“हॉरर और कॉमेडी का मेल बहुत दिलचस्प होता है”: अक्षय कुमार




1. ‘भूत बंगला’ के वर्ल्ड टेलीविजन प्रीमियर की तैयारी के बीच, आपके हिसाब से किसी फैंटेसी फिल्म की कहानी में ऐसी वजह और सोच होना कितना जरूरी है, जिससे दर्शक खुद को जोड़ सकें?


अक्षय कुमार : मेरा मानना है कि हर चीज के पीछे कोई न कोई वजह होनी चाहिए, फिर चाहे वो फैंटेसी की दुनिया ही क्यों न हो। जब आप कोई कॉमिक बुक पढ़ते हैं, तो उसमें भी हर किरदार की ताकत के पीछे कोई वजह होती है। ये ताकतें आती कहाँ से हैं? कोई इंसान कैसे बदलता है और उसका रूप क्यों बदल जाता है? हर बदलाव के पीछे कोई वजह होती है। जब आप असाधारण किरदारों और काल्पनिक हालात की बात करते हैं, तब भी उनके पीछे की वजह बताना जरूरी है। इससे दर्शकों को आपकी बनाई हुई दुनिया को समझने और उससे जुड़ने में मदद मिलती है। 


2. ‘भूत बंगला’ के वर्ल्ड टेलीविजन प्रीमियर के मौके पर, आपके हिसाब से हॉरर कॉमेडी दर्शकों का इतना मनोरंजन क्यों करती है? और उन्हें फिल्म से क्या उम्मीद रखनी चाहिए?


अक्षय कुमार : मुझे लगता है कि हॉरर और कॉमेडी का मेल बहुत दिलचस्प होता है। जब आप कोई डरावना सीन देखते हैं, तो तनाव में रहते हैं और इंतजार करते हैं कि अब क्या होने वाला है। तभी अचानक कोई मजेदार पल आ जाता है और सारा तनाव खत्म हो जाता है। लोग हँसने लगते हैं। यही मेल इस तरह की फिल्मों को इतना मजेदार बनाता है। लेकिन, कॉमेडी हालात से अपने आप निकलनी चाहिए, उसे जबरदस्ती नहीं लाया जा सकता। ‘भूत बंगला’ के साथ भी यही कोशिश है कि दर्शकों को दोनों तरह के अनुभव मिलें। एक पल वो डरें और अगले ही पल हँसने लगें। अब जब फिल्म का प्रीमियर ज़ी सिनेमा पर हो रहा है, तो परिवार घर बैठे साथ में इस मस्ती और पागलपन का मजा ले सकते हैं। बस आराम से बैठिए, फिल्म का आनंद लीजिए और अगर किसी ऐसे पल में हँसी छूट जाए, जब आपने इसकी उम्मीद भी न की हो, तो हैरान मत होइए।


3. कॉमेडी अक्सर ऐसी परिस्थितियों से निकलती है, जिनकी कोई उम्मीद नहीं करता। किसी सीन को करते समय आपका अपना मजाकिया अंदाज़ इसमें कितना काम आता है?


अक्षय कुमार : मुझे लगता है कि कॉमेडी पूरी तरह सही समय पर सही बात कहने और आसपास की चीजों पर ध्यान देने पर निर्भर करती है। रोजमर्रा की ज़िंदगी में हमारे सामने ऐसी कई मजेदार परिस्थितियाँ आती हैं, लेकिन उस वक्त हमें एहसास भी नहीं होता कि उनमें कितनी कॉमेडी है। एक्टर के तौर पर हमें उन छोटी छोटी बातों को पर्दे पर लाने का मौका मिलता है। कई बार चेहरे का एक साधारण सा हावभाव या थोड़ी देर का ठहराव लंबे डायलॉग से भी ज्यादा हँसा सकता है। ‘भूत बंगला’ जैसी फिल्म में, जहाँ हालात इतने अनोखे हैं, वहाँ मजा इसी बात में है कि आप उन पर कितनी सहजता से प्रतिक्रिया देते हैं। किरदार के तौर पर आपको उस स्थिति को गंभीरता से लेना होता है, भले ही दर्शक उस पर हँस रहे हों। यही बात कॉमेडी को असरदार बनाती है।

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