गुरु नानक देव जी के विचारों एवं जीवन पर आधारित विचार गोष्ठी में वक्ता के रूप में शामिल हुए: डाॅ. सच्चिदानन्द जोशी
(सदस्य सचिव, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘भारतीय भक्ति काव्य परम्परा‘ के तहत श्री गुरु नानक देव जी को समर्पित विचार गोष्ठी का आगाज ‘गगन में थाल‘ गायन के साथ हुआ
- ‘गगन में थाल रवि चंद दीपक बने, तारिका मंडल जनक मोती...ः प्रोफेसर निवेदिता सिंह
- जब लग दुनिया रहिए नानक किछु सुनिए किछु कहिएःप्रोफेसर निवेदिता सिंह
- गुरु नानक देव जी का दर्शन केवल धार्मिक विचार नहीं, बल्कि यह मानवता को जोड़ने और समाज को बेहतर बनाने का मार्ग भी हैः डाॅ. सच्चिदानन्द जोशी
-सच्चे गुरु वही होते हैं जो मानवता, समाजसेवा और शांति के मार्ग पर चलकर देश में एकता और सद्भाव बनाए रखते हैं, ऐसे ही महान गुरु थे गुरु नानक देव जीः वाइस चांसलर प्रोफेसर डाॅ. योगेश उपाध्याय
ग्वालियर । आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में गुरु तेग बहादुर साहिब जी की शहादत का 350वां जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में दो दिवसीय वार्षिक विमर्श श्रृंखला ‘भारतीय भक्ति काव्य परम्परा‘ के तहत श्री गुरु नानक देव जी को समर्पित विचार गोष्ठी का आगाज संस्थान के तुरारी परिसर स्थित उस्ताद अलाउद्दीन खान सभागार में ‘गगन में थाल‘ (मंगलाचरण) गायन के साथ हुआ। इस गोष्ठी में ‘गुरु नानक वाणी की सांगीतिक संरचना‘, ‘गुरु नानक देव जी के दर्शन में मानव सेवा की अवधारणा‘ विषयों पर व्याख्यान हुए। इस अवसर पर गायक और वक्ता के रूप में प्रोफेसर निवोदिता सिंह, वक्ता डाॅ. सच्च्दिानन्द जोशी शामिल हुए। वहीं वादन सुरदीप सिंह द्वारा किया गया। इस अवसर पर आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के फाउंडर चांसलर श्री रमाशंकर सिंह, प्रो-चांसलर डाॅ. दौलत सिंह चैहान, वाइस चांसलर प्रोफेसर योगेश उपाध्याय, डीन अकेडमिक डाॅ. रंजीत सिंह तोमर, डीन एसओईटी डाॅ. मुकेश पांडे, डीएसडब्ल्यू तृप्ति पाठक, आईटीएम ग्वालियर की डायरेक्टर डाॅ. मीनाक्षी मजूमदार, डाॅ. मिनी अनिल, डाॅ. शोभा भारद्वाज, डाॅ. वंदना भारती सहित, विभिन्न विभागों के विभागध्यक्ष, डीन, प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर, देशभर से आए व्याख्याता, कला समीक्षक, मृदा मूर्तिकार, चित्रकार, रंगकर्मी कलाकार, गुरुद्वारा कमेटी फूलबाग, गुरुद्वारा दाताबन्दी छोड़ के पदाधिकारी, सिख संगत, सिख समुदाय के लोग और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। वहीं कार्यक्रम का संचालन संजय जोथे द्वारा किया गया।
‘गगन में थाल रवि चंद दीपक बने, तारिका मंडल जनक मोती...ः प्रोफेसर निवेदिता सिंह
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘भारतीय भक्ति काव्य परम्परा‘ के अंतर्गत संस्थान के तुरारी परिसर में एलडीवी ब्लाॅक स्थित उस्ताद अलाउद्दीन खान सभागार में आयोजित विचार गोष्ठी का आगाज मंगलाचरण गायन गुरु नानक देव जी द्वारा रचित प्रसिद्ध आरती ‘गगन में थाल‘ के साथ हुआ। जहां प्रोफेसर निवेदिता सिंह (पंजाब यूनिवर्सिटी, पंजाब) ने अपनी मधुर वाणी से गायन और सुरदीप सिंह ने कर्णप्रिय वादन कर मंगलाचरण की मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रस्तुति से पूरे सभागार को आध्यात्मिक वातावरण से परिपूर्ण कर दिया।
