आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘गांधी विचार श्रंखला-4‘ कार्यक्रम का हुआ शुभारंभ
- गांधी जी को समझने के लिए उनके विचारों को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अपने व्यवहार और जीवनशैली में अपनाना भी आवश्यक हैः प्रोफेसर धनंजय राय
- जयप्रकाश नारायण के विचारों और संपूर्ण क्रांति आंदोलन से लोकतंत्र को समझने की जरूरतः कुमार प्रशांत
- सिद्धांतों को केवल विचारों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने व्यवहार का हिस्सा बनाना चाहिएः डाॅ. आद्या दीक्षित
- गांधी विचार श्रृृंखला का उद्देश्य विचारकों के जीवन और दर्शन से बच्चों और युवाओं को परिचित कराना हैः फाउंडर चांलसर रमाशंकर सिंह
- छात्र-छात्राओं ने पूछे सवालों का वक्ताओं ने दिया सहजता से जवाब
ग्वालियर । आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में भारतीय ज्ञान परम्परा अध्ययन पीठ के तहत ‘गांधी विचार श्रृंखला-4‘ कार्यक्रम का आगाज महात्मा गांधी, जय प्रकाश, पं.दीनदयाल उपाध्याय और प्रख्यात लेखकों की गरिमामयी उपस्थिति में बड़े ही सादगीपूर्ण माहौल में एवं युवा छात्र-छात्राओं के जोशीले अंदाज के साथ हुआ। आयोजन की श्रृंखला में महात्मा गांधी, जय प्रकाश, पं. दीनदयाल उपाध्याय पर केंद्रित विभिन्न विषयों पर अलग-अलग सत्रों में व्याख्यान माला का आयोजन किया जा रहा है। इसी के तहत प्रथम सत्र में वक्ता के रूप में गांधी विचारक प्रोफेसर धनंजय राय, जेपी विचारक कुमार प्रशांत और पं. दीनदयाल उपाध्याय विचारक डाॅ. आद्या दीक्षित शामिल हुईं। वहीं सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर राजकुमार जैन द्वारा की गई। इस अवसर पर आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के फाउंडर चांसलर रमाशंकर सिंह , वाइस चांसल प्रोफेसर डाॅ. योगेश उपाध्याय, रजिस्ट्रार डाॅ. ओमवीर सिंह, आईटीएम ग्वालियर की डायरेक्टर डाॅ. मीनाक्षी मजूमदार सहित विभिन्न विभागों के अध्यक्ष, डीन, प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर एवं ग्वालियर शहर से आए गणमान्य नागरिक और बड़ी संख्या में युवा छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
गांधी जी को समझने के लिए उनके विचारों को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अपने व्यवहार और जीवनशैली में अपनाना भी आवश्यक हैः प्रोफेसर धनंजय राय
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘गांधी विचार श्रृंखला-4 के तहत संस्थान के सिथौली परिसर में विक्रम साराभाई ब्लाॅक स्थित डाॅ. राममनोहर लोहिया सभागार में प्रथम सत्र का शुभारंभ अतिथियों के स्वागत के साथ हुआ। इस सत्र का ‘सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्य, साधना-साधन की पवित्रता और लोकतंत्र‘ विषय रहा। इस अवसर पर वक्ता व गांधी विचार प्रोफेसर धनंजय राय ने ‘गांधी के विचार और पूर्ण स्वराज‘ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने आईटीएम यूनिवर्सिटी को इस तरह के वैचारिक एवं बौद्धिक कार्यक्रम की सहराना कहते हुए कहा कि गांधी जी के विचार केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आज भी सामाजिक बदलाव, लोकतांत्रिक चेतना और व्यक्ति के नैतिक विकास के लिए प्रासंगिक हैं। उन्होंने गांधी जी के लेखन की तीन श्रेणियों जिनमें प्रमुख लेखन, खंडित लेखन और विशिष्ट लेखन का उल्लेख करते हुए छात्र-छात्राओं को उनके साहित्य और विचारों का गंभीरता से अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि गांधी जी को समझने के लिए उनके विचारों को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अपने व्यवहार और जीवनशैली में अपनाना भी आवश्यक है। उन्होंने गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रम को लोकतंत्र की मजबूती और सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। प्रोफेसर धनंजय राय ने कहा कि पूर्ण स्वराज को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के अर्थ में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे वैचारिक स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता, सामाजिक जिम्मेदारी और व्यावहारिक जीवन में स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता से भी जोड़कर समझना चाहिए।
