लोकतंत्र में सरकार के साथ नागरिकों की जिम्मेदारी और सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक हैः फाउंडर चांसलर रमाशंकर सिंह
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में चल रहा ‘गांधी विचार श्रृंखला-4‘ कार्यक्रम
- अहिंसा केवल एक विचार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रभावशाली शक्ति हैः डाॅ. सुजाता चौधरी
- युवाओं को शिक्षा के साथ अपने अधिकारों और कर्तव्यों की भी समझ होनी चाहिएः देव प्रिय अवस्थी
- युवाओं को महान विचारकों के सिद्धांतों को केवल पढ़ना ही नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और कार्यों में भी अपनाना चाहिएः डाॅ. मीना कुमारी
- गांधी जी का मानना था कि हर व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार शारीरिक श्रम करना चाहिएः राकेश कुमार पालीवाल
ग्वालियर । आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में भारतीय ज्ञान परम्परा अध्ययन पीठ के तहत ‘गांधी विचार श्रृंखला-4‘ (महात्मा गांधी-जय प्रकाश नारायण-पं. दीनदयाल उपाध्याय) कार्यक्रम में द्वितीय और तृतीय सत्र की अध्यक्षता आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के फाउंडर चांसलर रमाशंकर सिंह एवं वाइस चांसलर प्रोफेसर डाॅ. योगेश उपाध्याय द्वारा की गई। वहीं दोनों सत्रों में वक्ता के रूप में राकेश कुमार पालीवाल, सुधांशु रंजन, मुकेश मिश्रा, डाॅ. सुजाता चौधरी, देव प्रिय अवस्थी और डाॅ. मीना कुमारी शामिल हुईं। इस अवसर पर आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर की चांसलर श्रीमती रुचि सिंह, प्रो-चांसलर डाॅ. दौलत सिंह चौहान, रजिस्ट्रार डाॅ. ओमवीर सिंह, आईटीएम ग्वालियर की डायरेक्टर डाॅ. मीनाक्षी मजूमदार सहित विभिन्न विभागों के अध्यक्ष, डीन, प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर एवं ग्वालियर शहर से आए गणमान्य नागरिक और बड़ी संख्या में युवा छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
द्वितीय सत्र
गांधी जी का मानना था कि हर व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार शारीरिक श्रम करना चाहिएः राकेश कुमार पालीवाल
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘गांधी विचार श्रृंखला-4‘ के तहत द्वितीय सत्र का आयोजन संस्थान के तुरारी परिसर में लियोनार्दो द विंची ब्लाॅक स्थित उस्ताद अलाउद्दीन खान आॅडिटोरियम में किया गया। जिसकी अध्यक्षता वाइस चांसलर प्रोफेसर डाॅ. योगेश उपाधयाय द्वारा की गई। वहीं वक्ता के रूप में राकेश कुमार पालीवाल, सुधांशु रंजन और मुकेश मिश्रा शामिल हुए। इस सत्र का विषयः स्वदेशी, अर्थनीति, ट्रस्टीशिप, श्रम और अंत्योदय रहा।
वक्ता राकेश कुमार पालीवाल ने गांधी दृष्टि पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि स्वदेशी का असली अर्थ आत्मनिर्भरता और स्थानीय संसाधनों का उपयोग करना है। उन्होंने गांधी जी के सेवाग्राम आश्रम का उदाहरण देते हुए बताया कि आश्रम का जीवन एक सामान्य किसान के घर जैसा होना चाहिए। वहां इस्तेमाल होने वाली अधिकतर चीजें आसपास के 5 से 10 किलोमीटर के क्षेत्र से ही आनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हर तरह के काम और श्रम का अपना महत्व है। चाहे कोई धोबी हो, नाई हो या बढ़ई, सभी के काम का सम्मान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि गांधी जी का मानना था कि हर व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार शारीरिक श्रम करना चाहिए। दूसरों की मेहनत पर निर्भर रहकर बिना श्रम किए जीवन बिताना उचित नहीं है।
वक्ता मुकेश मिश्रा ने दीनदयाल दृष्टि पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि तकनीक को भारतीय जरूरतों के अनुसार अपनाना चाहिए, ताकि देश के अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिल सके। उन्होंने अर्थव्यवस्था में विकेंद्रीकरण और आम लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि केवल विदेशों से सामान या उसके पुर्जे मंगाकर भारत में उन्हें जोड़ देना स्वदेशी नहीं कहलाता। स्वदेशी का अर्थ है अपने देश के संसाधनों, स्थानीय जरूरतों, प्रतिभाओं और संस्कृति को ध्यान में रखकर विकास करना। इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम आधुनिक तकनीक का विरोध करें। बल्कि जरूरत इस बात की है कि तकनीक