संगीत की इस प्रस्तुति ने उपस्थित लोगों को गुरु नानक देव जी की आध्यात्मिक भावना और प्रकृति के प्रति उनके दृष्किोण से परिचित कराया। ‘गगन में थाल‘ आरती में आकाश को थाल, सूर्य और चंद्रमा को दीपक तथा तारों को मोतियों के रूप में वर्णित किया गया है, जो प्रकृति और ईश्वर के बीच गहरे संबंध को दर्शाता है। उन्होंने धनासरी राग में आरती का गयान किया। जिसके बोले थेः-
‘गगन में थाल रवि चंद दीपक बने,
तारिका मंडल जनक मोती...।
धूप मलआनलो पवन चवरो करे,
सगल बनराइ फूलंत जोती...।
कैसी आरती होइ, भव खंडना तेरी आरती।
अनहता सबद वाजंत भेरी...।
प्रोफेसर निवेदिता सिंह ने इस आरती के अर्थ और भाव को विस्तार से समझाते बताया कि गुरु नानक देव जी ने इस रचना के माध्यम से यह संदेश दिया कि संपूर्ण प्रकृति ही ईश्वर की आरती कर रही है। उन्होंने कहा कि यह आरती केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति आभार और सम्मान का प्रतीक है। गुरु नानक देव ने इस आरती की रचना उड़ीसा स्थित भगवान जगन्नाथ के प्रसिद्ध मंदिर में की थी।
जब लग दुनिया रहिए नानक किछु सुनिए किछु कहिएःप्रोफेसर निवेदिता सिंह
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘भारतीय भक्ति काव्य परम्परा‘ के अंतर्गत गुरु नानक देव जी के विचारों एवं जीवन पर आधारित विचार गोष्ठी में वक्ता प्रोफेसर निवेदिता सिंह (पंजाब यूनिवर्सिटी, पंजाब) ने ‘गुरु नानक वाणी की सांगीतिक संरचना‘ विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में विचार, सोच, चिंतन महकती है। ऐसे आयोजनों का उद्देश्य युवाओं के संपूर्ण विकास के लिए होता है। उन्होंने गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं और संगीत के माध्यम से उनके सामाजिक संदेश को विस्तार से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि गुरु नानक देव जी ने संगीत को केवल कला के रूप में नहीं बल्कि संवाद और संचार के सशक्त माध्यम के रूप में प्रयोग किया। उन्होंने कहा कि गुरु नानक देव जी ने लगभग 27,000 मील की यात्राएं कीं और विभिन्न संस्कृतियों तथा समुदायों के लोगों के साथ संवाद स्थापित किया। उन्होंने कहा कि गुरु नानक देव जी का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत था “पहले सुनो, फिर बोलो।” उन्होंने उनके इस वाक्य को दोहराया कि ‘‘सास-सास सिमरो गोबिंद, मन अंतर की उतरे चिंत। सास-सास हरि नाम धिआईए, नानक यह सचु कमाईए। जब लग दुनिया रहिए नानक किछु सुनिए किछु कहिए।’ इस सिद्धांत के माध्यम से उन्होंने समाज में संवाद और समझ की परंपरा को मजबूत किया। उन्होंने यह भी बताया कि गुरु नानक देव जी के साथ उनके साथी भाई मरदाना रबाब वाद्य बजाते थे और वे उनके प्रथम शिष्य भी थे। गुरु नानक की वाणी का प्रसार संगीत और कीर्तन के माध्यम से ही हुआ। उन्होंने कहा कि गुरु नानक देव जी ने संगीत को मंदिरों की सीमाओं से बाहर निकालकर समाज के बीच पहुंचाया। उन्होंने लोकसंगीत और शास्त्रीय संगीत दोनों का अध्ययन किया और अपनी वाणी की रचना की। उन्होंने इन दोनों का समन्वय किया। उनके लिए लोक संगीत छोटा नहीं था बल्कि शास्त्रीय संगीत का उद्देश्य भी लोक तक पहुँचना है और लोक से ऊर्जा ग्रहण करते रहना है। उन्होंने कहा कि लोकसंगीत समाज के साथ गहराई से जुड़ा हुआ होता है और कई बार वह शास्त्रीय संगीत से भी अधिक प्रभावशाली सिद्ध होता है। उनके अनुसार राग और धुनों के बीच गहरे संबंध को समझने के लिए संगीतविदों को और अधिक शोध करने की आवश्यकता है। उन्होंने राग आशा, राग तेलंग, राग ध्यान, राग गौरी के बारे में विस्तार से बताया। प्रोफेसर निवेदिता सिंह ने गुरु गोविंद सिंह जी की चार उदासियों के बारे में भी विस्तार से बताया।