जयप्रकाश नारायण के विचारों और संपूर्ण क्रांति आंदोलन से लोकतंत्र को समझने की जरूरतः कुमार प्रशांत
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘गांधी विचार श्रृंखला-4 के तहत आयोजित प्रथम सत्र में वक्ता और जेपी विचारक कुमार प्रशांत ने ‘जय प्रकाश नारायण और संपूर्ण क्रांति‘ विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने जयप्रकाश नारायण (जेपी) को एक जटिल और बहुआयामी व्यक्तित्व बताते हुए कहा कि जेपी को समझना अपने आप में एक बड़ी वैचारिक प्रक्रिया है। उनके विचारों और जीवन यात्रा को समझने के लिए उनके संघर्षों, सामाजिक सरोकारों और जनता के बीच किए गए कार्यों को जानना आवश्यक है। उन्होंने महात्मा गांधी के उस कथन का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने जयप्रकाश नारायण को आधुनिक समाजवाद की समझ के मामले में एशिया के श्रेष्ठ व्यक्तियों में से एक माना था। उन्होंने महात्मा गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण को अहिंसा के विचार से जुड़े तीन महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि इन तीनों के विचारों में अहिंसा, नैतिकता और सामाजिक परिवर्तन की भावना प्रमुख रूप से दिखाई देती है। उन्होंने जयप्रकाश नारायण के जीवन को दो चरणों में समझाया। पहला चरण गांधी जी के साथ उनके वैचारिक जुड़ाव और दूसरा गांधी जी के बाद उनके सामाजिक एवं राजनीतिक योगदान से संबंधित था। इस दौरान उन्होंने शांतिपूर्ण सत्याग्रह में नैतिक शक्ति और राजनीतिक शक्ति की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की वास्तविक ताकत केवल राजनीतिक दबाव में नहीं, बल्कि उसके नैतिक आधार और जनसमर्थन में निहित होती है। उन्होंने संपूर्ण क्रांति आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि मैं स्वयं इस आंदोलन का हिस्सा रहा हूं और उस दौर में युवाओं को एकजुट करने के प्रयासों को करीब से देखा है। इस आंदोलन का उद्देश्य युवाओं को देश और समाज के भविष्य के प्रति जागरूक करना था उन्हें परिवर्तन की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाना था। कुमार प्रशांत ने कहा कि लोकतंत्र को केवल चुनाव, राजनीतिक दलों या सत्ता परिवर्तन तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उसकी वास्तविक शक्ति जनता की सक्रिय भागीदारी, सामूहिक चेतना और सामाजिक जिम्मेदारी में निहित है। उन्होंने कहा कि गांधी और जय प्रकाश नारायण जैसे व्यक्तित्व कमरों में नहीं, बल्कि सड़कों पर मिलते हैं। इसके माध्यम से उन्होंने समझाया कि इन महान विचारकों को जानने के लिए केवल उनके लेखन और सिद्धांतों का अध्ययन पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके संघर्षों, आंदोलनों और आम जनता के बीच किए गए कार्यों को समझना भी जरूरी है।
सिद्धांतों को केवल विचारों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने व्यवहार का हिस्सा बनाना चाहिएः डाॅ. आद्या दीक्षित
‘गांधी विचार श्रृंखला-4 में वक्ता और पं. दीनदयाल उपाध्याय विचारक डाॅ. आद्या दीक्षित ने ‘ पं. दीनदयाल उपाध्याय और नैतिक मूल्य‘ विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के बारे में जानने के बाद या तो हम उससे जुड़ाव महसूस करते हैं या उसके विचार हमें सतही लगते हैं। उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन से जुड़ी एक कहानी के माध्यम से उनके सिद्धांतों के प्रति दृढ़ता को समझाया। उन्होंने कहा कि सिद्धांतों को केवल विचारों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने व्यवहार का हिस्सा बनाना चाहिए। उनका महत्वपूर्ण संदेश था कि ‘यदि आपका उद्देश्य विनाश है तो आप निर्माण नहीं कर सकते‘। उन्होंने कहा कि समाज में बदलाव की शुरुआत व्यक्ति के स्वयं के चरित्र और मूल्यों से होती है। जब तक व्यक्ति अपने व्यवहार में सुधार नहीं लाता, तब तक वह दूसरों को सही दिशा नहीं दे सकता। उन्होंने पं. दीनदयाल उपाध्याय के उस उद्देश्य का उल्लेख किया, जिसके अंतर्गत समाज के अंतिम व्यक्ति तक समान अवसर पहुंचाना महत्वपूर्ण था। उन्होंने ‘व्यष्टि से समष्टि, समष्टि से सृष्टि और सृष्टि से प्रशस्ति‘ की अवधारणा प्रस्तुत की। उन्होंने ‘लोग‘ और ‘लोक‘ के बीच अंतर को भी अपने वक्तव्य में शामिल किया।
