अमोला घाटी में बेजुबान जीवन संकट में प्यास-भूख से तड़पते बंदर-लंगूर और गोवंश, प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
अमोला घाटी शिवपुरी जिले की पहचान मानी जाने वाली यह घाटी आज एक गंभीर मानवीय और पर्यावरणीय संकट का सामना कर रही है। यहां हजारों की संख्या में बंदर, लंगूर और गोवंश रहते हैं, लेकिन भीषण गर्मी के इस दौर में उनके लिए न तो पर्याप्त पानी की व्यवस्था है और न ही भोजन का कोई स्थायी इंतजाम। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि ये बेजुबान जीव भूख और प्यास से तड़पते नजर आ रहे हैं।
गौसेवा समिति के अध्यक्ष कल्लू महाराज ने इस गंभीर समस्या को उठाते हुए शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि वर्षों से यह समस्या बनी हुई है, लेकिन आज तक किसी ने ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने बताया कि राहगीर कभी-कभी फल-फ्रूट डाल देते हैं, लेकिन इससे इतने बड़े झुंड का पेट नहीं भर सकता। कल्लू महाराज ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मांग की है कि अमोला घाटी में तत्काल पानी की टंकियां स्थापित की जाएं, नियमित भोजन की व्यवस्था हो और इन बेजुबान जीवों की देखरेख के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों की नियुक्ति की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि गोवंश भी इसी क्षेत्र में पानी और चारे के अभाव में जीवन-मृत्यु से जूझ रहा है।
धार्मिक आस्था का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि बंदरों को हनुमान जी का स्वरूप माना जाता है, और ऐसे में उनकी उपेक्षा न केवल संवेदनहीनता है बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी अनुचित है। उन्होंने समाज से भी अपील की कि केवल मंदिरों में पूजा करने से नहीं, बल्कि इन जीवों की सेवा करके ही सच्ची आस्था प्रकट की जा सकती है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसी मार्ग से रोजाना कई जनप्रतिनिधि, अधिकारी और नेता गुजरते हैं, लेकिन किसी का ध्यान इन बेजुबान जीवों की ओर क्यों नहीं गया? क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना या मौत का इंतजार कर रहा है?
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने अब “बंदर बचाओ अभियान” चलाने का आह्वान किया है। उनका कहना है कि यदि जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह प्राकृतिक संतुलन और जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। अब देखना यह है कि शासन-प्रशासन इस मुद्दे पर कितनी गंभीरता दिखाता है, या फिर यह आवाज भी अन्य मुद्दों की तरह अनसुनी रह जाएगी।