वरिष्ठ नागरिक शब्द का मान रखना सीखे नई पीढी
अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस 01 अक्टूबर पर विशेष -
गिरीश कुमार पाल
लेखक,योगविद्, सामाजिक कार्यकर्ता
आज की पीढी हर दिन जीवन की एक नई परिभाषा गढ रही है, विकास की अत्यधिक तीव्र गति में वह हर दिन नई अविष्कार से परिचित हो रही है। गांवों का तेजी से होता शहरीकरण और घटते खेत खलिहान और प्राकृतिक संसाधन हमें नई चुनौतियों से रूबरू करा रहे हैं। एक पीढी जो अपनी मेहनत और परिश्रम से आज से आने वाले कल के सपनों का ताना बाना बुन रही है, वहीं नई पीढी भी अपनी तकनीकी योग्यता, बढते कौशल ज्ञान और नवाचारों से जीवन का सुगम और समृद्ध बनाने में लगी है। पहले बैंक में खाता खोलना और उसमें से जाकर पैसे निकालकर हाट बाजार में जाकर घर गृहस्थी का सामान जुटाना एक बडा काम था, किन्तु आज बैंकिंग के अनेक ऐप आपको घर बैठे पैसे का निकालना जमा करना और भुगतान आदि सीखा दिया है। आज का मोबाइल आपके हर वित्तीय समाधान के लिए सहज काम कर रहा है। आयकर भरना हो या किसी भी प्रकार की बचत योजना को शुरू करना सब कुछ मोबाइल पर है। पहले हाट बाजार से कच्चा सामान और किराना खरीदना एक बडा काम हुआ करता था, हमारी माता बहनों के जीवन का बहुत अधिक समय तो अचार बडी पापड बनाने में ही बीत जाया करता था, किन्तु नई पीढी और स्वीगी, जोमेटो जैसे ऐप से घर बैठे ही बना हुआ हर व्यंजन मंगवा सकती है। आधुनिक युग में आज जीवन शैली पूरी तरह से बदल गई है, ऐसे में हमारी नई पीढी पर पुरानी पीढी के प्रयास और उनके परिश्रम की कहानी बताने वाला कोई नहीं होने के कारण पिछली पीढी या वरिष्ठजनों के त्याग, परिश्रम ओर समर्पण का मूल्य नई पीढी के लिए कम हो गया है। आज हर हाथ में मोबाइल और हर कमरे में एलईडी है। सुख सुविधाएं बढ गई है, जीवन को स्वस्थ्य और सुगम बनाने के संसाधन भी बढ गए है, समाज के एक वर्ग विशेष में समृद्धि भी बढी है। ऐसे में वरिष्ठजनों के लिए भी सुख सुविधाएं और संसाधन भी बढे हैं, किन्तु तेजी से बढते इस आधुनिक युग में आज की पीढी और आने वाली पीढी के पास अपने घर परिवार और मौहल्लों में रहने वाले बुजुर्गजन के प्रति समय कम रह गया है। आज नई पीढी के लोग अपना ज्यादातर समय सुख सुविधाओं को जुटाने में ही गवां रहे हैं, परिवार के बच्चें अपने माता पिता से अपने दादा दादी या नाना नानी बुआ मौसा मौसा, मामा मामी आदि के लिए समय निकालते नहीं दिखाई देते।
एक समय था जब संयुक्त परिवार थे, और किसी भी त्यौहार के पहले रसोई मंे पूरा परिवार बैठकर मिठाई और पकवान खुद बनाता था, घर की सभी महिलाएं एक साथ आकर घण्टों तक गीत गाते हुए हंसी ठहाकों के बीच त्यौहारों की तैयारियां करती थीं। परिवार की बडी बुजुर्ग महिलाएं बहुओं को बातों बातों परिवार और कुल की रीति नीति परम्पराएं सीखाती थीं, केवल बातों और कहावतों से नहीं बल्कि बुुजुर्ग महिलाएं दादी नानी और बुआ मौसी नई बहुओं को काम कैसे किया जाता है, बच्चे कैसे पाले जाते हैं ये सब खुद करके दिखाती और सीखाती थीं। आपको याद होगा कैसे दादी या नानी परिवार में जन्मने वाले नवजात बच्चों की पैरों पर लेटाकर मालिश किया करती थीं। कैसे शाम ढलते ही सभी बच्चे दादी दादा के