आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में हुआ ‘5वां सीके प्रहलाद मेमोरियल लेक्चर‘ का आयोजन
- वंदे भारत के निर्माण से मिली सीख, आत्मनिर्भरता के लिए अपने विचार और तकनीक विकसित करना जरूरीः डॉ. सुधांशु मणि
- नेतृत्व में भरोसा, सम्मान और साझा जिम्मेदारी जरूरीः डॉ. सुधांशु मणि
ग्वालियर । आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के स्कूल ऑफ बिजनेस एंड लीडरशिप द्वारा ग्वालियर मैनेजमेंट एसोसिएशन (जीएमए) के सहयोग से ‘5वां सीके प्रहलाद मेमोरियल लेक्चर‘ का आयोजन किया गया। जिसका विषय ‘फ्रॉम विजन टू वंदे भारतः लीडरशिप, इनोवेशन एंड एक्जीक्यूशन लेसन्स फ्रॉम द मैन हू लेड इट्स क्रिएशन‘ रहा। संस्थान के तुरारी परिसर में एलडीवी ब्लॉक स्थित उस्ताद अलाउद्दीन खान ऑडिटोरियर में आयोजित इस लेक्चर में स्पीकर के रूप में भारत की पहली वंदे भारत एक्सप्रेस के निर्माण की परिकल्पना एवं क्रियान्वयन का नेतृत्व करने वाले डॉ. सुधांशु मणि (इंटीग्रल कोच फैक्ट्री, चेन्नई के पूर्व महाप्रबंधक) शामिल हुए। इस अवसर पर आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के प्रो-चांसलर प्रोफेसर डॉ. दौलत सिंह चौहान, वाइस चांसलर प्रोफेसर डॉ. योगेश उपाध्याय, डीन एकेडमिक प्रोफेसर रंजीत सिंह तोमर, स्कूल ऑफ बिजनेस एंड लीडरशिप की विभागाध्यक्ष अमेया चौहान, जीएमए के उपाध्यक्ष राजेश खन्ना और मानद सचिव श्याम अग्रवाल (एसआरएपफ लिमिटेड में वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं प्लांट हेड), कार्यक्रम समन्वयक एवं एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीप शिखा चव्हाण सहित विभिन्न प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर, एमबीए सहित विभिन्न संकायों के छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में शामिल हुए।
वंदे भारत के निर्माण से मिली सीख, आत्मनिर्भरता के लिए अपने विचार और तकनीक विकसित करना जरूरीः डॉ. सुधांशु मणि
आईटीएम स्कूल ऑफ बिजनेस एंड लीडरशिप द्वारा जीएमए के सहयोग से आयोजित ‘5वां सीके प्रहलाद मेमोरियल लेक्चर‘ का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। वहीं एसओबीएलएस की विभागाध्यक्ष अमेया चौहान ने स्वागत उद्बोधन दिया। वहीं एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीप शिखा चव्हाण ने स्पीकर डॉ. सुधांशु मणि का परिचय दिया।
इस अवसर पर स्पीकर डॉ. सुधांशु मणि ने कहा कि किसी बड़े सपने को साकार करने के लिए केवल दूरदृष्टि होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे धरातल पर उतारने के लिए नवाचार, तकनीकी दक्षता, दृढ़ संकल्प और प्रभावी टीमवर्क भी जरूरी है। आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल देश में उत्पादों का निर्माण करना नहीं, बल्कि अपने विचार, डिजाइन और तकनीक विकसित करने की क्षमता हासिल करना भी है। डॉ. सुधांशु मणि ने ट्रेन-18, जिसे बाद में वंदे भारत एक्सप्रेस के रूप में पहचान मिली, के विकास की यात्रा साझा करते हुए बताया कि किस प्रकार एक महत्वाकांक्षी विचार को योजनाबद्ध प्रयासों, तकनीकी क्षमता और निरंतर काम के जरिए वास्तविकता में बदला जा सकता है। उन्होंने मेक इन इंडिया की भावना को आत्मनिर्भर भारत के व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए स्वदेशी तकनीक, मौलिक डिजाइन और देश में नवाचार विकसित करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी बड़ी परियोजना में चुनौतियां और असफलताएं प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि उनसे सीख लेकर आगे बढ़ा जाए और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता बनाए रखी जाए। उनकी प्रस्तुति ने विद्यार्थियों को समझाया कि विचार और उपलब्धि के बीच की दूरी को योजना, विशेषज्ञता और प्रभावी क्रियान्वयन से ही पाटा जा सकता है।
नेतृत्व में भरोसा, सम्मान और साझा जिम्मेदारी जरूरीः डॉ. सुधांशु मणि
भारत की पहली वंदे भारत एक्सप्रेस के निर्माण की परिकल्पना एवं क्रियान्वयन का नेतृत्व करने वाले डॉ. सुधांशु मणि ने कहा कि सामूहिक प्रयास ही किसी बड़े सपने को सफल बनाते हैं। एक प्रभावी टीम के लिए आपसी विश्वास, स्पष्ट संवाद, साझा जिम्मेदारी और काम के प्रति स्वामित्व की भावना जरूरी है। उन्होंने नेतृत्व को केवल पद या अधिकार तक सीमित न मानते हुए विनम्रता, संवेदनशीलता, मानवीय गरिमा और सहकर्मियों के प्रति सम्मान से जोड़कर देखा। उन्होंने शेक्सपियर के संदर्भों के माध्यम से छात्र-छात्राओं को अपनी क्षमताओं को पहचानने और उपलब्धि के अंतिम पड़ाव के साथ-साथ उसे हासिल करने की पूरी प्रक्रिया को महत्व देने के लिए प्रेरित किया।
‘5वां सीके प्रहलाद मेमोरियल लेक्चर‘ में आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के प्रो-चांसलर डॉ. दौलत सिंह चौहान ने अपने विचार रखते हुए व्याख्यान को नेतृत्व, नवाचार, टीमवर्क और मानवीय मूल्यों से जोड़ा। उन्होंने छात्र-छात्राओं को इन सिद्धांतों को अपने शैक्षणिक और व्यावसायिक जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने बताया कि जब मैं पहली बार वंदे भारत में बैठकर दिल्ली जा रहा था तब एक अफसर ने बताया था कि इससे पहले भी शताब्दी एक्सप्रेस 130 की स्पीड पर चलती थी। इसके बाद मैंने यह कहा था कि उसमें और इसमें क्या अंतर है। लेकिन कुछ साल बाद पता चला कि वंदे भारत में क्या खास है। आगामी आने वाले पांच साल में हिंदुस्तान में ट्रेन 300 की स्पीड में चलेगी। हालांकि हाल ही में 15 दिन पहले चाइना ने शायद 600 की स्पीड में ट्रेन चलाकर दिखाई है। इसके साथ ही उन्होंने नेतृत्व, नवाचार, टीमवर्क और मानवीय मूल्यों के बारे में जागरूक किया।
कार्यक्रम में एमबीए, डेटा साइंस, एग्री बिजनेस, हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट, बीबीए और बीई के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया तथा चर्चा में सक्रिय सहभागिता की।
वहीं अंत में आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के वाइस चांसलर प्रोफेसर डॉ. योगेश उपाध्याय ने आभार प्रदर्शन किय।