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राष्ट्रीय एकात्मकता के संवाहक आदि शंकराचार्य: सुरेन्द्र शर्मा

(जयंती वैशाख शुक्ल पंचमी, 21अप्रैल  पर विशेष)                   
भारतीय दर्शन, आध्यात्म और सांस्कृतिक एकता के महान प्रतीक आदि शंकराचार्य जी का जन्म लगभग 8वीं शताब्दी में केरल के कालड़ी नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम आर्यम्बा था। बचपन से ही शंकराचार्य अत्यंत प्रतिभाशाली, जिज्ञासु और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। कहा जाता है कि उन्होंने अल्पायु में ही वेदों, उपनिषदों और अन्य शास्त्रों का गहन अध्ययन कर लिया था।
आदि शंकराचार्य का जीवन भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के पुनरुत्थान का महत्वपूर्ण काल माना जाता है। उस समय भारत में विभिन्न मत-मतांतरों का प्रसार था और वैदिक धर्म का प्रभाव कुछ हद तक कम हो रहा था। ऐसे समय में शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को पुनः स्थापित कर समाज को एक नई दिशा प्रदान की। अद्वैत वेदांत का मूल सिद्धांत है—“ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।” अर्थात् ब्रह्म ही सत्य है, यह संसार मिथ्या है और जीव स्वयं ब्रह्म का ही स्वरूप है। शंकराचार्य के अनुसार आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। यह विचार अत्यंत गूढ़ होते हुए भी मानव जीवन को सरल और सार्थक बनाने की दिशा में प्रेरित करता है।
आदि शंकराचार्य ने अपने जीवनकाल में भारत के विभिन्न भागों की यात्राएँ कीं, जिन्हें ‘दिग्विजय’ कहा जाता है। उन्होंने काशी, प्रयाग, बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी और श्रृंगेरी जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों पर जाकर शास्त्रार्थ किए और अपने अद्वैत दर्शन का प्रचार-प्रसार किया। इन यात्राओं के माध्यम से उन्होंने भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक एकता को सुदृढ़ किया। शंकराचार्य ने चार प्रमुख मठों की स्थापना की—उत्तर में ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ), दक्षिण में श्रृंगेरी मठ, पूर्व में गोवर्धन मठ (पुरी) और पश्चिम में शारदा मठ (द्वारका)। इन मठों के माध्यम से उन्होंने सनातन धर्म की शिक्षाओं को व्यवस्थित रूप से प्रचारित किया और शिष्यों के माध्यम से उसे आगे बढ़ाया। यह व्यवस्था आज भी भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
आदि शंकराचार्य केवल दार्शनिक ही नहीं, बल्कि महान लेखक और कवि भी थे। उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की, जिनमें उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र पर लिखी गई उनकी भाष्य अत्यंत प्रसिद्ध हैं। उनके द्वारा रचित ‘विवेकचूड़ामणि’, ‘भज गोविंदम्’, ‘सौन्दर्यलहरी’ और ‘निर्वाणषटकम्’ जैसे ग्रंथ आज भी लोगों को आध्यात्मिक मार्ग पर प्रेरित करते हैं। उनकी रचनाओं में गहन ज्ञान के साथ-साथ भक्ति और सरलता का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। आदि शंकराचार्य जी का जीवन अत्यंत अल्पकालीन था। माना जाता है कि उन्होंने मात्र 32 वर्ष की आयु में ही देह त्याग दिया, लेकिन इस छोटी सी आयु में उन्होंने जो कार्य किए, वे सदियों तक मानव समाज का मार्गदर्शन करते रहेंगे। उनका जीवन यह संदेश देता है कि दृढ़ संकल्प, ज्ञान और समर्पण के बल पर कोई भी व्यक्ति समाज में महान परिवर्तन ला सकता है। आदि शंकराचार्य ने न केवल दर्शन के क्षेत्र में योगदान दिया, बल्कि उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधविश्वासों को दूर करने का भी प्रयास किया। उन्होंने भक्ति, ज्ञान और कर्म के समन्वय पर बल दिया और लोगों को आत्मज्ञान की ओर प्रेरित किया। