पार्टियां और भीड़तंत्र


(माधव)

चैंबर के चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है, पत्ते फेंटने का काम भी तेज हो गया है, कौन सा पत्ता कहां पड़ेगा अभी यह साफ होने में 15 दिन और लगेंगे। पार्टियों का दौर शुरू हो गया, स्वरूप इस बार थोड़ा बदला हुआ है, मामला गर्म है और इस बार हाउस के बागी भी मैदान में हैं। कोई कीचड़ न उछाल दे इसलिए टेबल पार्टियां इस बार भजन कीर्तन और सामाजिक कार्यक्रमों के सहारे सात्विक हो चली हैं। डॉ प्रवीण अग्रवाल ने पकौड़ी चाय पार्टी पर भीड़ जुटाई तो वहीं डॉ राकेश अग्रवाल ने अग्रवाल समाज के कार्यक्रम में, व्हाइट हाउस ने मायरा में सुंदर कांड करवा कर दम दिखाया, मंगलवार 23 जून को क्रिएटिव हाउस अपनी भीड़ जुटाएगा, बुधवार 24 को डॉ प्रवीण अग्रवाल भी अपना नमक वोटर्स की नसों में उतार देंगे। कोई भी वोटर्स को नमक खिलाने में पीछे नहीं रहना चाहता, इस बार अभी तक नसों में दूसरे प्रकार के तरल मिलाने का अभी तक कोई सामूहिक प्रयास नहीं हुआ है। 

अब सवाल यह है कि इतनी भीड़ आती कहां से है, हर प्रत्याशी भीड़ और समर्थन देख कर अपनी जीत का गणित लगाए बैठा है। इसके लिए हमारे व्यापारी वोटर जिम्मेदार हैं, शहर के छंटे हुए व्यापारी चैंबर के मेंबर हैं, गूढ़ और रहस्यमयी। इनका मन टटोलना कुएं में बांस डाल कर कुछ निकालने जैसा है। गद्दी पर लेना देना साफ रखने वाले व्यापारी किसी के नमक का कर्ज भी बाकी नहीं रखते, तुरंत दूसरे प्रत्याशी का भी नमक अपनी रगों में उतार कर हिसाब बराबर कर देते हैं। मुट्ठी भर लोगों को छोड़ दें तो वही चेहरे सारे आयोजनों में कौमन हैं, अब जीत हार का हिसाब लगे कैसे। खा पी कर भी पत्ते नहीं खोलते न हिलते हैं फिर भी आयोजन होते हैं केवल इसलिए कि एक एक करके सभी तक पहुंचने में समय लगता है वहीं आयोजनों में प्रत्याशी को वोटर्स से गुफ्तगू को मौका मिल जाता है। 

व्यापारी खुल कर गले लगते हैं लेकिन दोनों साइड उसकी एक्टिंग बिल्कुल सेम टू सेम होती है। प्रत्याशी के हाथ जोड़ते ही उसके दोनों हाथों को अपनी हथेली के कब्जे में ले लेना और फिर धीरे से दबा कर यह अहसास दिलाना कि मैं तो आप ही के साथ हूं। जहां प्रत्याशी वोटर को हाथ दबा कर  गौर से देखा तो यह भाव और तरीका दोनों विपरीत प्रत्याशियों के लिए बिलकुल एक जैसा होता है, एक रत्ती का फर्क नहीं। आम नेता ऐसी एक्टिंग लोगों का हाथ दबा कर करते हैं लेकिन चैंबर चुनाव में वोटर ज्यादा अच्छे एक्टर होते हैं। कई प्रत्याशी तो खींच कर वोटर को गले लगा लेते हैं, मुन्ना भाई का जादू की झप्पी वाला फार्मूला भी यहां काम नहीं करता, एक सी धड़कन एक सा गले लगाने का तरीका, हिसाब लगे तो लगे कैसे। आम दिनों  में झप्पी सामान्य होती है लेकिन इन दोनों जकड़ ऐसी हो जाती है जैसे कुंभ के मेले में खोये दो भाई मिले हैं। 

फिल्म चल रही होती है सभी अपनी अपनी एक्टिंग कर रहे होते हैं लेकिन गेट के आस पास आपको दिखेंगे कुछ अकेले खड़े बाउंसर। इनको काँटा डाल कर मछली पकड़ने के लिए खड़ा किया जाता है, यह प्रत्याशियों के बेहद खास लोग ही होते हैं, इनका काम होता है फिसलती मछलियों पर निगाह रखना और उन्हें प्रत्याशी के मन की खुराक देना। कुछ अय्यार किस्म के भी लोग घूम रहे होते हैं, जो विरोधियों की पार्टी में जान बूझ कर जाते हैं। इनका काम केवल इतना होता है कि वह अपने खास बन रहे लोगों पर निगाह रखें कि कोई विरोधी पार्टी से ज्यादा ही तो नहीं चिपका जा रहा, साथ ही यह उन चेहरों को भी टटोलते हैं जिन पर कल से ज्यादा मेहनत करके उन्हें विरोधी खेमे से अलग किया जाता है। छोटे छोटे झुंडों में खुसुर फुसुर करते लोग सिर्फ दावत खाने नहीं आते यह आते हैं अपनी मन की खुमारी उतारने। कई तो इंतजार करते हैं कि पिछले सालों में प्रत्याशी से कोई गलती हुई हो तो फटाफट किसी समर्थक से फुसफुसा दी जाए जिससे मनावड़े और माफीनामा हो जाए। पूजा पाठ पर ऐसे माहौल में लोगों का ध्यान कम ही दिखता है। इनके बीच घूमते हैं कुछ पत्रकार भी जो हमेशा कुछ चटपटा ढूंढते हैं कुछ ऐसा जो अखबार और खबरों में फटाफट बिक जाए। प्रत्याशी भी इन्हें मसाला देने से नहीं चूकते, क्योंकि पत्रकारिता का हिसाब साफ है, खबर दो या पैकेज कुछ तो चाहिए। वरना गिलास तो सभी का आधा खाली है, आधा भरा है।


posted by Admin
92

Advertisement

sandhyadesh
sandhyadesh
sandhyadesh
sandhyadesh
Get In Touch

Padav, Dafrin Sarai, Gwalior (M.P.)

98930-23728

sandhyadesh@gmail.com

Follow Us

© Sandhyadesh. All Rights Reserved. Developed by Anuj Mathur

<1-------Google-aNALY-------->