धरम पाजी, मानवता के ही-मैन
- राजकुमार जैन, स्वतंत्र लेखक
धर्मेंद्र, भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम पृष्ठों पर अंकित एक ऐसा नाम, जो न केवल परदे पर साहस का प्रतीक था, बल्कि जीवन की सादगी और संवेदनशीलता का जीवंत उदाहरण भी। 24 नवंबर 2025 को 89 वर्ष की आयु में इस नश्वर लोक को विदा कहने वाले धर्मेंद्र सिंह देओल – जिन्हें प्यार से हम `धरम पाजी' कहते हैं – का जाना फिल्मी दुनिया के एक युग का समापन है। वे रजतपट के एक अभिनेता मात्र नहीं थे; बल्कि वो एक सच्चे मानव भी थे, जिनके जीवन का ताना बाना संघर्ष, प्रेम, विनम्रता और परोपकार के धागों से बुना गया था।
धर्मेंद्र का जन्म 8 दिसंबर 1935 को पंजाब के नसराली गाँव में एक साधारण जाट परिवार में हुआ। पिता केवाल कृष्ण एक स्कूल अध्यापक थे, और माता सतवंत कौर ने घर की चारदीवारी में ममत्व की चांदनी बिखेरी। बचपन की गरीबी ने उन्हें जिंदगी से लोहा लेना सिखाया। लुधियाना के ललटन कलाँ में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद, फगवाड़ा के रामगढ़िया कॉलेज से इंटरमीडिएट पूरा किया। लेकिन सपनों की उड़ान ने उन्हें 1958 में मुंबई पहुंचा दिया। वहाँ प्रारंभिक असफलताओं का सामना करते हुए, वे एक ड्रिलिंग कंपनी में मजदूरी करने को विवश हुए। फिल्मफेयर टैलेंट हंट में द्वितीय स्थान मिला, तो मनोज कुमार जैसे मित्रों के सहयोग से मायानगरी में उनका सफर शुरू हुआ। यह संघर्ष मात्र पर्दे पर ही-मैन की छवि नहीं रचता, बल्कि एक साधारण मनुष्य की दृढ़ता को उजागर करता है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी आशा की किरण संजोए रखता है।
परिवार के प्रति उनका समर्पण उनकी मानवीयता का सर्वोच्च पहलू था। 19 वर्ष की युवावस्था में 1954 में प्रकाश कौर से विवाह बंधन में बंधे, जिनसे उन्हें दो पुत्र – सनी और बॉबी – तथा दो पुत्रियाँ विजेता और अजीता प्राप्त हुईं। बाद में, 1980 में अभिनेत्री हेमा मालिनी से दूसरा विवाह हुआ, जो विवादास्पद रहा, किंतु उन्होंने इसे प्रेम की विजय का प्रतीक बनाया। हेमा से ईशा और अहाना दो पुत्रियाँ हुईं, जो सिनेमा जगत में कार्यरत हैं। विवादों के बीच भी, पाजी ने परिवार को एकजुट रखा। पंजाबी मूल्यों पर आधारित अनुशासन सिखाया, बच्चों को सादा जीवन जीने की शिक्षा दी, और छोटी उम्र तक सिनेमा की चकाचौंध से दूर रखा। वे हेमा की शाकाहारी भोजन आदतों का सम्मान करते, और स्वयं मांसाहारी भोजन चुपके से ग्रहण करते। डिनर टेबल पर परिवारिक सहभोज और परिवार के लिए सादगीपूर्ण समर्पण उनके जीवन के आधार थे। 13 पौत्र-पौत्रियों वाले इस वृक्ष ने सिखाया कि प्रसिद्धि की चमक के बीच विनम्रता ही सच्ची संपदा है। प्रकाश कौर के निधन के बाद, उन्होंने परिवार को मां समान स्नेह दिया, जो उनकी उदार हृदयता का प्रमाण है।
धरम पाजी की मानवीयता उनके परोपकारी स्वभाव और व्यक्तिगत गुणों में झलकती है। उन्होंने कभी अंधविश्वासों को स्थान नहीं दिया, आर्य समाज के सिद्धांतों पर दृढ़ रहे। अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के बुते पर 2010 में शराब की लत से मुक्ति पाई। बीमार होने पर अस्पताल के बिस्तर पर मिर्ज़ा ग़ालिब से प्रेरित कविताएँ लिखीं, जो उनकी संवेदनशील आत्मा को दर्शाती हैं। उन्होंने किसानों की सहायता, शिक्षा के प्रचार और सामाजिक कल्याण के लिए अनेक प्रयास किए। सनी देओल के शब्दों में, "पापाजी की सकारात्मक ऊर्जा, अच्छे कार्यों से उपजती थी।" राजनीति में भी (2004-09 में बीकानेर से सांसद के रूप में) उन्होंने ग्रामीण मुद्दों को प्रमुखता से उठाया, यद्यपि राजनीतिक अपरिपक्वता के चलते आलोचनाएँ भी झेलीं। उनकी विनम्रता सह-कलाकारों द्वारा सराही गई – एक ऐसा पुरुष, जो मर्दाना छवि के पीछे भावुक हृदय छिपाए रखता था।
धर्मेंदर का जाना देश को शोकाकुल कर गया, किंतु उनकी विरासत अमर है। 'शोले', 'सीता और गीता' जैसी कृतियों से परे, वे हमें सिखाते हैं कि सच्ची शक्ति संघर्ष में निहित है। प्रेम में विस्तारित उनके जीवन से प्रेरणा लें – विनम्र रहें, परिवार को संजोएं, और मानवता का दर्पण बनें।
अलविदा, धरम पाजी। आपकी स्मृति हमारे दिलों में हमेशा प्रज्वलित रहेगी।