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उस समय थे। उनकी शिक्षाओं का प्रभाव आज भी भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। विभिन्न मठ, आश्रम और आध्यात्मिक संस्थाएँ उनके विचारों का प्रचार-प्रसार कर रही हैं। उनके द्वारा स्थापित अद्वैत वेदांत का सिद्धांत आज भी दर्शनशास्त्र के विद्यार्थियों और विद्वानों के लिए अध्ययन का प्रमुख विषय बना हुआ है। आदि शंकराचार्य भारतीय संस्कृति के ऐसे महान विभूति थे, जिन्होंने अपने ज्ञान, साधना और कर्म के माध्यम से न केवल धर्म का पुनरुत्थान किया, बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति को एकता, शांति और आत्मज्ञान का संदेश दिया।

देश की एकात्मता को मजबूत करने के लिए आदि शंकराचार्य जी ने देश के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की,भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा में “चार धाम” का विशेष स्थान है। इन चार धामों—बद्रीनाथ धाम, द्वारका धाम, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम।
यह चार धाम भारत की भौगोलिक एकता का प्रतीक हैं। उत्तर में हिमालय की गोद में स्थित बद्रीनाथ, पश्चिम में अरब सागर के तट पर द्वारका, पूर्व में बंगाल की खाड़ी के किनारे जगन्नाथ पुरी और दक्षिण में हिंद महासागर से घिरा रामेश्वरम—ये सभी स्थान भारत के चारों छोरों को दर्शाते हैं। जब श्रद्धालु इन धामों की यात्रा करते हैं, तो वे पूरे देश का भ्रमण करते हुए विभिन्न प्रदेशों, भाषाओं और संस्कृतियों से परिचित होते हैं। इससे लोगों में “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना विकसित होती है। यह चार धाम धार्मिक एकता को सुदृढ़ करते हैं। भारत में विभिन्न देवी-देवताओं और परंपराओं की पूजा होती है, लेकिन चार धाम यात्रा के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि सभी मार्ग अंततः एक ही परम सत्य की ओर ले जाते हैं। बद्रीनाथ में भगवान विष्णु की आराधना, द्वारका में श्रीकृष्ण की पूजा, पुरी में जगन्नाथ स्वरूप और रामेश्वरम में भगवान शिव की उपासना—ये सभी विविधताओं के बीच एकता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
यह चार धाम सांस्कृतिक आदान-प्रदान के केंद्र हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से लोग इन तीर्थों पर आते हैं, जिससे भाषा, खान-पान, वेशभूषा और परंपराओं का आदान-प्रदान होता है। उदाहरण के लिए, उत्तर भारत का व्यक्ति जब रामेश्वरम जाता है, तो वह दक्षिण भारत की संस्कृति को समझता है, वहीं दक्षिण भारत का श्रद्धालु जब बद्रीनाथ की यात्रा करता है, तो उसे उत्तर भारत की परंपराओं का अनुभव होता है। इस प्रकार चार धाम भारत की विविधता में एकता को सशक्त बनाते हैं।