को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाया जाए, जिससे देश के लोगों को रोजगार मिले और हम दूसरे देशों की नकल करने के बजाय अपनी जरूरतों के अनुसार आगे बढ़ सकें। उन्होंने कहा कि आर्थिक नीतियों का मुख्य उद्देश्य केवल उद्योगों और बाजारों का विकास नहीं होना चाहिए, बल्कि आम आदमी का जीवन बेहतर बनाना भी होना चाहिए। हर व्यक्ति को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए। यह सरकार और समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि विकास का लाभ केवल बड़े शहरों और उद्योगपतियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि गांवों और समाज के हर वर्ग तक पहुंचना चाहिए। मनरेगा जैसी योजनाएं भी इसी सोच को आगे बढ़ाती हैं, क्योंकि इनके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को रोजगार मिलता है।
वहीं वक्ता सुधांशु रंजन ने जेपी दृष्टि पर अपने विचार रखे। उन्होंने जयप्रकाश नारायण को एक गहरे और जटिल विचारक बताते हुए उनके आध्यात्मिक समाजवाद और गांधीवादी विचारों को समझने की जरूरत पर जोर दिया।
द्वितीय सत्र की अध्यक्षता कर रहे वाइस चांसलर प्रोफेसर डाॅ. योगेश उपाध्याय ने कहा कि इस तरह के विचार-विमर्श से युवाओं को भारतीय संस्कृति, आत्मनिर्भरता और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने का अवसर मिलता है। उन्होंने सभी वक्ताओं और अतिथियों का अभार व्यक्त किया।
तृतीय सत्र
लोकतंत्र में सरकार के साथ नागरिकों की जिम्मेदारी और सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक हैः फाउंडर चांसलर रमाशंकर सिंह
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘गांधी विचार श्रृंखला-4‘ के तहत तृतीय सत्र का आयोजन संस्थान के सिथौली परिसर में विक्रम साराभाई ब्लाॅक स्थित डाॅ. राममनोहर लोहिया सभागार में किया गया। जिसकी अध्यक्षता फाउंडर चांसलर रमाशंकर सिंह जी द्वारा की गई। वहीं वक्ता के रूप में डाॅ. सुजाता चौधरी, देव प्रिय अवस्थी और डाॅ. मीना कुमारी शामिल हुईं। इस सत्र का विषयः ‘राज्य का विकेंद्रीकरण, लोक-शक्ति और सहभागी लोकतंत्र‘ रहा।
तृतीय सत्र की अध्यक्षता कर रहे आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के फाउंडर चांसलर रमाशंकर सिंह ने कहा कि भारत जैसे विशाल देश में संघीय व्यवस्था, स्वतंत्र न्यायपालिका, संसद, राज्यों और पंचायतों को अधिकार देने का उद्देश्य शासन और निर्णय प्रक्रिया को जमीनी स्तर तक पहुंचाना था। लेकिन समय के साथ नागरिक अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन होते गए और प्रत्येक समस्या के समाधान की अपेक्षा सरकार से करने लगे। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कचरा हम फैलाते हैं, लेकिन उसे साफ करने की पूरी जिम्मेदारी सरकार की मान लेते हैं। लोकतंत्र में सरकार के साथ नागरिकों की जिम्मेदारी और सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है। डॉ. राममनोहर लोहिया और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में आम जनता की भूमिका सर्वाेपरि होनी चाहिए। उन्होंने राजनीतिक व्यवस्था में बढ़ते भ्रष्टाचार और सहभागी लोकतंत्र के कमजोर होते स्वरूप पर चिंता व्यक्त की। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय दर्शन को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि विकास का वास्तविक अर्थ समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुविधाएं और अवसर पहुंचाना है, जबकि वर्तमान में आर्थिक असमानता लगातार बढ़ रही है। वर्ष 1975 से 1977 के आपातकाल और उसके विरोध में हुए जनआंदोलन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सत्ता में तानाशाही प्रवृत्तियां बढ़ने पर नागरिकों को अपने अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आगे आना चाहिए। गांधीजी के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत का निर्माण विचारों की स्वतंत्रता, सम्मान और जागरूक नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है। लोकतंत्र को मजबूत बनाना केवल सरकार नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।
अहिंसा केवल एक विचार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रभावशाली शक्ति हैः डाॅ. सुजाता चौधरी