गुरु नानक देव जी का दर्शन केवल धार्मिक विचार नहीं, बल्कि यह मानवता को जोड़ने और समाज को बेहतर बनाने का मार्ग भी हैः डाॅ. सच्चिदानन्द जोशी
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘भारतीय भक्ति काव्य परम्परा‘ के अंतर्गत केंद्र दिल्ली) ने ‘गुरु नानक देव जी के दर्शन में मानव-सेवा की अवधारणा‘ विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि एक समय भारत में विभिन्न समाजों और समुदायों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई थी, जहां लोग एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो रहे थे। ऐसे समय में भारत की कल्याण परंपरा और भक्ति आंदोलन ने समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया और यही कारण है कि भारतीय संस्कृति आज भी जीवित और प्रासंगिक बनी हुई है। उन्होंने कहा कि आज के समय में मनुष्य वास्तविक जीवन से अधिक “रील लाइफ” में जीने लगा है। इस कारण मनुष्यों के बीच वास्तविक संबंध और संवाद कमजोर होते जा रहे हैं। जबकि हमारे युग पुरुषों ने हमेशा यह सिखाया कि मनुष्य को मनुष्य से जुड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि मानव का मानव से प्रेम करना स्वाभाविक है और इसमें कोई बुराई नहीं है, क्योंकि यही भाव समाज को आगे बढ़ाता है। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी ही भारत का भविष्य है, इसलिए उन्हें गुरु नानक देव जी के विचारों से प्रेरणा लेकर समाज के लिए सकारात्मक कार्य करने चाहिए। उन्होंने कहा कि आज गुरु तत्व, ईश्वर तत्व, देव तत्व, मानव तत्व को समझना जरूरी है। हमारी संस्कृति में पैर छूने का आशय था कि मैं अपने अहंकार को आपके चरणों में रखता हूं। लेकिन एआई के समय में हमारे जीवन से संवाद खत्म सा होता जा रहा है। हम मानवता से दूर होते जा रहे हैं और धीरे-धीरे मशीन में परिवर्तित होते जा रहे हैं। हमें अपनी सफलता में गर्व होना चाहिए न कि अहंकार। उन्होंने युवाओं को सफलता के लिए चार ‘सी‘ का सूत्र दियाः- जिसमें 1. कमिटमेंट (समर्पण), 2. क्रियेटिविटी (सृजनशीलता), 3. कंटेंटमेंट (संतोष) और 4. कंपेशन (करुणा) है। उन्होंने कहा कि मशीनों का उपयोग क्रियेटिविटी के लिए करें, उनका गुलाम नहीं बनें। उन्होंने कहा कि गुरु नानक देव जी का दर्शन केवल धार्मिक विचार नहीं, बल्कि यह मानवता को जोड़ने और समाज को बेहतर बनाने का मार्ग भी है।
वक्ताओं ने दिए छात्र-छात्राओं के सवालों के जवाब
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘भारतीय भक्ति काव्य परम्परा‘ के अंतर्गत संस्थान के तुरारी परिसर में एलडीवी ब्लाॅक स्थित उस्ताद अलाउद्दीन खान सभागार में आयोजित विचार गोष्ठी के अवसर पर सवाल-जवाब सत्र का भी आयोजन किया गया। जहां उपस्थित वक्ताओं ने छात्र-छात्राओं के सवालों के जवाब दिए। जिसमें
प्रश्नः गुरु नानक जी ने किसी व्यक्ति को अंतिम गुरु बनाने के बजाय गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु का स्थान क्यों दिया।