यह चार धाम सामाजिक समरसता को बढ़ावा देते हैं। तीर्थयात्रा के दौरान सभी लोग जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र के भेदभाव को भुलाकर एक साथ यात्रा करते हैं। यह अनुभव समाज में समानता और भाईचारे की भावना को मजबूत करता है। तीर्थस्थलों पर सेवा, दान और सहयोग की परंपरा भी लोगों को परस्पर जोड़ती है। चार धाम राष्ट्रीय चेतना को जागृत करते हैं। जब लोग इन धामों की यात्रा करते हैं, तो उन्हें यह एहसास होता है कि वे एक विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र का हिस्सा हैं। यह अनुभव उनके मन में देश के प्रति सम्मान और गर्व की भावना को बढ़ाता है।
चार धाम केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि वे भारत की एकता और अखंडता के सशक्त प्रतीक हैं। उन्होंने सदियों से लोगों को जोड़ने, सांस्कृतिक समन्वय स्थापित करने और राष्ट्रीय भावना को प्रबल बनाने का कार्य किया है। इस प्रकार चार धाम भारत की एकात्मकता को बनाए रखने और उसे सुदृढ़ करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत सिद्धांत भारतीय दर्शन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण धारा है,  “अद्वैत” शब्द का अर्थ है—द्वैत का अभाव, यानी दो का न होना। सरल शब्दों में, अद्वैत सिद्धांत यह कहता है कि इस सृष्टि में केवल एक ही परम सत्य है—ब्रह्म, और वही सबमें व्याप्त है। अद्वैत वेदांत का मुख्य सूत्र है:“ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।”अर्थात
ब्रह्म ही सत्य है यह संसार (जगत) मिथ्या है (पूर्णतः असत्य नहीं, बल्कि परिवर्तनशील) ,जीव (व्यक्ति) और ब्रह्म अलग नहीं, बल्कि एक ही हैं ।अद्वैत के अनुसार ब्रह्म निराकार, निरगुण, अनंत और सर्वव्यापी है। वही सृष्टि का मूल कारण है और हर वस्तु, हर प्राणी में वही विद्यमान है। अद्वैत सिद्धांत कहता है कि हम (जीव) वास्तव में ब्रह्म ही हैं, लेकिन अज्ञान (अविद्या) के कारण हम अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान पाते।जैसे 
रस्सी को अंधेरे में साँप समझ लेना
वैसे ही हम ब्रह्म को न पहचानकर स्वयं को सीमित शरीर-मन मान लेते हैं। जगत “मिथ्या” का अर्थ यह नहीं कि संसार बिल्कुल झूठा है, बल्कि यह है कि यह अस्थायी और परिवर्तनशील है। जो बदलता है, वह स्थायी सत्य नहीं हो सकता
केवल ब्रह्म ही नित्य (सदा रहने वाला) है।अद्वैत वेदांत के अनुसार ज्ञान (ज्ञानयोग) ही मोक्ष का मुख्य साधन है। जब व्यक्ति यह जान लेता है कि “मैं ब्रह्म हूँ” (अहं ब्रह्मास्मि), तब उसका अज्ञान समाप्त हो जाता है और उसे मुक्ति (मोक्ष) प्राप्त होती है। जैसे समुद्र और लहर: लहर अलग दिखाई देती है, लेकिन वह समुद्र ही है,सोना और आभूषण: आभूषण अलग-अलग रूप में हैं, पर सब सोना ही है,इसी प्रकार हम सब अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में सब एक ही ब्रह्म के रूप हैं। अद्वैत सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि समस्त जगत एक ही परम तत्व का विस्तार है। यह दर्शन भेदभाव को मिटाकर एकता, शांति और आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करता है। जब मनुष्य अपने भीतर और बाहर एक ही ब्रह्म को देखता है, तब वह सच्चे अर्थों में मुक्त और शांत हो जाता है।
वर्तमान समय में अद्वैत सिद्धांत केवल एक दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, शांत और सार्थक बनाने का व्यावहारिक मार्ग भी है। आज की दुनिया, जो तनाव, प्रतिस्पर्धा,पहचान-आधारित विभाजन और भौतिकवाद से प्रभावित है, उसमें अद्वैत की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।
