महाराज बाड़े पर गूँजे आजादी के तराने और लोकधारा भी बही

2018-01-27 17:30:42 45
Sandhya Desh


ग्वालियर । भारतीय गरिमा के शीर्ष उत्सव गणतंत्र दिवस की सांध्य बेला में महाराज बाड़े पर आजादी के तराने गूँजे तो लोक रंग से सम्पूर्ण परिसर सराबोर हो गया। यहाँ बात हो रही है “भारत पर्व” की। गणतंत्र दिवस की सांध्य बेला में “भारत पर्व” के तहत महाराज बाड़े पर विक्टोरिया मार्केट के सामने बने मंच पर रंगारंग  सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुए। भारत पर्व में भोपाल से आए सुरेन्द्र वानखेड़े एवं उनके साथी कलाकारों ने “सुराज गान” और डिण्डोरी से आए धनेश परस्ते एवं उनके दल ने आदिवासी लोकनृत्य “सैला-रीना” की प्रस्तुति दी। इस अवसर पर आनंद उत्सव का समापन और पुरस्कार वितरण कार्यक्रम भी आयोजित हुआ। 
महापौर विवेक नारायण शेजवलकर ने दीप प्रज्ज्वलित कर भारत पर्व का शुभारंभ किया। इस अवसर पर कलेक्टर राहुल जैन, अपर कलेक्टर दिनेश श्रीवास्तव व शिवराज वर्मा सहित अन्य संबंधित अधिकारी मौजूद थे। भारत पर्व का आयोजन राज्य शासन के संस्कृति विभाग के स्वराज संचालनालय के तत्वावधान में जिला प्रशासन, जनसंपर्क विभाग एवं नगर निगम के सहयोग से किया गया। कार्यक्रम का संचालन आनंदम सहयोगी डॉ. सत्यप्रकाश ने किया। 

जप्तशुदा नगमों ने भरा देशभक्ति का जज्बा 
आजादी की लड़ाई के दौरान जो नगमे (देशभक्तिपूर्ण गीत) जन मानस में आजादी का जज्बा भरने का माध्यम बने, अंग्रेजों द्वारा जप्तशुदा उन्हीं नगमों से गणतंत्र दिवस की सांध्य बेला में महाराज बाड़ा गूँज उठा है। भोपाल से आए सुरेन्द्र वानखेड़े के दल ने नाट्य के रूप में ऐसे ही लगभग 15 आजादी के तरानों की संगीतमय प्रस्तुति दी। इन गीतों ने देशभर में क्रांति की ज्वाला जलाई थी। इस प्रस्तुति ने हारमोनियम पर अनिल संसारे व तालवाद्य पर लक्ष्मीनारायण ओसले ने संगत की। साथी कलाकारों में त्रिकर्ष नाट्य संस्था से जुड़े विवेक त्रिपाठी, राहुल कुशवाह, संजय मेवाड़े, शिवकांत वर्मा, शांतनु पाण्डेय, मधुसूदन, अनमोल सोनी, आयुष, देवेश झा व शिवम गुप्ता शामिल थे। प्रकाश संचालन रवि-अर्जुन का था। 

“सैला-रीना” आदिवासी लोकनृत्य से सराबोर हुआ बाड़ा 
डिण्डोरी से आए धनेश परस्ते के निर्देशन में रंगबिरंगे परिधानों में सजे-धजे आदिवासी लोक कलाकारों ने जब “सैला-रीना” नृत्य की प्रस्तुति दी तो महाराज बाड़ा परिसर लोकरंग से सराबोर हो गया। जब धान, कोदो व कुटकी की मिसाई व गहाई का वक्त आता है तब खासतौर पर गौड़ जनजाति के लोग अपनी परंपरागत वेशभूषा में लोकनृत्य करते हैं। उन्हीं में से एक लोकनृत्य “सैला-रीना” है। किंवदंती है अमरकंटक की रानी बघेसुर देवता को मनाने सवा हाथ का बाँस का डंडा, साथ में मोर पंख हाथ में लेकर नृत्य करते हुए गईं थीं। वहीं से इस नृत्य का नाम “सैला” पड़ा तथा महिलाओं के गीत का नाम “रीना” पड़ा। बाद में इस नृत्य को “सैला-रीना” कहा जाने लगा। यह नृत्य खासतौर पर गौंड़ जनजाति की धरोहर है और वे इसे आज भी जिंदा रखे हुए हैं। 
 

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