‘गांधी विचार श्रृंखला-4‘ में वक्ता डाॅ. सुजाता चौधरी ने ‘गांधी दृष्टि‘ विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि महात्मा गांधी के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान थे। उनका प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अल्बर्ट आइंस्टीन, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ और विश्व के अनेक विचारकों ने भी उनके व्यक्तित्व एवं योगदान को सराहा। उन्होंने कहा कि गांधीजी ने बाहरी दुनिया में बदलाव के साथ मनुष्य के आंतरिक परिवर्तन और नैतिक चेतना को भी महत्व दिया। गांधीजी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि अहिंसा केवल एक विचार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रभावशाली शक्ति है। गांधीजी ने इसी के माध्यम से महिलाओं, किसानों, बच्चों और वंचित वर्गों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा। उन्होंने महिलाओं को आंदोलन में सक्रिय भागीदारी का अवसर देकर सामाजिक बदलाव की नई राह भी दिखाई। विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए डॉ. चैधरी ने कहा कि गांधीजी युवावस्था से ही दूसरों की सहायता और उनकी कठिनाइयां कम करने के बारे में सोचते थे। उन्होंने विद्यार्थियों से गांधीजी सहित महान विचारकों के जीवन और दर्शन का अध्ययन करने तथा समाज के प्रति संवेदनशीलता और सहयोग की भावना विकसित करने का आग्रह किया।
युवाओं को शिक्षा के साथ अपने अधिकारों और कर्तव्यों की भी समझ होनी चाहिएः देव प्रिय अवस्थी
‘गांधी विचार श्रृंखला-4‘ में वक्ता ‘देव प्रिय अवस्थी ‘जेपी दृष्टि‘ विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के दलविहीन लोकतंत्र और लोकनीति की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लोकतंत्र राजनीतिक दलों के हितों के बजाय आम जनता की भागीदारी और जनहित पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने जेपी के सर्वाेदय और संपूर्ण क्रांति आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके विचारों को आगे बढ़ाने के लिए अभी बहुत प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि युवाओं को शिक्षा के साथ अपने अधिकारों और कर्तव्यों की भी समझ होनी चाहिए। लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती सत्ता के विकेंद्रीकरण और जमीनी स्तर पर आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है।
युवाओं को महान विचारकों के सिद्धांतों को केवल पढ़ना ही नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और कार्यों में भी अपनाना चाहिएः डाॅ. मीना कुमारी
‘गांधी विचार श्रृंखला-4‘ में वक्ता डाॅ. मीना कुमारी ने ‘दिनदयाल दृष्टि‘ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने भारतीय ज्ञान परम्परा अध्ययन पीठ और श्री रमाशंकर सिंह के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान समय में युवाओं और राजनीति के भविष्य को ध्यान में रखते हुए ऐसे विषयों पर चर्चा करना बेहद आवश्यक है। उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय और विकेंद्रीकरण के विचारों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि किसी देश का वास्तविक विकास जीडीपी के आंकड़ों से नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन स्तर और उसे मिलने वाली सुविधाओं से मापा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विकास की योजनाएं बनाते समय समाज के विभिन्न वर्गों और उनकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखना जरूरी है। विकास के साथ किसी क्षेत्र की मौलिकता और पहचान भी सुरक्षित रहनी चाहिए। उन्होंने राज्य और समाज के बीच की दूरी कम करने तथा स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप समाधान तैयार करने पर जोर दिया। विश्वविद्यालयों की भूमिका पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि विभिन्न संकायों के विद्यार्थी मिलकर सामाजिक समस्याओं के प्रभावी समाधान खोज सकते हैं। युवाओं को महान विचारकों के सिद्धांतों को केवल पढ़ना ही नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और कार्यों में भी अपनाना चाहिए।
वहीं द्वितीय और तृतीय सत्र में सवाल-जवाब राउंड का आयोजन भी किया गया। जहां उपस्थित छात्र-छात्राओं ने गांधी, जेपी और दीनदयाल की वर्तमान परिपेक्ष्य में आवश्यकताओं से संबंधित सवाल पूछे, जिनका जवाब वक्ताओं ने बड़े ही सहज और सरल अंदाज में दिए।