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ताका-झांकी

राष्ट्रीय बाल आयोग 24 घण्टे सेवा और मार्गदर्शन में सलंग्न:प्रियंक क़ानूनगो

03-Aug-20 84
Sandhyadesh

मप्र के अलावा छत्तीसगढ़, पंजाब,झारखंड,चंडीगढ़ से भी जुड़े प्रतिनिधि
डॉ के के दीक्षित अध्यक्ष बाल कल्याण समिति जिला ग्वालियर ने जानकारी दी कि गत दिवस एक वेबीनार का आयोजन किया गया जिसमें, स्पीकर ने कहा कि
राष्ट्रीय बाल सरंक्षण आयोग 24 घण्टे बालकों से जुड़े मामलों की सुनवाई और एडवाइजरी के लिए उपलब्ध रहता है।देश भर के लोग आयोग से बाल सरंक्षण और पुनर्वास के मामलों में सम्पर्क में आ रहे है।राष्ट्रीय बाल सरंक्षण आयोग के अध्यक्ष श्री प्रियंक कानूनगो ने आज यह बात चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की पांचवी ई संगोष्ठी में कही।संगोष्ठी में ई प्लेटफार्म पर  देश भर के चाइल्ड एक्टिविस्ट , बालकल्याण समिति एवं जेजीबी के सदस्य जुड़े थे।संगोष्ठी को मप्र उच्च न्यायालय के रिटायर्ड जस्टिस श्री एचपी सिंह ने भी संबोधित किया।
श्री क़ानूनगो ने कहा कि बाल सरंक्षण से जुड़े सभी सरकारी एवं गैर सरकारी लोगों को अपने काम को ईश्वरीय कार्य मानकर करना चाहिये।क्योंकि बालकों के निर्विकार मन को समझ कर हमें कुछ भटके हुए बच्चों को सामाजिक रूप से उनकी प्रतिभा के अनुरूप सुस्थापित करना होता है।श्री क़ानूनगो ने कहा कि बाल कल्याण समिति या जेजेबी से सीधे संबद्ध लोग अपनी जबाबदेही को पूरी निष्ठा के साथ करें ताकि मरण के बाद हमारा जीवन अपने अपने फलक में स्मरणीय बन सके। इसके लिए हमें मन मे यह अटल धारणा बनानी होगी कि जब तक इस क्षेत्र में है हमें अपना कुछ स्व त्याग भी करना होगा।राष्ट्रीय अध्यक्ष ने बताया कि बालश्रम के मामलों की जड़ तक जाने की जरूरत है क्योंकि यह समस्या अंततः समाजिक सशक्तिकरण का निर्धारक हो सकती है।
श्री क़ानूनगो ने बताया कि अनुभव में यह आया है कि बाल कल्याण समिति के आदेश या पत्र जेजे एक्ट के प्रावधानों के अनुरूप मानक फ्रेम में नही होते है।इसके चलते प्रशासनिक स्तर पर दुविधा की स्थिति निर्मित होती हैं।उन्होंने सभी सदस्यों से आग्रह किया कि वे जेजे एक्ट के विधिक पक्षों का बारीकी से अध्ययन करें।श्री क़ानूनगो ने स्वीकार किया कि समितियों एवं आयोग के साथ महिला बाल विकास का टकराव स्वाभाविक है और इसे अवरोधक न मानते हुए प्रक्रिया का हिस्सा समझकर काम करना चाहिए।
जस्टिस एचपी सिंह ने कहा कि बाल कल्याण कानून के सभी स्टेक होल्डर्स को यह समझना चाहिए कि यह एक पवित्र कार्य है क्योंकि आने वाले समाज में अपराध को रोकने की बुनियादी जिम्मेदारी उनकी हैं।सभी अपचारी एवं सीएनसीपी श्रेणी के बालकों को अगर हम अपनी निष्ठा के साथ निभाने का प्रयास करेंगे तो आने वाले समाज में सुगठित अपराधों की संभावना को बड़े पैमाने पर कम कर सकते है।
जस्टिस सिंह ने बताया कि मौजूदा जेजे एक्ट बहुत ही समावेशी और सशक्त है इसीलिये बाल कल्याण समितियों की करवाई को न्यायिक धरातल पर निर्मित किया गया है।
ई संगोष्ठी में मप्र के अलावा झारखंड, दिल्ली, चंडीगढ, पंजाब,छत्तीसगढ़ राज्यों के अध्यक्ष एवं सदस्यों ने भी भाग लिया।झारखंड से जुड़े प्रतिनिधियों ने राज्य आयोग एवं जिलों में नियुक्ति न होने का मुद्दा उठाया।इस पर आयोग के अध्यक्ष प्रियंक क़ानूनगो ने बताया कि इस मामले पर उनकी राज्यपाल से चर्चा हो चुकी है।चंडीगढ़ के प्रतिनिधियों ने पॉक्सो एक्ट में पीड़िताओ को सीधे सुपुर्द करने की समस्या पर राष्ट्रीय अध्यक्ष का ध्यान आकृष्ट किया।ओपन सेसन में करीब दो दर्जन प्रतिभागियों ने अपनी व्यवहारिक समस्याओं पर मार्गदर्शन प्राप्त किया।संगोष्ठी का सफल संचालन सचिव डॉ कृपा शंकर चौबे ने किया।संगोष्ठी के अंत मे  श्री प्रियंक क़ानूनगो एवं जस्टिस सिंह का आभार प्रदर्शन फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ राघवेंद्र शर्मा ने व्यक्त किया।
फाउंडेशन की अगली ई संगोष्ठी "काउंसिलिंग के मनोवैज्ञानिक पक्ष"पर केंद्रित होगी।

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