विश्व पोलियो दिवस: भारत की उपलब्धि, वैश्विक चुनौतियाँ और पोलियो-मुक्त विश्व की अधूरी लड़ाई
लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे, अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS)
विश्व पोलियो दिवस प्रत्येक वर्ष 24 अक्टूबर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य पोलियो के प्रति जागरूकता बढ़ाना, टीकाकरण को प्रोत्साहित करना और वैश्विक उन्मूलन के प्रयासों को गति देना है। भारत में जंगली पोलियोवायरस का अंतिम मामला जनवरी 2011 में दर्ज हुआ और मार्च 2014 में WHO के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र को पोलियो-मुक्त प्रमाणित किया गया। फिर भी, वैश्विक स्तर पर जंगली और वैक्सीन-व्युत्पन्न पोलियोवायरस की चुनौतियाँ बनी हुई हैं। यह लेख भारत की उपलब्धियों, वैश्विक स्थिति, निगरानी व्यवस्था और स्वास्थ्य समानता के प्रश्नों का विश्लेषण करता है।
मुख्य शब्द: विश्व पोलियो दिवस, पोलियो उन्मूलन, टीकाकरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वास्थ्य समानता।
1. पोलियो: बीमारी और उसका प्रभाव
पोलियोमाइलाइटिस एक संक्रामक बीमारी है, जो पोलियोवायरस से होती है। इसका प्रसार मुख्यतः मल-मुख मार्ग से होता है। अनेक संक्रमित व्यक्तियों में लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन कुछ मामलों में वायरस तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करके स्थायी पक्षाघात पैदा कर सकता है। इसलिए केवल रोगियों की पहचान पर्याप्त नहीं; टीकाकरण और प्रभावी निगरानी भी आवश्यक हैं।
2. भारत की ऐतिहासिक उपलब्धि
भारत में पल्स पोलियो अभियान, घर-घर टीकाकरण, स्वास्थ्यकर्मियों की भागीदारी और व्यापक जन-जागरूकता ने पोलियो उन्मूलन में निर्णायक भूमिका निभाई। 13 जनवरी 2011 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में जंगली पोलियोवायरस का अंतिम मामला दर्ज हुआ। इसके बाद 27 मार्च 2014 को WHO के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र को पोलियो-मुक्त प्रमाणित किया गया।
यह सफलता वैज्ञानिक प्रयासों, प्रशासनिक प्रतिबद्धता और सामुदायिक सहयोग का परिणाम थी। प्रवासी परिवारों, झुग्गी-बस्तियों और दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँच बनाना इस अभियान का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहा। हालांकि, क्षेत्रीय प्रमाणन का अर्थ पूरी दुनिया से पोलियो का उन्मूलन नहीं है।
3. वैश्विक चुनौतियाँ
1988 से विश्व स्तर पर पोलियो के मामलों में 99 प्रतिशत से अधिक कमी आई है। फिर भी, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में जंगली पोलियोवायरस का प्रसार चिंता का विषय है। इसके अतिरिक्त, कुछ क्षेत्रों में वैक्सीन-व्युत्पन्न पोलियोवायरस के संक्रमण भी सामने आते हैं।
मौखिक पोलियो वैक्सीन में कमजोर जीवित वायरस होता है। अत्यंत कम टीकाकरण वाले समुदायों में इसके लंबे समय तक प्रसार और आनुवंशिक परिवर्तन से दुर्लभ परिस्थितियों में वैक्सीन-व्युत्पन्न वायरस उत्पन्न हो सकता है। इसका समाधान टीकाकरण छोड़ना नहीं, बल्कि सामुदायिक प्रतिरक्षा मजबूत करना, निगरानी बढ़ाना और छूटे हुए बच्चों तक पहुँचना है।
भारत में पोलियो-मुक्त स्थिति बनाए रखने के लिए नियमित टीकाकरण, प्रयोगशाला जाँच और पर्यावरणीय निगरानी जारी रहनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय यात्रा और सीमापार आवाजाही के कारण सतर्कता आवश्यक है।
4. निगरानी और टीकाकरण का महत्त्व
पोलियो उन्मूलन के लिए बच्चों में तीव्र शिथिल पक्षाघात के मामलों की निगरानी, सीवेज के नमूनों की जाँच, प्रयोगशाला परीक्षण और वायरस के आनुवंशिक विश्लेषण की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इन उपायों से संक्रमण के संभावित संकेतों की पहचान कर समय पर कार्रवाई की जा सकती है।
