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Sandhyadesh

आज की खबर

हिंदुओं का नारीवाद

18-Oct-19 59
Sandhyadesh


                               एन के त्रिपाठी 
      सुश्री कुसुम मेहदेले,जो मंत्री के रूप मे विशेष सफल नहीं थी, ने एक महत्वपूर्ण ट्वीट में पूछा है कि पुरुष महिलाओं के लिए करवा चौथ का व्रत क्यों नहीं  रखते हैं।इस साधारण प्रश्न ने मुझे हिन्दू धर्म और समाज की अनेक मान्यताओं पर विचार करने के लिए उद्वेलित कर दिया।हिंदूवादी परंपरा अत्यधिक उदार रही है और इसमें मुक्त विचार विमर्श करने पर किसी फ़तवे का डर नहीं होता। उसी उदारता का लाभ लेते हुए मैं कहना चाहूंगा कि हिन्दू धर्म की मान्यताएं सभी धर्मों के समान पूर्णतया पुरुषवादी रही है। महिलाओं के साथ भेदभाव किसी एक धर्म का विशेषाधिकार नहीं है और हिन्दू धर्म भी इसका अपवाद नहीं है। 
     हिन्दू धर्म का मूलाधार ऋग्वेद है।इसमें शाश्वत मूल्यों और सिद्धांतों का उल्लेख किया गया है। कालांतर में उपनिषदों ( वेदान्त)  में अनेक प्रकार के दर्शनों का उल्लेख किया गया है जिनमें द्वैत एवं अद्वैत पर विशेष चर्चा की गई है।समानांतर रूप से पौराणिक कथाओं का व्यापक एवं विशद साहित्य सृजित किया गया।।इन कथाओं से मनीषियों ने अपने अनुसार प्रसंगों का चयन कर नाना प्रकार के मत-मतांतरों का प्रादुर्भाव किया।इनके आधार पर सामाजिक संरचना एवं रीतियों की मान्यताएं विकसित हुई। जहाँ दुर्गा जैसी सर्वशक्तिमान देवी का रूप प्रस्तुत हुआ वहीं दुर्भाग्यवश अधिकांश चयनित कथाएं नारी को द्वितीय श्रेणी में रेखांकित करती रही।नारी के लिए अहिल्या, सती सावित्री एवं सीता जैसी पात्रों को आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया। इन्होंने पुरुषों के निर्णयों से उत्पन्न विपरीत परिस्थितियों को भी अपना सौभाग्य माना। सीता की अनावश्यक अग्नि परीक्षा के बाद भी वाल्मीकि रामायण में राम की राजसभा के विप्र गुरुओं ने सीता को अन्यायपूर्वक वन गमन का दंड दे दिया। तुलसीदास ने अरण्य काण्ड में अनुसुईया द्वारा सीता को अखंड पतिव्रत धर्म के पालन की शिक्षा के माध्यम से नारियों के समक्ष आदर्श नियम प्रस्तुत किये। वीरवती और सावित्री ने अपने पतियों को प्राप्त करने के लिए अनेक कठिनाइयों का सामना किया और इन्हें महिमामंडित किया गया। सभी धर्मग्रंथ पति के कर्तव्यों पर लगभग शांत है। 
    किसी भी धर्म का वास्तविक रूप केवल उसके धर्म ग्रंथ नहीं होते हैं। हिन्दू धर्म तो अन्य धर्मो के विपरीत केवल एक पुस्तक पर आधारित भी नहीं है। धर्म का वास्तविक रूप मान्यताओं और रीतियों पर आधारित उसकी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था होती है। 
  अपने लचीलेपन के कारण हिन्दू धर्म में सुधार की व्यापक संभावनाएं हैं। आधुनिक युग में राजा राम मोहन राय ने महिलाओं की समानता के अधिकार के लिए क्रान्तिकारी कार्य किया था। स्वतंत्रता के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने हिंदू कोड बिल लाकर (दुर्भाग्यवश उन्होंने सभी धर्मों को नहीं लिया) हिंदू महिलाओं का समाज मे  स्थान सुदृढ किया।
    एक दिन का व्रत रखना अपने आप में कोई बहुत बड़ी बात नहीं है।  परंतु अब समय आ गया है कि हिंदू समाज अपनी नारियों को वही सम्मान दे जो हमारे धर्म ग्रंथों मे कुछ स्थानों पर कहा गया है।

कार्तिक कृष्ण पंचमी                                                                              

लेखक एनके त्रिपाठी वरिष्ठ सेवानिवृत आईपीएस रहे हैं। वह स्वतंत्र लेखन भी करते हैं। 

2019-11-14aaj