आईटीएम यूनिवर्स ग्वालियर में हुआ स्वर साधना ‘शास्त्रीय संगीत की विशेष प्रस्तुति‘ का आयोजन
- भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग केवल सुरों का संयोजन नहीं, बल्कि भावनाओं, परंपराओं और जीवन के अनुभवों की अभिव्यक्ति भी हैः प्रख्यात शास्त्रीय संगीतज्ञ पंडित अमरेन्द्र धनेश्वर
- गोकुल गांव का छोरा, बरसाने की नार..: पंडित अमरेंद्र धनेश्वर
- सुन मेरे वंधु रे, सुनो मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे...
- जो भजे हरि को सदा, सोहि परम पद पावेगा...
ग्वालियर । आईटीएम यूनिवर्स ग्वालियर में स्वर साधना ‘शास्त्रीय संगीत की विशेष प्रस्तुति‘ का आयोजन किया गया। संस्थान के सिथौली परिसर में विक्रम साराभाई ब्लाॅक स्थित डाॅ. राममनोहर लोहिया सभागार में आयोजित इस शास्त्रीय संगीत की सभा में प्रख्यात शास्त्रीय संगीतज्ञ पंडित अमरेन्द्र धनेश्वर‘ ने विशेष प्रस्तुति दी। इस अवसर पर आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के प्रो-चांसलर डाॅ. दौलत सिंह चौहान, आईटीएम ग्वालियर की डायरेक्टर डाॅ. मीनाक्षी मजूमदार, डीन अकेडमिक्स डाॅ. एसएस चौहान, डीन रिसर्च डाॅ. दीपेश भारद्वाज, डीन आईक्यूएसी डाॅ. राजीव सिंह राठौर, डीन एडमिनिस्ट्रेशन डाॅ. प्रशांत श्रीवास्तव, डीएसडब्ल्यू नितिन दीक्षित, प्राॅक्टर डाॅ. ऋषि सोनी, एसोसिएट डीअकेडमिक्स डाॅ. प्रीति सिंह, डाॅ. मनोज मिश्रा, अमित जैन सहित विभिन्न विभागों के डीन, प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं व कल रसिक मौजूद रहे। वहीं संचानल अभिषेक सिंह राजावत द्वारा किया गया।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग केवल सुरों का संयोजन नहीं, बल्कि भावनाओं, परंपराओं और जीवन के अनुभवों की अभिव्यक्ति भी हैः प्रख्यात शास्त्रीय संगीतज्ञ पंडित अमरेन्द्र धनेश्वर
आईटीएम यूनिवर्स ग्वालियर में आयोजत स्वर साधना ‘शास्त्रीय संगीत की विशेष प्रस्तुति‘ का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया। शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति से पहले प्रख्यात शास्त्रीय संगीतज्ञ पंडित अमरेन्द्र धनेश्वर ने छात्र-छात्राओं और युवा कल रसिकों को भारतीय शास्त्रीय संगीत व उनके रागों के महत्व के बारे में बताते हुए कहा कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग केवल सुरों का संयोजन नहीं, बल्कि भावनाओं, परंपराओं और जीवन के अनुभवों की अभिव्यक्ति भी है। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तानी संगीत परंपरा में अलग-अलग रागों का विशिष्ट समय निर्धारित है। हालांकि, सुरों के प्रभाव और उनकी शक्ति को किसी भी समय अनुभव किया जा सकता है। उन्होंने संगीत से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से समझाया कि रागों की अनुभूति केवल नियमों तक सीमित नहीं, बल्कि कलाकार और श्रोता के भावनात्मक जुड़ाव से भी गहराई प्राप्त करती है। उन्होंने सितार वादक उस्ताद अब्दुल हलीम और उस्ताद बिस्मिल्लाह खां से जुड़े एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए रागों के समय संबंधी दृष्टिकोण को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया।
प्रख्यात शास्त्रीय संगीतज्ञ पंडित अमरेन्द्र धनेश्वर ने रागों की तुलना विशाल महलों से करते हुए कहा कि प्रत्येक राग में अभिव्यक्ति की असीम संभावनाएं होती हैं। कलाकार उसमें अलग-अलग भावों और सुरों के माध्यम से प्रवेश कर सकता है। उन्होंने राग मुल्तानी की प्रस्तुति के दौरान उसकी उत्पत्ति और परंपरा से जुड़े संदर्भ साझा किए। इसके बाद आलाप और बड़े ख्याल के माध्यम से राग की गंभीरता और विस्तार को सामने रखा। बंदिश के बोलों के सहारे राग का विस्तार, ताल के साथ उसका संयोजन और सुरों के उतार-चढ़ाव ने प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाया।
गोकुल गांव का छोरा, बरसाने की नार...ः पंडित अमरेंद्र धनेश्वर
आईटीएम यूनिवर्स ग्वालियर में आयोजत स्वर साधना ‘शास्त्रीय संगीत की विशेष प्रस्तुति‘ के अवसर पर प्रख्यात शास्त्रीय संगीतज्ञ पंडित अमरेन्द्र धनेश्वर ने संगीत सभा की शुरूआत राग मुलतानी के साथ थी। इसके बाद उन्होंने आलाप, बड़ा ख्याल, टप्पा, राग तिलंग, दादरा, राग भैरबी में भजनों की मनमोहन प्रस्तुति दी।
उन्होंने राग मुलतानी में आलाप और बड़े ख्याल की रचना पेश की। जिसके बोल थेः- ‘गोकुल गांव का छोरा, बरसाने की नार....।
इसके बाद उन्हों द्रुत रचना पेश की। जिसके बोल थेः- ‘सुंदर सुरजन व साईं रे, मन भाई रे...। निसदिन तुम्हरो ध्यान धरत हूं, आन मिले रव साईं रे...।
सुन मेरे वंधु रे, सुनो मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे...
इसके बाद उन्होंने सचिनदेव वर्मन द्वारा रचित गीत गाने की प्रस्तुति दी। जिसके बोले थेः- ‘सुन मेरे वंधु रे, सुनो मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे...। होता तु पीपल मैं होती अमर लता तेरी...। जिया कहे तू सागर मैंे होती तेरी नदिया...। लहर बहर कर अपनी पिया संग जाती रे...।
इसके बाद उन्होंने राग तिलंग की बंदिश, जिसके बोले थेः- ‘सजन तुम काहे को नेहाल गा...। तुम्हरे दरस को...।
फिर उन्होंने दादरा की प्रस्तुति दी। जिसके बोले थेः- ‘मोहे पन घट पर नंदलाल...घेरे मोरी नाजुक कलैयां, मुरकाये दिनो री...।‘ कर्ण प्रिय प्रस्तुति दी।
जो भजे हरि को सदा, सोहि परम पद पावेगा...
इसके बाद कर्नाटिक राग हंस ध्वनि में करीब दास की रचना की प्रस्तुति दी। जिसके बोल थेः- ‘पी ले प्याला हो मतवाला...प्याला नाम अमीरस का रे...।‘ फिर उन्होंने एक गाने का की प्रस्तुति दी। ‘मन रे तू का हे ना धीर धरे...। बो निर्मोही मोह न जाने...।‘ अंत में उन्होंने राग भैरवी में भजनों की प्रस्तुति दी। जिसके बोले थेः- ‘मत जा जोगी, पांव पडूं में तो रे...। प्रेम भक्ति का अंत ही न्यारो, हम को ज्ञान बता जा....। और ‘जो भजे हरि को सदा, सोहि परम पद पावेगा...‘। की प्रस्तुति देकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।