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महारथी बन चुके हैं ज्योतिरादित्य, पिता की मौत के बाद संभाली थी विरासत

2018-10-20 12:34:20 428
Sandhya Desh


बदन पर चुस्त कुर्ता-पजामा, गले में कांग्रेसी रंग में रंगा गमछा और चेहरे पर सौम्यता भाव एक साथ. ये छवि है प्रदेश में कांग्रेस के झंडाबरदार ज्योतिरादित्य सिंधिया की. सिंधिया को सियासत विरासत में मिली है. सिंधिया परिवार भारतीय राजनीति के उन चुनिंदा परिवारों में से है, जिसके पास राजशाही विरासत तो है ही, लोकतांत्रिक भारत में भी लोगों के बीच उसका वही रसूख बना हुआ है.
30 सितंबर 2001 को विमान हादसे में माधवराव सिंधिया की मौत के बाद ज्योतिरादित्य के कंधों पर पिता की सियासी विरासत संभालने की जिम्मेदारी आ गई. तब से लेकर अब तक पिछले 17 सालों में ज्योतिरादित्य मध्यप्रदेश में कांग्रेस के मजबूत स्तंभ के रूप में स्थापित हो चुके हैं. रफ्तार के शौकीन सिंधिया ने सियासी पैंतरे भी उसी तेजी से सीखे और राजनीति में एक मुकाम हासिल किया.  
बड़े राजघराने से ताल्लुक रखने के बाद भी सिंधिया ने अपनी छवि एक सौम्य नेता के रूप में गढ़ी है. मंत्री बनने के बाद सिंधिया ने अपनी गाड़ी पर लाल बत्ती भी नहीं लगाई, साथ ही वे खुद को महाराजा कहलाना भी नहीं पसंद करते. हालांकि, ग्वालियर-चंबल सहित प्रदेश के कई इलाकों में लोग उन्हें महाराजा के नाम से ही पुकारते हैं. ज्योतिरादित्य भले ही खुद को महाराजा कहलाना नापसंद करते हों. लेकिन, वे हर उस कोशिश में जुट गए हैं, जो उन्हें 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश का महाराजा बना सके और सूबे के सियासी रण को सिंधिया बनाम शिवराज में बदलने की उनकी कोशिशें इसे सच साबित करती हैं. 

ऐसा है सियासी सफर
 * ज्योतिरादित्य 2002 में गुना लोकसभा सीट से पहली बार सांसद चुने गए.
 * इसके बाद लगातार 4 बार से ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से सांसद हैं.
 * यूपीए-2 के वक्त उन्हें ऊर्जा राज्य मंत्री का स्वतंत्र प्रभार दिया गया.
 * अब मध्यप्रदेश चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया गया है.

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