अद्वैत का मूल विचार है कि सबमें एक ही चेतना (ब्रह्म) है। जब व्यक्ति इस दृष्टि को अपनाता है, तो जाति, धर्म, भाषा और वर्ग के आधार पर भेदभाव कम होता है। आज के समय में बढ़ती सामाजिक और वैचारिक विभाजन की स्थितियों में यह सिद्धांत लोगों को जोड़ने और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को मजबूत करने में सहायक है।
आधुनिक जीवन में चिंता, अवसाद और असंतोष आम हो गए हैं। अद्वैत सिखाता है कि हमारी असली पहचान शरीर या बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना से है। इस समझ से व्यक्ति बाहरी उतार-चढ़ाव से कम प्रभावित होता है और उसे आत्मिक शांति मिलती है। ध्यान और आत्मचिंतन जैसे अभ्यास, जो अद्वैत से जुड़े हैं, आज मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत उपयोगी माने जा रहे हैं।आज का समाज अत्यधिक भौतिकवादी होता जा रहा है, जहाँ सफलता को धन और पद से मापा जाता है। अद्वैत यह सिखाता है कि बाहरी वस्तुएँ स्थायी सुख नहीं दे सकतीं, क्योंकि वे परिवर्तनशील हैं। इससे व्यक्ति संतुलित जीवन जीना सीखता है—जहाँ भौतिक प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिक विकास भी होता है। अद्वैत का सबसे बड़ा योगदान है—“स्वयं को जानो”। जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को समझता है, तो उसमें आत्मविश्वास, स्पष्टता और स्थिरता आती है। यह सिद्धांत आधुनिक व्यक्तित्व विकास और नेतृत्व के क्षेत्र में भी उपयोगी है, क्योंकि यह भीतर से मजबूत बनने पर बल देता है। अद्वैत के अनुसार प्रकृति और मानव अलग नहीं हैं। जब हम यह समझते हैं कि सब एक ही अस्तित्व का हिस्सा हैं, तो हम पर्यावरण के प्रति अधिक जिम्मेदार बनते हैं। आज के पर्यावरण संकट के समय में यह दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज पूरी दुनिया में योग, ध्यान और भारतीय दर्शन के प्रति रुचि बढ़ रही है। अद्वैत सिद्धांत, जो चेतना की एकता की बात करता है, आधुनिक विज्ञान—विशेषकर क्वांटम फिजिक्स—के कुछ विचारों से भी मेल खाता हुआ प्रतीत होता है। इससे यह सिद्धांत वैश्विक स्तर पर भी प्रासंगिक बनता है।
वर्तमान युग में अद्वैत सिद्धांत केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत शांति, सामाजिक समरसता और वैश्विक एकता का आधार बन सकता है। यह हमें सिखाता है कि भिन्नताओं के पीछे एक ही सत्य छिपा है। यदि इस दृष्टिकोण को व्यवहार में लाया जाए, तो यह न केवल व्यक्ति के जीवन को बेहतर बना सकता है, बल्कि समाज और विश्व को भी अधिक शांतिपूर्ण और संतुलित बना सकता है।

मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर तीर्थ से  आदि शंकराचार्य के जीवन से अत्यंत गहरा और ऐतिहासिक  संबंध है। यह स्थान केवल एक प्रमुख तीर्थ ही नहीं, बल्कि शंकराचार्य के आध्यात्मिक जीवन की दिशा तय करने वाला केंद्र भी माना जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ओंकारेश्वर वही पवित्र स्थल है जहाँ शंकराचार्य को उनके गुरु गोविन्द भगवत्पाद से दीक्षा प्राप्त हुई थी। कहा जाता है कि नर्मदा नदी के तट पर स्थित एक गुफा में गोविन्द भगवत्पाद तपस्या कर रहे थे। बालक शंकर, जो उस समय ज्ञान की खोज में संन्यास ले चुके थे, अपने गुरु की तलाश में यहाँ पहुँचे। यहीं उनका गुरु-शिष्य मिलन हुआ, जिसने भारतीय दर्शन के इतिहास को नई दिशा दी।