पास आकर लेट जाते थे और कहानियां सुनते थे। ऐसे हमारे बुजुर्ग नई पीढी के अबोध मन को शिक्षा, संस्कार और नैतिक गुणों को सीखाने वाली पाठशाला हुआ करते थे। परिवार के दादा जी या सबसे बडे ताउजी की बात को पूरा परिवार अक्षरशः पालन करता था, परिवार के बच्चों में कोई भेदभाव नहीं था, संसाधन और सुख सुविधाएं भले ही कम थी, किन्तु जिस परिवार में बुजुर्ग थे, वहां कोई कलह या पारिवारिक द्धेष या ईर्ष्या नहीं होती थी। सच कहे तो परिवार के वरिष्ठजन ही परिवार के निर्माता हुआ करते थे। किन्तु आज स्थिति बहुत ही विचित्र हो गई है।
आज परिवारों में वरिष्ठजन ही नहीं है, क्योंकि जो एकल परिवार है, वहां माता पिता और सिर्फ एक या अधिकतम दो बच्चे हैं। दादा दादी या नाना नानी साथ होने की तो कोई कल्पना ही नहीं हैं। आने वालो समय तो और भी ज्यादा चुनौतियों से भरता जा रहा है। एकल परिवार भी अब टूटने लगे है, नई पीढी करियर की अंधी दौड में दौड रही है, सम्पन्नता बढ रही है, किन्तु रिश्ते नाते और संबधों पर उपभोक्तावादी संस्कृति हावी हो रही है। अब लीव इन कल्चर का भी तेजी से चलन बढ रहा है, उससे भी घातक डिंक फैमिली कॉनसेप्ट जिसमें युवक युवती दोनों पैसा कमा रहे हैं, पर ना तो शादी कर रहे हैं ना संतान की उत्पति। इस आधुनिक माहौल में संयुक्त परिवार, कुटुम्ब, पारिवारिक रीति रिवाज, तीज त्यौहार और उत्सव सभी कुछ गायब हो रहे हैं, ओझल हो रहे हैं। आधुनिकता की इस दौड में सबसे बडा नुकसान या सबसे ज्यादा उपेक्षा के शिकार कोई हो रहा है, तो वह हैं हमारे वरिष्ठजन परिवार के बुजुर्ग। आज हर संबध वनडे सेलीब्रेशन बनकर रह गया है, मदर डे, फादर डे, फ्रेन्डशिप डे, और भी ना जाने क्या क्या हो रहा है। ऐसे में हमें आज चिंतन करने की आवश्यकता है।
जिस भारत में अपने माता पिता के एक शब्द के लिए बेटे राजपाट त्याग देते थे, जिस देश में पिता को काल से वापिस लाने के लिए कए दिव्यांग बालक भी अपने प्राणों की परवाह किए बिना चुनौति को स्वीकार करता है, जिस देश में एक बालक अपने पिता के आदेश पर पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियों से विहीन कर देता है, जिस देश में एक युवा अपने माता पिता को कांधे पर रखकर पूरे देश के धार्मिक स्थलों की यात्रा करवाने का संकल्प लेता है, उस देश में आज की नई पीढी अपने परिवार के बुजुर्गोें को वृद्धाश्रम में भेज रही है, आज पार्र्काें में बुजुर्ग बैठककर अपने युवावस्था के संघर्षों की कहानी साझा कर रहे हैं। अनेक परिवारों में वरिष्ठजनों के पास बैठकर उनके अनुभव और बातों को सुनने वाले भी कोई नहीं है। ऐसे में वरिष्ठ नागरिक दिवस पर हम सभी को आज चिंतन करने की आवश्यकता है, कि हम चाहे जितने भी साधन सम्पन्न हो जाएं अपने बुजुर्गों का हाथ और साथ कभी नहीं छोडेंगे। अपने बच्चों को भी शिक्षा संस्कार देंगे कि जीवन में सभी जरूरी कामों के से भी जुरूरी काम है, अपने परिवार की जडों से जुडे रहना, अपने बुजुर्गों के साथ समय बिताना और संवाद करना ताकि उन्हे कभी भी अकेलेपन का अनुभव ना हो। यदि हम ऐसा कर पाए तो निश्चित ही हम अपने संस्कार संस्कृति की रक्षा कर पाएंगे और अपने पूर्वजों की थाती को संभालने वाले सच्चे संवाहक कहलाएंगे।