ग्वालियर व्यापार मेले को लेकर मीडिया कर्मियों ने दिए अपने सुझाव

2018-03-14 19:17:37 176
Sandhya Desh


ग्वालियर। ग्वालियर का प्राचीन मेले का स्वरूप बरकरार रहे। वहीं मेले को विकसित कर वर्ष भर कार्यक्रम आयोजित हों ऐसा प्रयास होना चाहिए। यह सुझाव आज ग्वालियर व्यापार मेला प्राधिकरण द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में मीडिया कर्मियों ने व्यक्त किये। 
ग्वालियर व्यापार मेला के कार्यकरी अध्यक्ष एवं ग्वालियर के संभागायुक्त बीएम शर्मा द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मीडिया कर्मियों ने खुलकर अपने विचार व्यक्त किये वहीं उन्होंने अपने अपने विचारों को लिखकर भी दिया। मीडिया कर्मियों ने संभागायुक्त को सुझाव दिया कि मेले का स्वरूप को गरिमा के अनुरूप रखा जाए। साथ ही वहां पर होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी भव्यता प्रदान की जाए। मीडिया कर्मियों ने सुझाव दिया कि वर्ष भर मेला लगाने के लिए पहल की जाए। वहीं प्रदर्शनी सेक्टर को ऐसा स्थान दिया जाए जिससे अधिक से अधिक सैलानी सरकार की प्रदर्शनी और कार्यकलापों को देख सकें। 
कुछ मीडिया कर्मियों ने सुझाव दिया कि मेले को एज्युमेंट पार्क के रूप में विकसित किया जाए, साथ ही वहां पर खान पान के स्टॉल भी लगाए जाएं। इससे सभी वर्ग के लोगों को लाभ मिलेगा। मीडिया कर्मियों ने वरिष्ठ कलाकारों के शिविर आयोजित करने का भी सुझाव दिया। वहीं प्रदर्शनी को समय पर लगाने, मेले का शुरू में लगने वाली दुकानों के खाली रहने पर पहले उन्हें भरने का सुझाव भी दिया। कुछ मीडिया कर्मियों ने पहले जैसे मेले में छूट देने, सरकार द्वारा छूट प्रदान नहीं करने पर कंपनियों से मेले में विशेष छूट देने आदि का सुझाव दिया। वहीं स्टोन पार्क को विकसित कर उसे ऐ सेक्टर में स्थापित करने का भी सुझाव दिया गया। साथ ही ग्वालियर महानगर की संस्थाओं चेंबर आदि से भी सुझाव आमंत्रित करने को भी कहा।  उल्लेखनीय है कि मेले का शुभारंभ पशु मेले के रूप में १९०५ में हुई थी। यह मेला २० दिसंबर से पांच जनवरी तक माधौराव सिंधिया प्रथम ने मेला मवेशियान के रूप में लगाया था। 
मेला सागरताल के पास लगाया जाता था। वर्ष १९१८ में इसे वर्तमान मेला मैदान पर लगाया गया। १९३४ में काउंसिल ऑफ रीजेंसी ने मेला व नुमाइश ग्वालियर के नाम से जाना जाने लगा। १९८४ में इसे राज्य स्तरीय ट्रेड फेयर का दर्जा प्रदान किया गया। वर्ष १९६७-६८ में मेले की हीरक जयंती एवं वर्ष १९८२-८३ में प्लेटीनम जयंती और वर्ष २००४-०५ में शताब्दी वर्ष मनाया गया। २००२ में राज्य शासन ने इसका नाम श्रीमंत माधवराव सिंधिया व्यापार मेला घोषित किया। ३० दिसंबर १९९६ में मेला को प्राधिकरण बनाया गया। १०४ एकड में फैले मेले में १६०० पक्की और १००० कच्चे प्लेटफार्म हैं। इसमें एक बडा मैदान भी हैं वहीं पक्की सड़कों के साथ शौचालय, शुलभ काम्पलेक्स, पेयजल, मेला अवधि में अस्थाई चिकित्सालय, सुरक्षा व्यवस्था, पोस्ट ऑफिस, विद्युत सब स्टेशन, मनोहारी पार्क आडोटोरियम रंगमंच आदि से सुसज्जित है। मेले को विभिन्न सेक्टरों में बांटा गया है। मेला परिसर में ३३ ब्लॉक हैं। जिसमें १६ दुकानों के बाद एक गेट बनाया गया है। 
मेला परिसर में तीनों तरफ ०४ लैन रोड बनी हुई है। मेला परिसर में ४० फुट चौडी सडकें, फायर ब्रिगेड मेला अवधि में उपलब्ध रहती है। मेला अवधि में प्रतिदिन लगभग ४०-५० हजार सैलानी अवकाश के दिनों में एक से सवा लाख सैलानी शिरकत करते हैं। मेले की वर्तमान में आय ४२२.२५ लाख एवं व्यय ३२९ .६९ लाख और लाभ ११२.५६ लाख रहा है। 

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