गांधी विचार श्रृंखला का उद्देश्य विचारकों के जीवन और दर्शन से बच्चों और युवाओं को परिचित कराना हैः फाउंडर चांलसर रमाशंकर सिंह जी
‘गांधी विचार श्रृंखला-4 में प्रथम सत्र के दौरान आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के फाउंडर चांसलर श्री रमाशंकर सिंह जी ने गांधी विचार श्रृंखला की अब तक की वैचारिक यात्रा और इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि पहली श्रृंखला में गांधी और भगत सिंह, दूसरी में गांधी और आंबेडकर, तीसरी में गांधी, नेहरू और लोहिया और अब वर्तमान चैथी श्रृंखला में गांधी, जय प्रकाश नारायण और पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों पर चर्चा की जा रही है। उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं को इन विचारकों के जीवन और दर्शन से परिचित कराना इस कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि आईटीएम ग्वालियर किसी एक विचारधारा को छात्र-छात्राओं पर थोपना नहीं चाहता, बल्कि निष्पक्ष भाव से विभिन्न विचारों को उनके सामने रखना चाहता है। छात्र-छात्राएं उन विचारों को किस तरह समझते हैं और उनसे क्या निष्कर्ष निकालते हैं, यह उनकी अपनी जिम्मेदारी है। उन्होंने आज के समय में युवाओं के बीच ऐसी वैचारिक चर्चाओं के लिए मंच तैयार करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
इसी क्रम में ‘गांधी विचार श्रृंखला-4 में प्रथम सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर राजकुमार जैन ने आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर को बधाई देते हुए कहा कि मैनेजमेंट और टेक्नोलाॅजी पर केंद्रित संस्थान होने के बावजूद यहां इस तरह के वैचारिक और सामाजिक विषयों पर चर्चा के लिए मंच तैयार किया जा रहा है। उन्होंने आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर को शिक्षा और विचारों का केंद्र बताते हुए कहा कि छात्र-छात्राएं यहां सुनते हैं, समझते हैं और अपने भविष्य की दिशा तय करते हैं। उन्होंने कहा कि जिन विचारकों या व्यक्तियों से हम सहमत नहीं होते, उनके बारे में भी जानना और समझना जरूरी है। उन्होंने कहा कि नैतिक मूल्यों के उदाहरण के रूप में मधुलिमये, जवाहरलाल नेहरू, आचार्य नरेंद्र देव, अटल बिहारी वाजपेयी, जय प्रकाश नारायण और चंद्रशेखर जैसे व्यक्तित्वों का उल्लेख किया और उनके जीवन से सीख लेने की आवश्यकता पर जोर दिया।
छात्र-छात्राओं ने पूछे सवालों का वक्ताओं ने दिया सहजता से जवाब
‘गांधी विचार श्रृंखला-4 के अवसर पर सवाल-जवाब सत्र का आयोजन भी किया गया। जहां युवाओं ने समकालीन मुद्दों और विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े सवाल पूछे। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के बढ़ते प्रभाव को लेकर पूछे सवाल के जवाब में वक्ताओं ने कहा कि एआई जैसी टेक्नोलाॅजीज आती-जाती रहेंगी, लेकिन अंततः इंसान और उसकी मानवीय पहचान बनी रहेगी। आज का युवा गांधी को किस नजरिए से देखता है। इस सवाल का जवाब प्रोफेसर धनंजय राय ने देते हुए कहा कि समय के साथ गांधी को लेकर लोगों की सोच बदल रही है। लंबे समय तक गांधी केवल एक सरकारी प्रतीक बनकर रह गए थे, लेकिन अब धीरे-धीरे वे दोबारा जनता के बीच लौट रहे हैं और लोग उनके विचारों को नए सिरे से समझने लगे हैं। मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तंभ माना जाता है। इस सवाल का डाॅ. आद्या दीक्षित ने जवाब देते हुए कहा कि यदि लोकतंत्र का एक भी स्तंभ कमजोर होता है, तो उसका प्रभाव पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर पड़ता है। उहोंने कहा कि किसी कमजोर व्यवस्था को बदला जा सकता है या उसे मजबूत बनाया जा सकता है।