उत्तर (प्रो. निवेदिता सिंह)ः उन्होंने बताया कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने “गुरु मान्यो ग्रंथ” की परंपरा स्थापित की। इसके पीछे सामाजिक और ऐतिहासिक कारण रहे होंगे। उन्होंने कहा कि गुरु को किसी एक व्यक्ति में नहीं बल्कि उनके विचारों और वाणी में खोजा जाना चाहिए। साथ ही यह भी संभव है कि गुरु नानक देव जी को स्वयं यह अनुमान नहीं रहा होगा कि आगे चलकर उन्हें गुरु के रूप में इतनी व्यापक मान्यता मिलेगी।
प्रश्न 2ः अधिकांश धर्मों ने धन और शक्ति के माध्यम से अपना प्रचार किया, ऐसे में सिख धर्म किस प्रकार अलग है।
उत्तर (डॉ. सच्चिदानंद जोशी)ः जहाँ धर्म में आडंबर बढ़ जाता है, वहाँ वह अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगता है। सिख धर्म की विशेषता यह है कि इसकी नींव किसी एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि विचारों पर आधारित है। इसमें विभिन्न संतों और गुरुओं की वाणी शामिल है। उन्होंने कहा कि जिस धर्म में सेवा और आदर की भावना होती है, वह अपने आप लोगों के जीवन में स्थान बना लेता है।
प्रश्नः गुरु नानक जी के विचार आज के समय में बढ़ती हिंसा और युद्ध की स्थितियों से बाहर निकलने में किस प्रकार सहायक हो सकते हैं।
उत्तर (प्रो. निवेदिता सिंह) हिंसा और संघर्ष की परिस्थितियों से बाहर निकलने का मार्ग हमारे मूल गुणों और मूल्यों में ही निहित है। गुरु परंपरा में “शब्द गुरु” की अवधारणा इसी उद्देश्य से स्थापित की गई थी, जिससे मनुष्य को सही दिशा और समाधान मिल सके।
प्रश्न 4ः आज की नई पीढ़ी नास्तिक क्यों होती जा रही है? क्या धर्म आस्था सिखाने में असफल हो रहा है।
उत्तर (डॉ. सच्चिदानंद जोशी)ः संभव है कि लोगों को धर्म का सही अर्थ समझाया ही नहीं गया। भारतीय परंपरा में धर्म का अर्थ केवल “रिलिजन” नहीं है, बल्कि वह है जिसे हम अपने जीवन में धारण करते हैं। जब धर्म को सही रूप में समझा जाएगा, तभी आस्था और मूल्यों की समझ भी विकसित होगी।
सच्चे गुरु वही होते हैं जो मानवता, समाजसेवा और शांति के मार्ग पर चलकर देश में एकता और सद्भाव बनाए रखते हैं, ऐसे ही महान गुरु थे गुरु नानक देव जीः वाइस चांसलर प्रोफेसर डाॅ. योगेश उपाध्याय
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में ‘भारतीय भक्ति काव्य परम्परा‘ के अंतर्गत गुरु नानक देव जी के विचारों एवं जीवन पर आधारित विचार गोष्ठी में वाइस चांसलर प्रोफेसर डाॅ. योगेश उपाध्या ने सभी अतिथियों का आभार प्रदर्शन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि शिक्षा के साथ-साथ छात्र-छात्राओं का सर्वांगीण विकास होना चाहिए। भारतीय संस्कृति तथा भारतीय काव्य परम्परा को निकट से समझने और जानने के उद्देश्य से ऐसे आयोजन आईटीएम यूनिवर्सिटी, ग्वालियर द्वारा समय-समय पर आयोजित किए जाते हैं। उन्होंने ‘गुरु’ पद के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हम तो केवल सांसारिक ज्ञान देने वाले लोग हैं, जबकि सच्चे गुरु वही होते हैं जो मानवता, समाजसेवा और शांति के मार्ग पर चलकर देश में एकता और सद्भाव बनाए रखते हैं। ऐसे ही महान गुरु थे गुरु नानक देव जी। उन्होंने आगे कहा कि अध्यात्म वह परंपरा है, जो मनुष्य को जीवन भर ही नहीं बल्कि अनंत काल तक मार्गदर्शन देती है।