ओंकारेश्वर में शंकराचार्य ने अपने गुरु से अद्वैत वेदांत का गूढ़ ज्ञान प्राप्त किया। गुरु गोविन्द भगवत्पाद ने उन्हें न केवल आध्यात्मिक शिक्षा दी, बल्कि यह आदेश भी दिया कि वे पूरे भारत में वेदांत के अद्वैत सिद्धांत का प्रचार-प्रसार करें। इसी आदेश को स्वीकार कर शंकराचार्य ने अपनी प्रसिद्ध “दिग्विजय यात्राएँ” प्रारंभ कीं। ओंकारेश्वर का महत्व इस कारण भी बढ़ जाता है कि यह स्थान नर्मदा नदी के तट पर स्थित है, जिसे भारतीय परंपरा में अत्यंत पवित्र माना गया है। इस आध्यात्मिक वातावरण ने शंकराचार्य के चिंतन और साधना को और अधिक गहराई प्रदान की।
आज भी ओंकारेश्वर में वह गुफा दर्शनीय है, जहाँ शंकराचार्य ने अपने गुरु से शिक्षा प्राप्त की थी। इसे “गुरु गोविन्द भगवत्पाद की गुफा” के नाम से जाना जाता है, और यह स्थान श्रद्धालुओं व दर्शनार्थियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। यहाँ आने वाले लोग न केवल भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग के दर्शन करते हैं, बल्कि शंकराचार्य की स्मृतियों से भी जुड़ते हैं। ओंकारेश्वर शंकराचार्य के जीवन का वह निर्णायक स्थल है, जहाँ उन्हें गुरु प्राप्त हुए, ज्ञान की दिशा मिली और उनके महान कार्यों की नींव पड़ी। यदि शंकराचार्य भारतीय दर्शन के उज्ज्वल नक्षत्र हैं, तो ओंकारेश्वर उनकी उस ज्योति का प्रारंभिक केंद्र है, जिसने पूरे भारत को आलोकित किया।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अद्वैत सिद्धांत को केवल एक दार्शनिक अवधारणा के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे भारतीय जीवन-दृष्टि और सामाजिक व्यवस्था का आधार माना। उनके विचारों में अद्वैत का अर्थ था—समग्रता, एकात्मता और संतुलन, जिसे उन्होंने अपने प्रसिद्ध दर्शन “एकात्म मानववाद” में स्पष्ट किया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का “एकात्म मानववाद” अद्वैत सिद्धांत से गहराई से प्रभावित है। वे मानते थे कि—व्यक्ति, समाज, प्रकृति और परमात्मा अलग-अलग नहीं हैं ये सभी एक ही व्यापक अस्तित्व के अंग हैं यह विचार सीधे अद्वैत के उस सिद्धांत से जुड़ता है, जिसमें सभी में एक ही चेतना (ब्रह्म) की बात कही जाती है।
दीनदयाल उपाध्याय जी ने पश्चिमी विचारधाराओं—जैसे पूंजीवाद और समाजवाद—की आलोचना करते हुए कहा कि ये विचार द्वैत (विभाजन) पर आधारित हैं।
पूंजीवाद व्यक्ति को प्राथमिकता देता है,समाजवाद समाज को
लेकिन अद्वैत दृष्टि के अनुसार, व्यक्ति और समाज में कोई विरोध नहीं, बल्कि परस्पर पूरकता है। इसलिए उन्होंने एकात्म मानववाद के माध्यम से संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।अद्वैत से प्रेरित होकर उपाध्याय जी ने समरस समाज की कल्पना की, जहाँ—किसी प्रकार का भेदभाव न हो सभी वर्गों का संतुलित विकास हो व्यक्ति अपने कर्तव्यों और अधिकारों में संतुलन बनाए उनके अनुसार, जब हम सबमें एक ही आत्मा को देखते हैं, तो शोषण, अन्याय और असमानता की भावना स्वतः समाप्त हो जाती है। दीनदयाल उपाध्याय जी  ने राष्ट्र को भी एक जीवंत इकाई माना है उनका मानना था कि भारत केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक राष्ट्र है, जिसमें अद्वैत की भावना निहित है।विविधता के बावजूद एकता अलग-अलग परंपराएँ, लेकिन एक ही मूल चेतना
