ग्वालियर। जीवाजी विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान एवं लोकप्रशासन अध्ययनशाला में व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत शनिवार को पहला व्याख्यान आयोजित किया गया। इसमें प्रधानमंत्री शासकीय उत्कृष्ट महाविद्यालय, बैतूल के प्रो. धर्मेंद्र कुमार ने भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के दृष्टिकोण विषय पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को लंबे समय तक पश्चिमी दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया गया, जिसके कारण स्वदेशी ज्ञान परंपराओं को अपेक्षित महत्व नहीं मिल सका।
प्रो. धर्मेंद्र कुमार ने प्राचीन, औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक काल के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन की प्रवृत्तियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि विभिन्न दौर में राजकीय और शैक्षणिक स्तर पर पश्चिमी दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी गई। इसके परिणामस्वरूप भारतीय ज्ञान परंपराओं को कई बार अवैज्ञानिक, अंधविश्वासपूर्ण अथवा केवल सांस्कृतिक विषयों तक सीमित मानकर देखा गया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा व्यवस्था में उचित स्थान देकर उसका पुनर्स्थापन किया जा सकता है। इसके लिए स्वदेशी ज्ञान, परंपराओं और भारतीय बौद्धिक विरासत को समकालीन शिक्षा से जोड़ना आवश्यक है। व्याख्यान की अध्यक्षता प्रो. डी.के. सिंह ने की। अध्ययनशाला की विभागाध्यक्ष डॉ. स्वर्णा परमार ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर प्रो. एस.के. सिंह, प्रो. संजय सिंह, प्रो. रविरंजन, प्रो. विभा दूरवार सहित अन्य शिक्षक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।