस्कुराना चाहते हैं।
फ़ोन की स्क्रीन पर अपनों की फोटो ज़ूम करते हुए जिनकी आँखें डबडबाई हैं,,, और ब्लर हैं सारी योजनाएं।
काश! उनके भी वनवास खत्म हों और वो भी नन्हा दिया जलाकर माँ के हाथ से मुँह मीठा कर, पिता के गले लगकर कह सकें,,,,
happy diwali.
Shashi Shreya
शशि श्रेया
कवियत्री लखनऊ