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मिशन-47 के जरिये सत्ता पाने की फिराक में बीजेपी

2018-08-13 10:20:51 131
Sandhya Desh


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मध्यप्रदेश चुनाव जीतने के लिए बीजेपी भले ही अबकी बार दो सौ पार की बात कर रही हो। लेकिन, जमीन पर ये काम कितना मुश्किल है ये उसे भी पता है। यही वजह है कि बीजेपी खासी चुनावी कवायद में लगी है और तरह-तरह की रणनीति बना रही है। ’मिशन-47’ भी बीजेपी की चुनावी रणनीति का खास हिस्सा है। आप पढ़ रहे हैं www.sandhyadesh.com
आप सोच रहे होंगे कि ये ’मिशन-47’ आखिर है क्या, तो आपको बता दें कि दरअसल ’मिशन-47’ का मतलब है प्रदेश की वो 47 सीटें है जो आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं और जिन्हें आदिवासी वोट बैंक पूरी तरह प्रभावित करता है। बीजेपी के दो सौ सीटें जीतने का दावा तब तक नहीं पूरा हो सकता जब तक कि इन 47 सीटों में से कम से कम 30 से 35 सीटों पर कब्जा ना जमाया जाए। ’मिशन-47’ के महत्व का अंदाजा सीएम शिवराज सिंह और राकेश सिंह के अलावा बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भी है। आप पढ़ रहे हैं www.sandhyadesh.com यही वजह है कि बीजेपी ने ’मिशन-47’ को पूरा करने के लिए पार्टी के कई दिग्गजों को मैदान में उतार दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो विश्व आदिवासी दिवस पर आदिवासी बाहुल्य जिलों में घोषित हुई छुट्टी और बड़े स्तर पर हुए कार्यक्रमों के पीछे भी बीजेपी की यही रणनीति काम कर रही थी। आप पढ़ रहे हैं www.sandhyadesh.com

आदिवासी सम्मेलन के बहाने, वोटरों को रिझाने में जुटे शिवराज
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शिवराज सरकार ने विश्व आदिवासी दिवस पर प्रदेश के सभी आदिवासी अंचल के जिलों में बड़े पैमाने पर कार्यक्रम आयोजित करवाये। धार के कार्यक्रम में तो स्वयं सीएम शिवराज ने मोर्चा सभांलते हुये आदिवासी समाज के लिये सौंगातों का पिटारा खोल दिया। जबकि अन्य जिलों में शिवराज के मंत्रियों सहित भाजपा के तमाम सांसदों की टीम जुटी हुई थी। इससे साफ होता है कि बीजेपी आगामी चुनाव में इन आदिवासी सीटों के प्रति कितनी गंभीर है। 
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सरकार में प्रतिनिधित्व कम, सीटें ज्यादा
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2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को प्रदेश की सत्ता तक पहुंचाने में प्रदेश की आदिवासी सीटों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान रहा था। 47 सीटों में से भाजपा के 30 विधायक चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। लेकिन, शिवराज सरकार में आदिवासियों को वह स्थान प्राप्त नहीं हुआ, जिसकी उन्हें उम्मीद थी। दरअसल शिवराज मंत्रिमंडल में इस वर्ग के फिलहाल सिर्फ तीन मंत्री कुंवर विजय शाह, ओमप्रकाश धुर्वे व अतंर सिंह आर्य ही शामिल हैं, जबकि शहडोल लोकसभा चुनाव जीतने के बाद ज्ञान सिंह ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। ऐसे में मंत्रिमंडल में कम स्थान मिलना भी इस वर्ग की नाराजगी की एक बड़ी वजह मानी जा रही है। आप पढ़ रहे हैं www.sandhyadesh.com


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