चैंबर में पैसा खर्च करके चुनाव नहीं जीते जाते
(माधव अग्रवाल)
बिगुल फुक गया और चैंबर के चुनाव में सचिव पद पर दीपक अग्रवाल का नाम दुबारा आ ही गया। वैसे तो दीपक भाई से दोस्ती लगभग 25 साल पुरानी है लेकिन पिछले तीन साल में इतना समय हमने साथ पहले कभी नहीं बिताया उसका सिर्फ़ एक ही कारण रहा कि मैं काम करने वालों को ढूंढता हूं। जो निस्वार्थ भाव से केवल प्रतिष्ठा कमाने के लिए काम करते जाएं और दीपक भाई को काम करने की प्रबल भूख है।
पिछले चुनाव में रात के लगभग दो बजे दीपक जी जीत कर बाहर निकले थे और जोर से गले लगा लिया था। मैंने कहा कि दीपक भाई क्या कर रहे हो, मैंने तो पूरे चुनाव में आपका विरोध किया था। दीपक जी ने बड़ी खुशी से कहा कि मुझे आपके विरोध से कोई लेना देना नहीं, अगले तीन साल तक काम करने के लिए आपका साथ और सहयोग चाहिए। मैंने कहा आप भाजपा के कर्मठ कार्यकर्ता हैं। चैंबर एक संगठन है जहां व्यापारी हितों के लिए सरकार से आए दिन दो दो हाथ करने पड़ते हैं कैसे करोगे अपनी सीट से न्याय पार्टी में रहकर। एक सेकंड में उन्होंने कहा कि मैं पार्टी से दब कर कोई काम तीन साल नहीं करूंगा कल ही पार्टी से इस्तीफा दुंगा तीन साल के लिए। मैंने सोचा अभी जीत की खुमारी है कल तक उतर जाएगी तब देखेंगे। लेकिन अगले दिन ही सुबह फोन आया कि दीपक जी ने पार्टी की सभी जिम्मेदारियों या दबाव से तीन साल के लिए संगठन को मना कर दिया है।
मैंने एक बार फिर सोचा कि तीन साल पड़े हैं देखेंगे नाऊ नाऊ कितने बाल। बरसों से सचिव के रूप में भाईसाहब डॉ प्रवीण अग्रवाल को देखता आया था, उनकी एक खास आदत थी जो मुझे सबसे ज्यादा पसंद थी। एक निश्चित समय पर दो से तीन घंटे चैंबर में बैठना और समस्याएं सुनना, अपने लोगों के फोन उठाना या बाद में पलट कर लगाना। उस रिकॉर्ड को भी दीपक भाई ने बखूबी निभाया, उन्होंने सुबह से शाम तक फुल ड्यूटी पूरे तीन साल निभाई, जब भी पहुंच जाएं हम फालतू की बेगार ले कर, दीपक भाई सीट पर डटे मिले। चाहे मुद्दा एक प्याऊ लगवाने का हो, या किसी कैंसर पीढ़ित की मदद के लिए ले कर गया चाहे आंदोलन करने का, बिना झिझके या बिना भाजपा संगठन से डरे दीपक भाई ने ताल ठोक कर साथ दिया और जो बन पड़ा सहयोग किया। उनका कमिटमेंट एक ही था कि आपने मुझ पर शक किया था कि में सचिव के रूप में फिट नहीं हूं लेकिन मैं आपका सारा संशय तीन साल में दूर कर दुंगा।
चैंबर चुनाव में सब से बड़ी समस्या होती है कि लड़ने वाले सभी अपने होते हैं, लेकिन चैंबर एक संगठन है केवल क्लब नहीं। इसलिए कई बार मन के अंदर कड़े फैसले लेने पड़ते हैं। अगर फैसले विवेक से नहीं लिए तो एक मात्र संगठन के अस्तित्व को नहीं बचा पाएंगे, कई बार कहा है कि व्यापारियों का रक्षक केवल व्यापारी है, उस पर गाज गिरे तो खुद के संगठन के अलावा कोई खड़ा नहीं होता। व्यापारी बुद्धिजीवी वर्ग है चैंबर का इतिहास रहा है कि यहां केवल पैसा खर्च कर के कोई चुनाव नहीं जीत सकता। न कोई लाड़ली योजना काम करती है न कोई बोतल या पैसा, यहां सिर्फ इमेज काम और व्यवहार के दम पर ही चुनाव जीते जा सकते हैं। हाजिरी और मेहनत में दीपक भाई को 100 में से 1000 नंबर हैं, और चुनाव के लिए शुभेक्षा।
(लेखक चेंबर के सक्रिय सदस्य हैं और बेबाक लेखनी के लिये चर्चित है )