नियमित टीकाकरण विशेष रूप से उन बच्चों तक पहुँचना चाहिए जो प्रवासी परिवारों, दूरस्थ बस्तियों या स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित समुदायों में रहते हैं। टीकाकरण संबंधी निर्णय राष्ट्रीय कार्यक्रम और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के निर्देशों के अनुसार किए जाने चाहिए।
5. स्वास्थ्य समानता और सामाजिक भागीदारी
पोलियो उन्मूलन केवल चिकित्सा विज्ञान का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय से भी जुड़ा है। गरीबी, सुरक्षित पानी की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच और गलत सूचनाएँ बच्चों के टीकाकरण में बाधा बन सकती हैं। इसलिए परिवारों को दोष देने के बजाय स्वास्थ्य व्यवस्था को सुलभ सेवाएँ, विश्वसनीय जानकारी और प्रभावी सामुदायिक संवाद सुनिश्चित करना चाहिए।
सामाजिक संस्थाएँ जागरूकता फैलाने, परिवारों को उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने और वैज्ञानिक जानकारी के प्रसार में सहयोग कर सकती हैं। गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS) के बाल-अधिकार, शिक्षा और सामुदायिक जागरूकता से जुड़े कार्यों के संदर्भ में यह सामाजिक सहभागिता का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है।
लेखक से संबंधित पूर्व प्रकाशित सामग्री में बाल-अधिकार और कोविड-19 टीकाकरण जागरूकता के प्रसंग मिलते हैं। हालांकि, उपलब्ध संदर्भों के आधार पर लेखक का कोई प्रत्यक्ष पोलियो-केंद्रित शोध लेख सत्यापित नहीं हुआ है।
6. प्रमुख नीतिगत प्राथमिकताएँ
पोलियो उन्मूलन की दिशा में निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:
- प्रत्येक पात्र बच्चे का नियमित टीकाकरण सुनिश्चित करना।
- छूटे हुए बच्चों और प्रवासी परिवारों तक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाना।
- रोग निगरानी, प्रयोगशाला क्षमता और पर्यावरणीय जाँच मजबूत करना।
- प्रभावित देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना।
- गलत सूचनाओं का जवाब वैज्ञानिक और संवेदनशील संवाद से देना।
- टीकाकरण की पहुँच और कार्यक्रमों के परिणामों का पारदर्शी मूल्यांकन करना।
7. निष्कर्ष
भारत की पोलियो-मुक्त उपलब्धि सार्वजनिक स्वास्थ्य के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण सफलता है। यह व्यापक टीकाकरण, वैज्ञानिक निगरानी, स्वास्थ्यकर्मियों के परिश्रम और सामुदायिक भागीदारी से संभव हुई। लेकिन वैश्विक स्तर पर पोलियो की चुनौती समाप्त नहीं हुई है।
पोलियो-मुक्त विश्व का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब प्रत्येक बच्चे को टीकाकरण, स्वास्थ्य सेवाओं और सही जानकारी तक समान पहुँच मिले। भारत की उपलब्धि को सुरक्षित रखना और दुनिया को पोलियो-मुक्त बनाना साझा वैज्ञानिक, सामाजिक और मानवीय जिम्मेदारी है।
संदर्भ सूची
1. World Health Organization (WHO), Poliomyelitis (Polio): Questions and Answers, 2025.
2. WHO, Statement of the Forty-fifth Meeting of the Polio IHR Emergency Committee, 25 August 2026.
3. WHO, Global Polio Surveillance Action Plan 2025–2026.
4. Press Information Bureau, Government of India, Eradication of Polio, 10 August 2018.
5. WHO India, A push to vaccinate every child, everywhere, ended polio in India, 7 April 2021.
6. Bahl, S. et al., Polio-Free Certification and Lessons Learned—South-East Asia Region, March 2014, MMWR, 2014.
लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे, अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS)।