यह विचार भारतीय राष्ट्रवाद को अद्वैत दर्शन से जोड़ता है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के अनुसार “धर्म” का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और समरस बनाने वाला सिद्धांत है। यह भी अद्वैत की ही अभिव्यक्ति है, क्योंकि यह सबको एक सूत्र में बांधने का कार्य करता है।
दीनदयाल उपाध्याय जी ने अद्वैत सिद्धांत को व्यावहारिक जीवन, समाज और राष्ट्र निर्माण के साथ जोड़ा। उनके लिए अद्वैत केवल “आत्मा और ब्रह्म की एकता” तक सीमित नहीं था, बल्कि यह व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच संतुलित और समन्वित संबंध का आधार था।  उनका एकात्म मानववाद अद्वैत दर्शन का आधुनिक और व्यवहारिक रूप है, जो आज भी समाज और राष्ट्र के समग्र विकास के लिए प्रासंगिक माना जाता है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की ही प्रेरणा से मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की  सरकार ने आदि शंकराचार्य से जुड़े स्थानों, विशेषकर ओंकारेश्वर (जहाँ उन्होंने दीक्षा प्राप्त की थी), के विकास के लिए व्यापक पहल की है। सरकार ने इसे 'एकात्म धाम' के रूप में विकसित किया है,
स्टैच्यू ऑफ वननेस (Statue of Oneness): ओंकारेश्वर के मांधाता पर्वत पर आदि शंकराचार्य की 108 फीट ऊंची बहुधातु (अष्टधातु) प्रतिमा स्थापित की गई है। 21 सितंबर 2023 को इसका अनावरण किया गया, जो उनके 12 वर्षीय बाल स्वरूप को दर्शाती है।
ओंकारेश्वर में लगभग ₹2,100 करोड़ से अधिक की लागत से "एकात्म धाम ",का विकास किया जा रहा है। आदि शंकराचार्य के जीवन और दर्शन को समर्पित एक अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय (आचार्य शंकर संग्रहालय) और 'अद्वैत लोक' का निर्माण किया जा रहा है। अद्वैत दर्शन के अध्ययन और अनुसंधान के लिए 'आचार्य शंकर अंतर्राष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान' (Acharya Shankar International Institute of Advaita Vedanta) स्थापित किया जा रहा है।  36 हेक्टेयर क्षेत्र में एक 'अद्वैत वन' विकसित किया जा रहा है, जो ध्यान और पर्यावरणीय जागरूकता के लिए एक शांत वातावरण प्रदान करेगा। वर्ष 2017-18 आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास की स्थापना की गई, जो शंकराचार्य की शिक्षाओं का प्रसार करने और उनकी विरासत को सम्मानित करने वाली गतिविधियों का आयोजन करता है।
मध्यप्रदेश सरकार ओंकारेश्वर में आदि शंकराचार्य जयंती के अवसर पर भव्य 'एकात्म पर्व' का आयोजन भी प्रतिवर्ष करती है  है।
ओंकारेश्वर को उज्जैन, महेश्वर और मांडू जैसे धार्मिक शहरों के साथ जोड़कर एक प्रमुख पर्यटन सर्किट का हिस्सा बनाया गया है। जिससे देश भर के पर्यटक ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन  के साथ साथ आदि शंकराचार्य जी के सिद्धांतों से भी परिचित हो सकें।
आदि शंकराचार्य जी ने संपूर्ण मानवता को एक दिशा दी है जिस पर चलकर भौतिकता की अग्नि में दग्ध मानवता अपने मन की शांति को प्राप्त कर सकती है ,वह राष्ट्रीय एकात्मकता को सुदृढ़ करने वाले एक महान  युग ऋषि थे ।।
 सुरेन्द्र शर्मा 
प्रदेश उपाध्यक्ष 
भारतीय जनता पार्टी मध्यप्रदेश 

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